• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 61 - समय-व्याख्या

From जैनकोष



कम्मं पि सयं कुव्वदि सगेण भावेण सम्ममप्पाणं । (61)

जीवो वि य तारिसओ कम्मसहावेण भावेण ॥68॥

अर्थ: 

कर्म अपने स्वभाव से सम्यक् रूप में स्वयं को करता है; उसी प्रकार जीव भी कर्मस्वभाव (रागादि) भाव से सम्यक् रूप में स्वयं को करता है।

समय-व्याख्या: 

अत्र निश्‍चयपयेनाभिन्नकारकत्‍वाकर्मणो जीवस्‍य च स्‍वयं स्‍वरूपकर्तृत्‍वमुक्तम् । कर्म खलु कर्मत्‍वप्रवर्तमानपुद᳭गलस्‍कंधरूपेण कर्तृतामनुबिभ्राणं, कर्तत्‍वगमनशक्तिरूपेण करणतामात्‍मसात्‍कुर्वत्, प्राप्‍यकर्मत्‍वपरिणामरूपेण कर्मतां कलयत्, पूर्वभावव्‍यपायेऽपि ध्रुवत्‍वालंबनादुपात्तापादानत्‍पम्, उपजायमानपरिणामरूपकर्मणाश्रीयमाणत्‍वादुपोढसंप्रदानत्‍वम् आधीयमानपरिणामाधारत्‍वाद᳭गृहीताधिकरणत्‍वं, स्‍वयमेव षट᳭कारकीरूपेण व्‍यवतिष्‍ठमानं न कारकांतरमपेक्षते । एवं जीवोऽपि भावपर्यायेण प्रवर्तमानात्‍मद्रव्‍यरूपेण कर्तृतामनुबिभ्राणो, भावपर्यायगमनशक्तिरूपेण करणतामात्‍मसात्‍कुर्वन्, प्राप्‍यभावपर्यायरूपेण कर्मतां कलयन्, पूर्वभावपर्यायव्‍यपायेऽपि ध्रुवत्‍वालंबनादुपात्तापादानत्‍व:, उपजायमानभावपर्यायरूपकर्मणाश्रीयमाणात्‍वादुपोढसंप्रदानत्‍वं:, आधीयमानभावपर्यायाधारत्‍वाद᳭गृहीताधिकरणत्‍व:, स्‍वयमेव षट᳭कारकीरूपेण व्‍यवतिष्‍ठमानो न कारकांतरमपेक्षते । अत: कर्मण: कर्तुनास्ति जीव: कर्ता, जीवस्‍य कर्तुनास्ति कर्म कर्तृ निश्‍चयेनेति ॥६१॥

समय-व्याख्या हिंदी : 

निश्चय-नय से अभिन्न कारक होने से कर्म और जीव स्वयं स्वरूप के (अपने-अपने रूप के) कर्ता हैं ऐसा यहाँ कहा है ।

कर्म वास्तव में

  1. कर्म-रूप से प्रवर्तमान पुद्गल-स्कन्ध-रूप से कर्तृत्व को धारण करता हुआ,
  2. कर्मपना प्राप्त करने की शक्तिरूप करणपने को अंगीकृत करता हुआ,
  3. प्राप्य ऐसे कर्मत्व-परिणाम-रूप से कर्मपने का अनुभव करता हुआ,
  4. पूर्व भाव का नाश हो जाने पर भी ध्रुवत्व को अवलम्बन करने से जिसने अपादानपने को प्राप्त किया है ऐसा,
  5. उत्पन्न होने वाले परिणाम-रूप कर्म द्वारा समाश्रित होने से (अर्थात् उत्पन्न होने वाले परिणाम-रूप कार्य अपने को दिया जाने से) सम्प्रदान को प्राप्त और
  6. धारण किये हुए परिणाम का आधार होने से जिसने अधिकरण-पने को ग्रहण किया है ऐसा
--स्वयमेव षटकारक-रूप से वर्तता हुआ अन्य कारक की अपेक्षा नहीं रखता ।

इस प्रकार जीव भी

  1. भाव-पर्याय-रूप से प्रवर्तमान आत्म-द्रव्य-रूप से कर्तृत्व को धारण करता हुआ,
  2. भाव-पर्याय प्राप्त करने की शक्ति-रूप करण-पने को अंगीकृत करता हुआ,
  3. प्राप्य ऐसी भाव-पर्याय-रूप से कर्म-पने का अनुभव करता हुआ,
  4. पूर्व भाव-पर्याय का नाश होने पर भी ध्रुवत्व का अवलम्बन करने से जिसने अपादान-पने को प्राप्त किया है ऐसा,
  5. उत्पन्न होने वाले भाव-पर्याय-रूप कर्म द्वारा समाश्रित होने से (अर्थात् उत्पन्न होने वाला भाव-पर्याय-रूप कार्य अपने को दिया जाने से) सम्प्रदान-पने को प्राप्त और
  6. धारण की हुई भाव-पर्याय का आधार होने से जिसने अधिकरण-पने को ग्रहण किया है ऐसा
--स्वयमेव षटकारक-रूप से वर्तता हुआ अन्य कारक की अपेक्षा नहीं रखता ।

इसलिए निश्चय से कर्मा-रूप कर्ता को जीव कर्ता नहीं है और जीव-रूप कर्ता को कर्म कर्ता नहीं है । (जहां कर्म कर्ता है वहाँ जीव कर्ता नहीं है और जहां जीव कर्ता है वहाँ कर्म कर्ता नहीं है) ॥६१॥

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

समय-व्याख्या अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_61_-_समय-व्याख्या&oldid=115735"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki