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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 21 - तात्पर्य-वृत्ति

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एवं भावाभावं भावाभावं अभावभावं च । ।

गुणपज्जयेहिं सहिदो संसरमाणो कुणदि जीवो ॥21॥

अर्थ: 

[एवम्] इसप्रकार [गुणपर्ययैः सहित] गुण-पर्याय सहित [जीवः] जीव [संसरन्] संसरण करता हुआ [भावम्] भाव, [अभावम्] अभाव, [भावाभावम्] भावाभाव [च] और [अभावभावम्] अभावभाव को [करोति] करता है ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

अब जीव के उत्पाद-व्यय सम्बंधी सदुच्छेद (सत के विनाश), असदुत्पाद (असत के उत्पाद) के कर्तृत्व के उपसंहार परक व्याख्यान को उद्योतित / प्रकाशित करते हैं--

[एवं भावाभावं] इसप्रकार पूर्वोक्त प्रकार से द्रव्यार्थिक-नय की अपेक्षा नित्यता होने पर भी पर्यायार्थिक-नय की अपेक्षा पहले मनुष्य पर्याय का अभाव / व्यय कर पश्चात् देवोत्पत्ति के समय देव पर्याय का भाव / उत्पाद [कुणदि] करता है । [भावाभावं] और फिर देव पर्याय से च्युत होने के समय विद्यमान देव भाव रूप पर्याय का अभाव करता है । [अभाव भावं च] पश्चात् मनुष्य पर्याय की उत्पत्ति के समय अभाव का / अविद्यमान मनुष्य सम्बन्धी पर्याय का भाव / उत्पाद करता है । इन सबका कर्ता वह कौन है ? [जीवो] इनका कर्ता जीव है । वह जीव कैसा है ? [गुणपज्जयेहिं सहिदो] कुमति ज्ञानादि विभावगुण, मनुष्य-नारक आदि विभाव पर्याय से सहित है । केवल ज्ञानादि स्वभावगुण और सिद्धरूप शुद्ध पर्याय से सहित नहीं है । इनसे सहित क्यों नहीं है? उस केवलज्ञानादि अवस्था में मनुष्य, नारक आदि विभाव-पर्यायों के असम्भव होने से वह उनसे सहित नहीं है । अगुरुलघुत्वगुण सम्बंधी षट्गुणी हानि-वृद्धिमय स्वभाव पर्यायरूप से तो वहाँ भी भावाभावादि को करता है, इसमें विरोध नहीं है । क्या करता हुआ मनुष्य-भावादि करता है? [संसरमाणो] संसरण / परिभ्रमण करता हुआ इन्हें करता है । कहाँ परिभ्रमण करता हुआ इन्हें करता है? द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, भाव स्वरूप पाँच प्रकार के संसार में परिभ्रमण करता हुआ इन्हें करता है ।

इस सूत्र / गाथा में विशुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वभावी, साक्षात् उपादेय-भूत शुद्ध जीवास्तिकाय में जो सम्यक् श्रद्धान-ज्ञान-अनुचरण है उस रूप निश्चय-रत्नत्रयात्मक परम सामायिक को प्राप्त नहीं करता हुआ जिस कारण जीव दृष्ट, श्रुत, अनुभूत, आहार, भय, मैथुन, परिग्रह संज्ञा आदि समस्त पर-भावरूप परिणामों में मूर्छित, मोहित, आसक्त होता हुआ, मनुष्य-नारक आदि विभाव पर्यायरूप से भाव / उत्पाद करता है, और उसी-प्रकार से अभाव / व्यय करता है; उस कारण उस शुद्धात्म-द्रव्य में ही सम्यक श्रद्धान-ज्ञान और उसी रूप अनुचरण निरन्तर सर्व तात्पर्य से कर्तव्य है ऐसा भावार्थ है ॥२१॥

इसप्रकार द्रव्यार्थिक-नय से नित्यता होने पर भी संसारी जीव के पर्यायार्थिक-नय से देव, मनुष्य आदि के उत्पाद-व्यय के कर्तृत्व सम्बन्धी व्याख्यान के उपसंहार की मुख्यता से चतुर्थ स्थल में गाथा पूर्ण हुई ।

इसप्रकार चार स्थल द्वारा द्वितीय सप्तक पूर्ण हुआ । इसप्रकार प्रथम सात गाथाओं के जो पाँच स्थल कहे थे उन सहित नौ अन्तर-स्थलों युक्त चौदह गाथाओं द्वारा प्रथम महाधिकार में द्रव्य पीठिका नामक द्वितीय अन्तराधिकार समाप्त हुआ । अब (तृतीय अन्तराधिकार में) काल-द्रव्य के प्रतिपादन की मुख्यता से पाँच गाथायें कहते हैं । उन पाँच गाथाओं में से छह द्रव्यों के मध्य में जीवादि पाँच अस्तिकाय की सूचना के लिए [जीवा पुग्गलकाया...] इत्यादि एक गाथा है । तत्पश्चात् निश्चयकाल के कथन रूप से [सब्भावसहावाणं...] इत्यादि दो गाथायें हैं। टीका (समय-व्याख्या) के अभिप्राय से यहाँ एक है । तदनन्तर समय आदि व्यवहार-काल की मुख्यता से [समओणिमिसो] इत्यादि दो गाथायें हैं। इसप्रकार तीन स्थल से तृतीय अन्तराधिकार में सामूहिक उत्थानिका हुई ।

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इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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