• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:पंचास्तिकाय संग्रह-सूत्र - गाथा 8 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



सत्ता सव्वपदत्था सविस्सरूवा अणंतपज्जाया ।

भंगुप्पादधुवत्ता सप्पडिवक्खा हवदि एक्का ॥8॥

अर्थ: 

सत्ता सर्व पदार्थों में स्थित, सविश्वरूप, अनन्त पर्यायमय, भंग-उत्पाद-ध्रौव्य स्वरूप, सप्रतिपक्ष और एक है ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

वह इसप्रकार- अब अस्तित्व के स्वरूप का निरूपण करते हैं; अथवा द्रव्य सत्तामूलक सत्ता से सत्तामय है; अत: सर्वप्रथम सत्ता का स्वरूप कहकर, बाद में द्रव्य का व्याख्यान करता हूँ ऐसा अभिप्राय मन में धारणकर भगवान (आचार्य-कुन्दकुन्द-देव) इस सूत्र (गाथा) का प्रतिपादन करते हैं --

[हवदि] है। कर्ता कौन है? [सत्ता] सत्ता है। वह कैसी है? [सव्वपदत्था] सर्वपदार्थमय है। और वह कैसी है ? [सविस्सरूवा] सविश्वरूप / अनेकरूप है । वह और किस विशेषतावाली है? [अणंतपज्जाया] अनंत पर्याययुक्त है। वह और कैसी है? [भंगुप्पादधुवत्ता] भंग / व्यय, उत्पाद, ध्रौव्यात्मक है। वह और किस विशेषतावाली है? [एक्का] महा-सत्तारूप से एक है । इन पाँच विशेषणों से विशिष्ट सत्ता क्या निरंकुश, नि:प्रतिपक्ष है? ऐसा नहीं है, वह [सप्पडिवक्खा] सप्रतिपक्ष ही है -- ऐसा वार्तिक है ।

वह इसप्रकार -- स्व-द्रव्यादि चतुष्टय-रूप से सत्ता की, पर-द्रव्यादि चतुष्टय-रूप से असत्ता प्रतिपक्ष है। सभी पदार्थों में स्थित सत्ता की, एक पदार्थ में स्थित सत्ता प्रतिपक्ष है । मिट्टी का घड़ा, सुवर्ण का घड़ा, ताम्र का घड़ा इत्यादि रूप से सविश्वरूप / नानारूप सत्ता की, एक घटरूप सत्ता प्रतिपक्ष है; अथवा विवक्षित एक घड़े में वर्ण, आकार आदि रूप से विश्वरूप की, विवक्षित एक गंधादि रूप सत्ता प्रतिपक्ष है। तीनों कालों की अपेक्षा अनन्त पर्याय-युक्त सत्ता की, विवक्षित एक पर्याय-रूप सत्ता प्रतिपक्ष है ।

उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यरूप से त्रिलक्षणा सत्ता की, विवक्षित एक उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यरूप सत्ता प्रतिपक्ष है । एक महासत्ता की, अवान्तर-सत्ता प्रतिपक्ष है । इसप्रकार शुद्ध संग्रह-नय की विवक्षा में एक महा-सत्ता, अशुद्ध संग्रह-नय की विवक्षा में, व्यवहार-नय की विवक्षा में सर्व-पदार्थ-मयी, सविश्वरूप आदि अवान्तर-सत्ता है । यह सभी सप्रतिपक्ष व्याख्यान नैगम-नय की अपेक्षा जानना चाहिए । इसप्रकार नैगम, संग्रह, व्यवहार -- इन तीन नयों से सत्ता का व्याख्यान घटित करना चाहिए; अथवा शुद्ध संग्रहनय से एक महासत्ता है, व्यवहारनय से सर्वपदार्थ स्थित आदि अवान्तर-सत्ता है । -- इसप्रकार दो नयों से व्याख्यान करना चाहिए। यहाँ शुद्ध जीवास्तिकाय नामक शुद्ध जीव-द्रव्य की जो सत्ता है वह ही उपादेय है -- यह भावार्थ है ॥८॥

इस प्रकार प्रथम स्थल में सत्ता लक्षण की मुख्यता परक व्याख्यान द्वारा गाथा पूर्ण हुई ।

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की समय-व्याख्या टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:पंचास्तिकाय_संग्रह-सूत्र_-_गाथा_8_-_तात्पर्य-वृत्ति&oldid=115794"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 30 June 2023, at 13:26.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki