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ग्रन्थ

ग्रन्थ:पद्मपुराण - पर्व 107

From जैनकोष



एक सौ सातवां पर्व

अथानंतर भव-भ्रमण से उत्पन्न महादुःख को सुनकर कृतांतवक्त्र सेनापति ने दीक्षा लेने की इच्छा से राम से कहा कि मिथ्यामार्ग में भटक जाने के कारण मैं इस अनादि संसार में खेद खिन्न हो रहा हूँ अतः अब मुनिपद धारण करने की इच्छा करता हूँ ॥1-2॥ तब राम ने कहा कि उत्तम स्नेह छोड़कर इस अत्यंत दुर्धरचर्या को किस प्रकार धारण करोगे ? ॥3॥ शीत उष्ण आदि के तीव्र परीषह तथा महाकंटकों के समान दुर्जन मनुष्यों के वचन किस प्रकार सहोगे ?॥4॥ जिसने कभी क्लेश का संपर्क जाना नहीं तथा जो कमल के मध्यभाग के समान कोमल है ऐसे तुम हिंसक जंतुओं से भरे हुए वन में पृथिवी तल पर रात्रि किस तरह बिताओगे ? ।।5॥ जिसकी हड्डियों तथा नसों का जाल स्पष्ट दिख रहा है तथा जिसने एक पक्ष, एक मास आदिका उपवास किया है ऐसे तुम परगृह में हस्तरूपी पात्र में भिक्षा-भोजन कैसे ग्रहण करोगे ? ॥6॥ जिसने हाथियों के समूह से व्याप्त शत्रुओं की सेना कभी सहन नहीं की है ऐसे तुम नीच जनों से प्राप्त पराभव को किस प्रकार सहन करोगे ? ॥7।।

तदनंतर कृतांतवक्त्र ने कहा कि जो आपके स्नेहरूपी रसायन को छोड़ने के लिए समर्थ है उसके लिए अन्य क्या असह्य है ? ॥8॥ जब तक मृत्युरूपी वन के द्वारा शरीर रूपी स्तंभ नहीं गिरा दिया जाता है तब तक मैं दुःख से अंधे इस संसाररूपी संकट से बाहर निकल जाना चाहता हूँ ॥9॥ अग्नि की ज्वालाओं से प्रज्वलित घर से निकलते हुए मनुष्यों को जिस प्रकार दयालु मनुष्य रोककर उसी घर में नहीं रखते हैं उसी प्रकार दुःख से संतप्त संसार से निकले हुए प्राणी को दयालु मनुष्य उसी संसार में नहीं रखते हैं ॥10॥ जब कि अभी नहीं तो बहुत समय बाद भी आप जैसे महान् पुरुषों के साथ वियोग होगा ही तब संसार को बुरा समझने वाला कौन पुरुष आत्मा के हित को नहीं समझेगा ? ॥11॥ यह ठीक है कि आपके वियोग से होने वाला दुःख अवश्य ही अत्यंत असह्य है फिर भी ऐसा दुःख पुनः प्राप्त न हो इसीलिए मेरी यह बुद्धि उत्पन्न हुई है ॥12॥

तदनंतर व्यग्र हुए राम ने बड़ी कठिनाई से आँसू रोककर कहा कि मेरे समान लक्ष्मी को छोड़कर जो तुम उत्तम व्रत धारण करने के लिए उन्मुख हुए हो अतः तुम धन्य हो ॥13॥ इस जन्म से यदि तुम निर्वाण को प्राप्त न हो सको और देव होओ तो संकट में पड़ा हुआ मैं तुम्हारे द्वारा संबोधने योग्य हूँ ॥14॥ हे भद्र ! यदि मेरे द्वारा किया हुआ एक भी उपकार तुम मानते. हो तो यह बात भूलना नहीं। ऐसी प्रतिज्ञा करो ॥15॥ 'जैसी आप आज्ञा कर रहे हैं वैसा ही होगा' इस प्रकार कहकर तथा विधिपूर्वक प्रणाम कर उत्कट वैराग्य से भरा सेनापति सर्वभूषण केवली के पास गया और प्रणाम कर तथा बाह्याभ्यंतर सर्व प्रकार का परिग्रह छोड़ सौम्यवक्त्र हो गया। अब वह आत्महित के विषय में तीव्र पराक्रमी हो गया, गृह जंजाल से निकल चुका तथा सुंदर चेष्टा का धारक हो गया ॥16-17॥ इस प्रकार परम वैराग्य को प्राप्त एवं महासंवेग से संपन्न कितने ही महाराजाओं ने निर्ग्रंथ व्रत धारण किया― जिन-दीक्षा ली ॥18॥ कितने ही लोग श्रावक हुए और कितने ही लोग सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए। इस प्रकार हर्षित हो रत्नत्रयरूपी आभूषणों से विभूषित वह सभा अत्यंत सुशोभित हो रही थी ॥19॥

अथानंतर जब सकलभूषण स्वामी उस पर्वत से विहार कर गये तब भक्तिपूर्वक प्रणाम कर सुर और असुर यथास्थान चले गये ॥20॥ कमललोचन राम सकलभूषण केवली तथा मुक्ति के सिद्ध करने में तत्पर साधुओं को यथाक्रम से प्रणाम कर विनीत भाव से उस सीता के पास गये जो कि निर्मल तेज को धारण कर रही थी तथा घी की आहुति से उत्पन्न अग्नि की शिखा के समान देदीप्यमान थी ॥21-22॥ वह शांतिपूर्वक आर्यिकाओं के समूह के मध्य में स्थित थी, उसकी स्वयं की किरणों का समूह देदीप्यमान हो रहा था, वह उत्तम शांत भौंहों से युक्त थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो समूह से आवृत दूसरी ही ध्रुवतारा हो ॥23॥ जो सम्यक्चारित्र के धारण करने में अत्यंत दृढ़ थी, जिसने माला, गंध तथा आभूषण छोड़ दिये थे, फिर भी जो धृति, कीर्ति, रति, श्री और लज्जारूप परिवार से युक्त थी। जो कोमल सफेद चिकने एवं लंबे वस्त्र को धारण कर रही थी, अतएव मंद-मंद वायु से जिसके फेन का समूह मिल रहा था ऐसी पुण्य की नदी के समान जान पड़ती थी अथवा खिले हुए काश के फूलों के समूह से विशद शरद् ऋतु के समान मालूम होती थी अथवा कुमुदों के समूह को विकसित करने वाली कार्तिकी पूर्णिमा की चाँदनी के समान विदित होती थी, अथवा जो महाविराग से ऐसी जान पड़ती थी मानो दीक्षा को प्राप्त हुई साक्षात् लक्ष्मी ही हो, अथवा शरीर को धारण करने वाली साक्षात् जिनशासन की देवी ही हो ।।24-27॥ ऐसी उस सीता को देख संभ्रम से जिनका हृदय टूट गया था ऐसे राम क्षण भर कल्पवृक्ष के समान निश्चल खड़े रहे ॥28॥ स्वभाव से निश्चल नेत्र और भृकुटियों की प्राप्ति होने पर इस साध्वी सीता का ध्यान करते हुए राम ऐसे जान पड़ते थे मानो शरद् ऋतु की मेघमाला के समीप कोई पर्वत ही खड़ा हो ॥29।। सीता को देख-देखकर राम विचार कर रहे थे कि यह मेरी भुजाओं रूपी पिंजरे के भीतर विद्यमान उत्तम सेना है अथवा मेरे नेत्ररूपी कुमुदिनी के लिए स्वभावतः चंद्रमा की कला है ॥30॥ जो मेरे साथ रहने पर भी मेघ के शब्द से भी भय को प्राप्त हो जाती थी वह बेचारी तपस्विनी भयंकर वन में किस प्रकार भयभीत नहीं होगी ? ॥31॥ विलंब की गुरुता के कारण जो सुंदर एवं अलसाई हुई चाल चलती थी वह सुकोमल सीता तप के द्वारा निश्चित ही नाश को प्राप्त हो जायगी ॥32॥ कहाँ यह शरीर और कहाँ जिनेंद्र का कठोर तप ? जो हिम वृक्ष को जला देता है उसे कमलिनी के जलाने में क्या परिश्रम है ? ॥33।। जिसने पहले इच्छानुसार परम मनोहर अन्न खाया है, वह अब जिस किसी तरह प्राप्त हुई भिक्षा को कैसे प्रहण करेगा? ॥34॥ वीणा, बाँसुरी तथा मृदंग के मांगलिक शब्दों से युक्त तथा स्वर्गलोक के सदृश उत्तम भवन में स्थित जिस सीता की निद्रा, उत्तम शय्यापर सेवा करती थी वही कातर सीता अब डाभ को अनियों से व्याप्त एवं मृगों के शब्द से व्याप्त वन में भयानक रात्रि को किस तरह बितावेगी? ॥35-36।। देखो, चित्त मोह से युक्त है ऐसे मैने क्या किया ? न कुछ साधारण मनुष्यों की निंदा से प्रेरित हो प्राणवल्लभा छोड़ दी ॥37॥ जो अनुकूल है, प्रिय है, पतिव्रता है, सर्व संसार की अद्वितीय सुंदरी है, प्रिय वचन बोलने वाली है, और सुख की भूमि है ऐसी दूसरी स्त्री कहाँ है ? ॥38॥ इस तरह चिंता के भार से जिनका चित्त व्याप्त था, जो अत्यंत दुखी थे, तथा जिनकी आत्मा काँप रही थी ऐसे राम चंचल कमलाकर के समान हो गये ॥39॥ तदनंतर केवली के वचनों का स्मरण कर जिन्होंने उमड़ते हुए आँसू रोके थे तथा जो बड़ी कठिनाई से अपनी उत्सुकता को रोक सके थे ऐसे श्रीराम किसी तरह पीड़ा रहित हुए ॥40॥

अथानंतर स्वाभाविक दृष्टि को धारण करते हुए राम ने संभ्रम के साथ सती सीता के पास जाकर भक्ति और स्नेह के साथ उसे नमस्कार किया ॥41॥ राम के साथ ही साथ सौम्यहृदय लक्ष्मण ने भी हाथ जोड़ प्रणाम कर आर्या सीता का अभिनंदन किया ॥42॥ और कहा कि हे भगवति ! तुम धन्य हो, उत्तम चेष्टा की धारक हो और यतश्च इस समय पृथिवी के समान शीलरूपी सुमेरु को धारण कर रही हो अतः हम सबकी वंदनीय हो ॥43॥ जिसके द्वारा तुम संसार-समुद्र को चुपचाप पार करोगी वह श्रेष्ठ जिनवचन रूपी अमृत सर्व प्रथम तुमने ही प्राप्त किया है । 44।। हम चाहते हैं कि सुंदर चित्त की धारक अन्य पतिव्रता स्त्रियों की भी दोनों लोकों में प्रशंसनीय यही गति हो ॥45।। इस प्रकार के क्रियायोग को प्राप्त करने वाली एवं उत्तम चित्त की धारक तुमने अपनी आत्मा दोनों कुल तथा लोक सब कुछ वश में किया है।॥46॥ हे सुनये! हमने जो कुछ साधु अथवा असाधु-अच्छा या बुरा कर्म किया है वह क्षमा करने योग्य है क्योंकि संसार दशा में आसक्त मनुष्यों से भल पद पद पर होती है ॥47॥ हे शांते ! हे मनस्विनि ! इस तरह जिन-शासन में आसक्त रहने वाली तुमने मेरे विषाद युक्त चित्त को भी अत्यंत आनंदित कर दिया है।॥48॥

इस प्रकार सीता की प्रशंसा कर प्रसन्न चित्त की तरह राम तथा लक्ष्मण, लवण और अंकुश को आगे कर नगरी की ओर चले ॥49॥ परम हर्ष को प्राप्त हुए विद्याधर राजा विस्मयाकंपित होते हुए बड़े वैभव से आगे-आगे जा रहे थे ।।50॥ हजारों राजाओं के मध्य में वर्तमान दोनों मनोहर वीरों ने, देवों से घिरे हुए इंद्रों के समान नगर में प्रवेश किया ॥51॥ उनके आगे नाना प्रकार के वाहनों पर आरूढ़, बेचैन एवं अपने-अपने परिकर से विधिपूर्वक सेवित रानियाँ जा रही थीं ।।52।। राम को प्रवेश करते देख महल के शिखरों पर आरूढ़ स्त्रियाँ, विचित्र रस से युक्त परस्पर वार्तालाप कर रही थीं ॥53॥ कोई कह रही थी कि ये राम बड़े मानी तथा शुद्धि में तत्पर हैं कि जिन्होंने विद्वान् होकर भी अपनी अनुकूल प्रिया हरा दी है-छोड़ दी है ॥54॥ कोई कह रही थी कि विशुद्ध कुल में जन्म लेने वाले वीर मनुष्यों की यही रीति है। इन्होंने जो किया है वह ठीक किया है ॥5॥। इस प्रकार की घटना से निष्कलंक हो दीक्षा धारण करने वाली जानकी किसके मन के लिए सुख उत्पन्न करने वाली नहीं है ? ॥56।। कोई कह रही थी कि हे सखि ! सीता से रहित इन राम को देखो। ये चाँदनी से रहित चंद्रमा और दीप्ति से रहित सूर्य के समान जान पड़ते हैं ।।57।। कोई कह रही थी कि बुद्धिमान् राम स्वयं ही अत्यंत सुंदर हैं, दूसरे के आधीन होने वाली कांति इनका क्या करेगी ? ॥58॥ कोई कह रही थी कि हे सीते ! ऐसे पुरुषोत्तम पति को छोड़कर तूने क्या किया ? यथार्थ में तू वज्र के समान कठोर चित्त वाली है ॥59।। कोई कह रही थी कि सीता परमधन्य, विवेकवती, पतिव्रता एवं यथार्थ स्त्री है जो कि आत्महित में तत्पर हो घर के अनर्थ से निकल गई― दूर हो गई ॥60॥ कोई कह रही थी कि हे सीते ! तेरे द्वारा ये दोनों सुकुमार, मन को आनंद देने वाले तथा अत्यंत भक्त पुत्र कैसे छोड़े गये ? ॥61॥ कदाचित् भर्ता पर स्थित स्त्रियों का प्रेम विचलित हो जाता है परंतु अपने दूध से पुष्ट किये हुए पुत्रों पर कभी विचलित नहीं होता ॥62॥ कोई कह रही थी कि दोनों कुमार पुण्य से पोषण प्राप्त करने वाले परमोत्तम पुरुष हैं । यहाँ माता क्या करती है ? जब कि सब लोग अपने-अपने कर्म में निरत हैं अर्थात् कर्मानुसार फल प्राप्त करते हैं ।।63।। इस प्रकार वार्तालाप करने वाली तथा पद्म अर्थात् राम (पक्ष में कमल) के देखने में तत्पर स्त्रियाँ भ्रमरियों के समान तृप्ति को प्राप्त नहीं हुई ।।64॥ कितने ही उत्तम मनुष्य लक्ष्मण को देखकर कह रहे थे कि यह वह नारायण है कि जो अद्भुत लक्ष्मी से सहित है, अपने प्रभाव से जिसने संसार को आक्रांत कर रक्खा है, जो हाथ में चक्ररत्न को धारण करने वाला है, देदीप्यमान है, लक्ष्मीपति है, सर्वोत्तम है और शत्रु स्त्रियों का मानो साक्षात् शरीरधारी वैधव्य व्रत ही है ॥65-66।। इस प्रकार नगरवासी लोगों के समूह प्रशंसा कर जिन्हें नमस्कार कर रहे थे ऐसे राम और लक्ष्मण अपने भवन में उस तरह प्रविष्ट हुए जिस तरह कि दो इंद्र स्वयं विमान में प्रविष्ट होते हैं ॥67।। गौतमस्वामी कहते हैं कि जो मनुष्य राम के इस चरित को निरंतर जानता है-अच्छी तरह इसका अध्ययन करता है वह निष्पाप हो लक्ष्मी प्राप्त करता है तथा सूर्य से भी अधिक शोभायमान होता है ॥8॥

इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य द्वारा कथित श्री पद्मपुराण में सीता की दीक्षा का वर्णन करने वाला एक सौ सातवाँ पर्व समाप्त हुआ ।।107।।


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