• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 30-31 - समय-व्याख्या

From जैनकोष



अगुरुलहुगाणंता तेहिं अणंतेहिं परिणदा सव्वे । (30)

देसेहिं असंखादा सियलोगं सव्वमावण्णा ॥31॥

केचिच्च अणावण्णा मिच्छादंसणकसायजोग जुदा । (31)

विजुदा य तेहिं बहुगा सिद्धा संसारिणो जीवा ॥32॥

अर्थ: 

अगुरुलघुक अनंत हैं, उन अनन्तों द्वारा सभी परिणमित हैं, वे प्रदेशों की अपेक्षा असंख्यात हैं । उनमें से कुछ तो कथंचित् सम्पूर्ण लोक को प्राप्त हैं और कुछ अप्राप्त हैं । अनेक जीव मिथ्यादर्शन, कषाय से सहित संसारी हैं तथा अनेक उनसे रहित सिद्ध हैं ।

समय-व्याख्या: 

अत्र जीवानां स्‍वाभाविकं प्रमाणं मुक्तामुक्तविभागश्‍चाक्त: । जीवा ह्यविभागैकद्रव्‍यत्‍वाल्‍लोकप्रमाणैकप्रदेशा: । अगुरुलघवो गुणास्‍तु तेषामलघुगुरुत्‍वाभिधानस्‍य स्‍वरूपप्रतिष्‍ठत्‍वनिबंधनस्‍य स्‍वभावस्‍याविभागपरिच्‍छेदा: । प्रतिसमयसंभवत्‍षट᳭स्‍थानपतितवृद्धिहानयोऽनंता: । प्रदेशास्‍तु अविभागपरमाणुपरिच्छिन्‍नसूक्ष्‍मांशरूपा असंख्‍येया: । एवंविधेषु तेषु केचित्‍कथंचिल्‍लोकपूरणावस्‍थाप्रकारेण सर्वलोकव्‍यापिन:, केचित्त तद᳭व्‍यापिन इति । अथ ये तेषु मिथ्‍यादर्शनकषाययोगैरनादिसंततिप्रवृत्तैर्युक्तास्‍ते संसारिण:, ये विमुक्तास्‍ते सिद्धा:, ते च प्रत्‍येकं बहव इति ॥३०-३१॥

समय-व्याख्या हिंदी : 

यहाँ जीवों का स्वाभाविक प्रमाण तथा उनका मुक्त और अमुक्त ऐसा विभाग कहा है ।

जीव वास्तव में अविभागी--एक-द्रव्य-पने के कारण लोक-प्रमाण--एक-प्रदेश-वाले हैं । उनके (जीवों के) अगुरुलघु-गुण--अगुरुलघुत्व नाम का जो स्वरूप-प्रतिष्ठित्व के कारण-भूत स्वभाव उसका अविभाग परिच्छेद--प्रतिसमय होने वाली षट्-स्थान-पतित वृद्धि-हानि वाले अनंत हैं; और (उनके अर्थात जीवों के) प्रदेश-- जो कि अविभाग परमाणु जितने माप-वाले सूक्ष्म अंश-रूप हैं वे--असंख्य हैं । ऐसे उन जीवों में कतिपय (कुछ) कथंचित (केवल-समुद्घात के कारण) लोक-पूरण-अवस्था के प्रकार द्वारा समस्त लोक में व्याप्त होते हैं और कतिपय (कुछ) समस्त लोक में अव्याप्त होते हैं । और उन जीवों में जो अनादी प्रवाह-रूप से प्रवर्तमान मिथ्यादर्शन-कषाय-योग सहित हैं वे संसारी हैं, जो उनसे विमुक्त हैं (मिथ्यादर्शन-कषाय-योग से रहित हैं) वे सिद्ध हैं; और वे हर प्रकार के जीव बहुत हैं (संसारी तथा सिद्ध जीवों में से हर एक प्रकार के जीव अनंत हैं) ॥३०-३१॥

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

समय-व्याख्या अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_30-31_-_समय-व्याख्या&oldid=115671"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki