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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 150 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



दंसणणाणसमग्गं झाणं णो अण्णदव्वसंजुत्तं । (150)

जायदि णिज्जरहेदू सभावसहिदस्स साहुस्स ॥160॥

अर्थ: 

स्वभाव सहित साधु के दर्शन-ज्ञान से परिपूर्ण, अन्य द्रव्यों से संयुक्त नहीं होने वाला ध्यान निर्जरा का हेतु होता है ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[दंसण] इत्यादि पद-खण्डना रूप से व्याख्यान करते हैं -- [दंसणणाण] दर्शन-ज्ञान से, [समग्गं] परिपूर्ण हैं । इनसे परिपूर्ण कौन है ? [झाणं] ध्यान इनसे परिपूर्ण है । वह और किस विशेषता-वाला है ? [णो अण्णदव्वसंजुत्तं] वह अन्य द्रव्य से संयुक्त नहीं है । इसप्रकार का ध्यान [जायदि णिज्जरहेदू] निर्जरा का हेतु होता है । वह किसके निर्जरा का हेतु होता है ? [सहावसहिदस्स साहुस्स] शुद्ध स्वभाव सहित साधु के वह निर्जरा का हेतु होता है ।

वह इसप्रकार -- निर्विकार परमानन्द एक लक्षण स्वात्मोत्थसुख से तृप्त हो जाने के कारण हर्ष-विषाद रूप सांसारिक सुख-दु:ख-मय विक्रिया / परिणमन से व्यावृत्त / रहित उन पूर्वोक्त भाव-युक्त केवली के, केवल-ज्ञानावरण-दर्शनावरण के विनाश से असहाय (जिसे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं / पूर्ण निरपेक्ष) केवल ज्ञान-दर्शन सहित, सहज शुद्ध चैतन्य-रूप से परिणत होने के कारण और इन्द्रिय-व्यापार आदि बाह्य द्रव्यों के आलम्बन का अभाव होने के कारण पर-द्रव्य के संयोग से रहित तथा स्वरूप में निश्चल हो जाने के कारण अविचलित चैतन्य-वृत्ति रूप जो आत्मा का स्वरूप है, उससे ध्यान के कार्य-भूत पूर्व संचित कर्मों के स्थिति-विनाश और स्थिति-गलन रूप कार्य को देखकर, निर्जरारूप ध्यान के कार्य में कारण का उपचार करके उसे उपचार से ध्यान कहते हैं, ऐसा अभिप्राय है ।

यहाँ शिष्य कहता है पर-द्रव्य के आलम्बन रहित यह ध्यान केवलियों के हो । उनके किस कारण हो ? 'केवलियों के उपचार से ध्यान है' ऐसा वचन होने से उनके वह हो; परन्तु चारित्रसार आदि ग्रंथ में कहा गया है कि 'छद्मस्थ तपोधन द्रव्य-परमाणु या भाव-परमाणु का ध्यान कर केवल-ज्ञान उत्पन्न करते हैं'; तब फिर वह परद्रव्य के आलम्बन से रहित कैसे घटित होता है? इसका परिहार करते हैं -- द्रव्य-परमाणु शब्द से द्रव्य की सूक्ष्मता तथा भाव-परमाणु शब्द से भाव की सूक्ष्मता ग्रहण करना चाहिए; पुद्गल परमाणु ग्रहण नहीं करना चाहिए -- यह व्याख्यान 'सर्वार्थसिद्धि-टीका' में किया गया है । इस संवाद (सम्यक् कथन रूप) वाक्य का विवरण करते हैं द्रव्य शब्द से आत्म-द्रव्य ग्रहण करना चाहिए; उसका परमाणु द्रव्यपरमाणु । 'परमाणु' इसका क्या अर्थ है ? रागादि उपाधि से रहित सूक्ष्मावस्था -- इसका अर्थ है । उसके सूक्ष्मता कैसे है ? यदि ऐसा प्रश्न हो तो कहते हैं निर्विकल्प समाधि का विषय होने से उसके सूक्ष्मता है । -- इसप्रकार द्रव्य-परमाणु शब्द का व्याख्यान किया । भाव शब्द से उस ही आत्म-द्रव्य का स्व-संवेदन-ज्ञान परिणाम ग्रहण करना चाहिए, उस भाव का परमाणु । 'परमाणु' इसका क्या अर्थ है? रागादि विकल्प रहित सूक्ष्मावस्था-परमाणु का अर्थ है । उसके सूक्ष्मता कैसे है ? यदि ऐसा प्रश्न हो तो कहते हैं इन्द्रिय और मन सम्बन्धी विकल्प का विषय नहीं होने के कारण वह सूक्ष्म है । -- इसप्रकार भावपरमाणु शब्द का व्याख्यान जानना चाहिए ।

यहाँ भावार्थ यह है प्राथमिक दशा वालों को चित्त स्थिर करने के लिए और विषयाभिलाषा रूप ध्यान से बचने के लिए परम्परा से मुक्ति के कारणभूत पंचपरमेष्ठी आदि परद्रव्य ध्येय हैं; परंतु दृ़ढतर ध्यान के अभ्यास से चित्त स्थिर हो जाने पर निज शुद्धात्मा का स्वरूप ही ध्येय है । वैसा ही 'पूज्यपाद स्वामी' द्वारा निश्चय-ध्येय का व्याख्यान किया गया है 'वह आत्मा आत्मा के द्वारा, आत्मा में ही, आत्मा को क्षण भर के लिए लीन करता हुआ स्वयंभू होता है।' इसका व्याख्यान करते हैं आत्मा रूपी कर्ता, कर्मता को प्राप्त आत्मा को, अधिकरणभूत आत्मा में, करणभूत आत्मा द्वारा वह प्रत्यक्षीभूत आत्मा क्षण भर अन्तर्मुहूर्त पर्यंत धारण करता हुआ स्वयम्भू, सर्वज्ञ होता है, ऐसा अर्थ है ।

इसप्रकार, परस्पर सापेक्ष निश्चय-व्यवहारनय से साध्य-साधक भाव को जानकर ध्येय-भूत विषय में विवाद नहीं करना चाहिए ॥१६०॥

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इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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