• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 1 - समय-व्याख्या

From जैनकोष



इंदसदवंदियाणं तिहुवणहिदमधुरविसदवक्काणं ।

अंतातीदगुणाणं णमो जिणाणं जिदभवाणं ॥1॥

अर्थ: 

सौ इन्द्रों से पूजित, तीनों लोकों को हितकर, मधुर और विशद वचनों युक्त, अनन्त गुणों से सम्पन्न, जितभवी (संसार को जीतनेवाले) जिनेन्द्र भगवान को नमस्कार हो ।

समय-व्याख्या: 

अथ सूत्रावतार: --

अथात्र 'नमो जिनेभ्‍य:' इत्‍यनेन जिनभावनमस्‍काररूपमसाधारणं शास्‍त्रस्‍यादौ मङ्गलमुपात्तम् । अनादिना संतानेन प्रर्वतमाना अनादिनैव सन्‍तानेन प्रवर्तमानैरिन्द्राणां शतैर्वन्दिता ये इत्‍यनैन सर्वदैव देवाधिदेवत्‍वात्तेषामेवासाधारणनमस्‍कारार्हत्‍वमुक्तम् । त्रिभुवनमूर्ध्‍वाधोमध्‍यलोकवर्ती समस्‍त एव जीवलोकस्‍तस्‍मै निर्व्‍याबाधविशुद्धात्‍मतत्त्वोपलम्‍भोपायाभिधायित्‍वाद्धितं, परमार्थरसिकजनमनोहारित्‍वान्‍मधुरं, निरस्‍तसमस्‍तशंकादिदोषास्‍पदत्‍वाद्विशदं वाक्‍यं दिव्‍यो ध्‍वनिर्येषमिथ्‍यनेन समस्‍तवस्‍तुयाथात्‍म्‍योपदेशित्‍वात्‍प्रेक्षावत्‍प्रतीक्ष्‍यत्‍वमाख्‍यातम् । अन्‍मतीत: क्षेत्रानवच्छिन्न: कालनवच्छिन्नश्‍च परमचैतन्‍यशक्तिविलासलक्षणो गुणो येषामित्‍यनेन तु परमाद्भुतज्ञानातिशयप्रकाशनादवाप्‍तज्ञानातिशयानामपि योगीन्‍द्राणां वन्‍द्यत्‍वमुदितम् । जितो भव आजर्वजवो यैरित्‍यनेन तु कृतकृत्‍यत्‍वप्रकटनात्त एवान्‍येषामकृतकृत्‍यानां शरणमित्‍युपदिष्‍टम् । इति सर्वपदानां तात्‍पर्यम् ।

समय-व्याख्या हिंदी : 

अब (श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेव विरचित) गाथा-सूत्र का अवतरण किया जाता है :-

यहाँ (इस गाथा में) 'जिनों को नमस्कार हो' ऐसा कहकर शास्त्र के आदि में जिन को भाव-नमसकार-रूप असाधारण मंगल कहा । 'जो अनादी प्रवाह से ही प्रवर्तमान (चले आ रहे) *सौ सौ इन्द्रों से वन्दित है' ऐसा कहकर सदैव देवाधिदेवपने के कारण वे ही (जिनदेव ही) असाधारण नमस्कार के योग्य हैं -- ऐसा कहा ।

'जिनकी वाणी (दिव्य-ध्वनि)

  • तीन लोक को, ऊर्ध्व-अधो-मध्य लोकवर्ती समस्त जीव-समूह को निर्बाध विशुद्ध आत्म-तत्त्व की उपलब्धि का उपाय कहनेवाली होने से हितकर है,
  • परमार्थ-रसिक जनों के मन को हरनेवाली होने से मधुर है और समस्त शंकादि-दोषों के स्थान दूर कर देने से विषद (निर्मल, स्पष्ट) है' -- ऐसा कहकर
  • (जिनदेव) समस्त वस्तु के यथार्थ स्वरूप के उपदेशक होने से विचारवंत बुद्धिमान पुरुषों के बहुमान के योग्य हैं (अर्थात् जिनका उपदेश विचारवंत बुद्धिमान पुरुषों को बहुमान-पूर्वक विचारना चाहिए -- ऐसे हैं) ऐसा कहा ।
  • 'अनन्त-क्षेत्र से अन्त रहित और काल से अन्त रहित -- परम-चैतन्य-शक्ति के विलास-स्वरूप गुण जिनका वर्तता है' ऐसा कहकर
  • (जिनों को) परम अद्भुत ज्ञानातिशय प्रगट होने के कारण ज्ञानातिशय को प्राप्त योगिन्द्रों से भी वन्ध्य हैं -- ऐसा कहा ।
  • 'भव (संसार) पर जिन्होनें विजय प्राप्त की है' ऐसा कहकर कृतकृत्यपना प्रगट हो जाने से वे ही (जिन ही) अन्य अकृतकृत्य जीवों को शरण-भूत हैं
-- ऐसा उपदेश दिया -- ऐसा सर्व पदों का तात्पर्य है ॥१॥

*भवनवासी देवों के ४० इन्द्र, व्यंतर देवों के ३२, कल्पवासी देवों के २४, ज्योतिष्क देवों के २, मनुष्यों का १ और तिर्यन्चों का १ -- इसप्रकार कुल १०० इन्द्र अनादी प्र्वाहरूप से चले आ रहे हैं

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

समय-व्याख्या अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_1_-_समय-व्याख्या&oldid=115647"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki