• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 167 - समय-व्याख्या

From जैनकोष



तम्हा णिव्वुदिकामो णिस्संगो णिम्ममो य भविय पुणॊ । (167)

सिद्धेसु कुणदि भत्तिं णिव्वाणं तेण पप्पेदि ॥177॥

अर्थ: 

इसलिए निर्वाण का इच्छुक जीव नि:संग और निर्मम होकर सिद्धों में भक्ति करता है, उससे वह निर्वाण को प्राप्त होता है ।

समय-व्याख्या: 

रागकलिनिःशेषीकरणस्य करणीयत्वाख्यानमेतत् ।

यतो रागाद्यनुवृत्तौ चित्तोद्भ्रान्तिः, चित्तोद्भ्रान्तौ कर्मबन्ध इत्युक्तम्, ततः खलुमोक्षार्थिना कर्मबन्धमूलचित्तोद्भ्रान्तिमूलभूता रागाद्यनुवृत्तिरेकान्तेन निःशेषीकरणीया ।निःशेषितायां तस्यां प्रसिद्धनैस्सङ्गयनैर्मम्यः शुद्धात्मद्रव्यविश्रान्तिरूपां पारमार्थिकीं सिद्धभक्तिमनुबिभ्राणः प्रसिद्धस्वसमयप्रवृत्तिर्भवति । तेन कारणेन स एव निःशेषितकर्मबन्धःसिद्धिमवाप्नोतीति ॥१६७॥

समय-व्याख्या हिंदी : 

यह, राग-रूप क्लेशका निःशेष नाश करने योग्य होने का निरूपण है ।

रागादि-परिणति होने पर चित्त का भ्रमण होता है और चित्त का भ्रमण होने पर कर्म-बन्ध होता है ऐसा (पहले) कहा गया, इसलिए मोक्षार्थी को कर्म-बन्ध का मूल ऐसा जो चित्त का भ्रमण उसके मूल-भूत रागादि-परिणति का एकान्त निःशेष नाश करने योग्य है । उसका निःशेष नाश किया जाने से, जिसे १निःसंगता और २निर्ममता प्रसिद्ध हुई है ऐसा वह जीव शुद्धात्म-द्रव्य में विश्रांति-रूप पारमार्थिक सिद्धभक्ति धारण करता हुआ ३स्वसमय-प्रवृत्ति की प्रसिद्धि-वाला होता है । उस कारण से वही जीव कर्मबन्ध का ४निःशेष नाश करके सिद्धि को प्राप्त करता है ॥१६७॥

१निःसंग = आत्मतत्त्व से विपरीत ऐसा जो बाह्य-अभ्यंतर परिग्रहण उससे रहित परिणति सो निःसंगता है ।

२रागादि-उपाधि-रहित चैतन्य-प्रकाश जिसका लक्षण है ऐसे आत्म-तत्त्व से विपरीत मोहोदय जिसकी उत्पत्ति में निमित्त-भूत होता है, ऐसे ममकार-अहंकारादिरूप विकल्प-समूह से रहित निर्मोह-परिणति, सो निर्ममता है ।

३स्वसमयप्रवृत्ति की प्रसिद्धिवाला = जिसे स्व-समयमें प्रवृत्ति प्रसिद्ध हुई है ऐसा । ( जो जीव रागादिपरिणति का सम्पूर्ण नाश करके नि:संग और निर्मम हुआ है उस परमार्थ-सिद्धभक्तिवंत जीव के स्वसमय में प्रवृत्ति सिद्ध की है इसलिए स्वसमयप्रवृत्ति के कारण वही जीव कर्मबन्ध का क्षय करके मोक्ष को प्राप्त करता है, अन्य नहीं ।)

४निःशेष = सम्पूर्ण; किंचित शेष न रहे ऐसा ।

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

समय-व्याख्या अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_167_-_समय-व्याख्या&oldid=115629"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki