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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 23.1 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



ववगद पणवण्णरसो ववगददोअट्ठगंधफासो य ।

अगुरुलहुगो अमुत्तो वट्टणलक्खो य कालोत्ति ॥24॥

अर्थ: 

[कालः इति] काल (निश्चयकाल) [व्यपगतपञ्चवर्णरसः] पाँच वर्ण और पाँच रस रहित, [व्यपगतद्विगन्धाष्टस्पर्शः च] दो गंध और आठ स्पर्श रहित, [अगुरुलघुकः ] अगुरुलघु, [अमूर्तः] अमूर्त [च] और [वर्तनलक्षणः] वर्तना लक्षणवाला है ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

अब पुन: निश्चय-काल का स्वरूप कहते हैं -

[ववगद पणवण्णरसो ववगददोगंधअट्ठफासो य] पाँच वर्ण, पाँच रस, दो गंध आठ स्पर्श से रहित है, और वह कैसा है? [अगुरुलहुगो] षट्गुणी हानि वृद्धि रूप अगुरुलघुक गुण से सहित है । और वह किस विशेषता वाला है ? [अमुत्तो] क्योंकि वह वर्णादि से रहित है इसलिये ही अमूर्त है, और इसीलिये सूक्ष्म अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा जानने योग्य है । और वह किस स्वरूप वाला है ? [वट्टणलक्खो य कालोत्ति] शीतकाल में स्वयं ही अध्ययन क्रिया करते हुए पुरुष को अग्नि की सहकारिता के समान, स्वयं ही भ्रमण क्रिया करते हुए कुभंकार-चक्र का अधस्तन (नीचे की) शिला की सहकारिता के समान, निश्चय से स्वयं ही परिणाम को प्राप्त होते हुए सभी द्रव्यों के प्रति बहिरंग निमित्तता होने से वर्तनालक्षण कालाणुरूप निश्चयकाल है ।

लोकाकाश से बाह्य भाग में काल द्रव्य नहीं है, तब आकाश का परिणमन कैसे होता है? ऐसा प्रश्न होने पर उसके प्रति उत्तर देते हैं -- जैसे एक प्रदेश का स्पर्श होने पर फैले हुए महावस्त्र में या विशाल वेणुदण्ड (बाँस) में या कुंभकार-चक्र में सर्वत्र चलन / कंपन होता है; और जैसे कामरूप स्पर्शनेन्द्रिय द्वारा विषय का एकदेश स्पर्श किए जाने पर अथवा रसना इन्द्रिय के विषय में (प्रवृत्ति होने पर) सर्वांग से सुखानुभव होता है; और जैसे एक स्थान पर सर्प के काटने पर या व्रणादिक (घाव / फ़ोडा आदि) होने पर सर्वांग से दु:ख वेदना होती है; उसीप्रकार लोक में ही स्थित कालद्रव्य से सर्वत्र अलोकाकाश में भी परिणमन हो जाता है ।

प्रश्न - यह कैसे हो जाता है?

उत्तर - अखण्ड एक द्रव्य होने से यह हो जाता है।

प्रश्न - कालद्रव्य अन्य द्रव्यों की परिणति में सहकारी कारण है, काल की परिणति में सहकारी कारण कौन है?

उत्तर -आकाश का आकाश ही आधार के समान; ज्ञान, सूर्य, रत्न, प्रदीपों के स्व-पर प्रकाशक के समान; कालद्रव्य की परिणति में काल ही सहकारी कारण है।

प्रश्न -अब यह मत है कि जैसे कालद्रव्य अपने परिणमन का स्वयं ही सहकारी है; उसीप्रकार शेष द्रव्य भी अपने परिणमन के स्वयं ही सहकारी कारण हो जायें; कालद्रव्य से क्या प्रयोजन है?

उत्तर - सभी द्रव्यों के परिणमन में साधारण सहकारीत्व काल का ही गुण है। वह कैसे? यदि ऐसा प्रश्न हो तो कहते हैं -- आकाश का सभी को साधारण अवकाशदान के समान, धर्मद्रव्य का साधारण गति हेतुत्व के समान, अधर्म का स्थिति हेतुत्व के समान, काल का परिणमनहेतुत्व है। वह भी कैसे? यदि यह प्रश्न हो तो उत्तर देते हैं -- संकर-व्यतिकर दोषों की प्राप्ति होने से अन्य द्रव्य का गुण अन्य द्रव्य के गुण रूप नहीं किया जा सकता है ।

दूसरी बात यह है कि यदि सभी द्रव्य अपने-अपने परिणमन में उपादान कारण के समान यदि सहकारी कारण भी होते हैं तो गति, स्थिति, अवगाहनरूप परिणमन के विषय में सहकारी कारणभूत धर्म, अधर्म, आकाश द्रव्यों से भी क्या प्रयोजन है? गति, स्थिति, अवगाहन भी स्वयं ही हो जाएगा।

प्रश्न - वैसा होने पर क्या दोष है?

उत्तर - (ऐसा होने पर जीव-पुद्गल नामक दो ही द्रव्य होंगे और यह तो आगम से विरुद्ध है।)

यहाँ विशुद्ध दर्शन-ज्ञान स्वभावी शुद्ध जीवास्तिकाय की प्राप्ति न होने के कारण अतीत अनन्तकाल से यह जीव संसार-चक्र में घूम रहा है, उस कारण से वीतराग निर्विकल्प समाधि में स्थिर होकर, समस्त रागादिरूप संकल्प-विकल्पमयी कल्लोलों की माला (तरंगसमूहों) के परिहार के बल यही जीव निरन्तर ध्यान करने योग्य है ऐसा भावार्थ है ॥२४॥

इसप्रकार निश्चय-काल-व्याख्यान की मुख्यता से दो गाथायें पूर्ण हुईं ।

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