• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 49 - समय-व्याख्या

From जैनकोष



समवत्ती समवाओ अपुधब्भूदो य अजुदसिद्धो य । (49)

तम्हा दव्वगुणाणं अजुदा सिद्धित्ति णिदिट्ठा ॥56॥

अर्थ: 

समवर्तित्व, समवाय, अपृथग्भूतत्व और अयुतसिद्धत्व - ये एकार्थवाची हैं; इसलिए द्रव्य-गुणों के अयुतसिद्धि है -- ऐसा कहा है ।

समय-व्याख्या: 

समवायस्‍य पदार्थान्‍तरत्‍वनिरासोऽयम् । द्रव्‍यगुणानामेकास्तित्‍वनिर्वृत्तत्‍वादनादिरनिधना सहवृत्तिर्हि समवर्तित्‍वम्; स एव समवायो जैनानाम्; तदेव संज्ञादिभ्‍यो भेदेऽपि वस्‍तुत्‍वेनाभेदादपृथग्‍भूतत्‍वम्; तदेव युतसिद्धिनिबंधस्‍यास्तित्‍वान्‍तरस्‍याभावादयुतसिद्धत्‍वम् । ततो द्रव्‍यगुणानां समवर्तित्‍वलक्षणसमवायभाजामयुतसिद्धिरेव, न पृथग्‍भूतत्‍वमिति ॥४९॥

समय-व्याख्या हिंदी : 

यह, समवाय में पदार्थांतर-पना होने का निराकरण (खण्डन) है ।

द्रव्य और गुण एक अस्तित्व से रचित हैं उनकी जो अनादि-अनन्त सहवृत्ति (एक साथ रहना) वह वास्तव में समवर्ती-पना है; वाही जैनों के मत में समवाय है; वही, संज्ञादि भेद होने पर भी (द्रव्य और गुणों को संज्ञा-लक्षण-प्रयोजन आदि से भेद होने पर भी) वस्तु-रूप से अभेद होने से अपृथक्पना है; वही, युत-सिद्ध के कारण-भूत १अस्तित्वान्तर का अभाव होने से अयुत-सिद्ध-पना है । इसलिए २समवर्तित्व-स्वरूप समवाय-वाले द्रव्य और गुणों को अयुत-सिद्ध ही है, पृथक्-पना नहीं है ॥४९॥

१अस्तित्वान्तर = भिन्न अस्तित्व (युत-सिद्धि का कारण भिन्न-भिन्न अस्तित्व है । लकड़ी और लकड़ी-वाले की भाँति गुण और द्रव्य के अस्तित्व कभी भिन्न ण होने से उन्हें युत्सिद्ध-पना नहीं हो सकता )

२समवाय स्वरूप समवर्ती-पना अर्थात् अनादि-अनन्त सहवृत्ति है । द्रव्य और गुणों को ऐसा समवाय (अनादि-अनन्त तादात्म्य सहवृत्ति) होने से उन्हें अयुत-सिद्धता है, कभी भी पृथक-पना नहीं है ।

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

समय-व्याख्या अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_49_-_समय-व्याख्या&oldid=115709"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki