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ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 4 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



जीवा पोग्गलकाया धम्माधम्मं तहेव आयासं । ।

अत्थित्तम्हि य णियदा अणण्णमइया अणुमहंता ॥4॥

अर्थ: 

जीव, पुद्गलकाय, धर्म, अधर्म और आकाश अस्तित्व में नियत, अनन्यमय और अणुमहान है।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

अब पाँच अस्तिकायों के विशेष नाम, सामान्य-विशेष अस्तित्व और कायत्व का प्रतिपादन करते हैं --

[जीवा पोग्गलकाया धम्माधम्मं तहेव आयासं] जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश इन पाँच अस्तिकायों के विशेष नाम अन्वर्थपरक (सार्थक) जानना चाहिए। [अस्थित्तम्हि य णियदा] वे अस्तित्व में, सामान्य-विशेष सत्ता में नियत हैं, स्थित हैं । तब फिर वे कुंडे में वेर के समान सत्ता से भिन्न होंगे? (ऐसा प्रश्न होने पर उत्तर देते हैं) ऐसा नहीं है, [अणण्णमइया] वे अनन्यमय, अपृथग्भूत हैं; जैसे घड़े में रूपादि, शरीर में हाथ आदि, स्तम्भ में सार । इस प्रकार का व्याख्यान होने से आधार-आधेयभाव होने पर भी उनका अस्तित्व अबिनाभूत, अभिन्न कहा गया है । इसीप्रकार अणु महान का विश्लेषण उन्होंने अणुओं से महान, दो अणुओं से महान तथा अणु और महान, अणु महान -- इसप्रकार तीन रूपों में किया है । अब कायत्व कहते हैं -- [अणुमहंता] अणु द्वारा ज्ञात होने से यहाँ अणु शब्द से प्रदेश लेना चाहिए, अणु अर्थात् प्रदेशों से महान; द्वयणुक, स्कन्ध की अपेक्षा दो अणुओं से महान है । इसप्रकार कायत्व कहा गया। एकप्रदेशी अणु के कायत्व कैसे है? यदि ऐसा प्रश्न हो तो कहते हैं - स्कन्धों की कारण-भूत स्निग्ध-रूक्षत्व शक्ति का सद्भाव होने के कारण उपचार से उसे कायत्व है । कालाणुओं के बंध कारण-भूत स्निग्ध-रूक्षत्व शक्ति का अभाव होने के कारण उपचार से भी कायत्व नहीं हैं ।

प्रश्न - उनमें इस शक्ति का भी अभाव किस कारण है ?

उत्तर - अर्मूर्तत्त्व होने के कारण उनमें उस शक्ति का अभाव हैं। पाँच अस्तिकायों के विशेष नाम अस्तित्व और कायत्व कहे गये । यहाँ गाथा-सूत्र में अनन्त ज्ञानादि रूप शुद्ध जीवास्तिकाय ही उपादेय है -- यह भावार्थ है ॥४॥

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इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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