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ग्रन्थ

ग्रन्थ:पद्मपुराण - पर्व 43

From जैनकोष



अथानंतर उज्ज्वल शरद् ऋतु, चंद्रमा की किरणरूपी बाणों के द्वारा मेघसमूह को जीतकर समस्त विश्व में व्याप्त होती हुई राज्य करने लगी ॥1॥ जिनका चित्त स्नेह से भर रहा था ऐसी दिशारूपी स्त्रियों ने उस शरद् ऋतु के स्वागत के लिए ही मानो खिले हुए पुष्प समूह से सुशोभित वृक्षरूपी उत्तमोत्तम अलंकार धारण किये थे ॥2॥ मेघरूपी मल से रहित आकाशरूपी आंगन, मुदित अंजन के समान श्यामवर्ण हो ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो बहुत देर तक पानी से धुल जाने के कारण ही स्वच्छ हो गया है ॥3॥ वर्षा कालरूप हाथी, मेघरूपी कलशों के द्वारा पृथिवी रूपी लक्ष्मी का अभिषेक कर बिजलीरूपी कक्षाओं में सुशोभित होता हुआ जान पड़ता है कहीं चला गया था ॥4॥ भ्रमरों के समूह बहुत समय बाद कमलिनी के घर जाकर मधुरालाप करते हुए सुख से बैठे थे ॥5॥ जिनके पुलिन धीरे-धीरे उन्मग्न हो रहे हैं ऐसी स्वच्छ जल से भरी नदियाँ शरत्कालरूपी वल्लभ को पाकर परम कांति को प्राप्त हो रहीं थीं ॥6॥ वर्षा काल की तीक्ष्ण वायु से रहित वन चिरकाल बाद सुख से बैठकर ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो निद्रा से संगत ही थे नींद ही ले रहे थे ॥7॥ कमलों से युक्त सरोवर तटों पर उत्पन्न हुए वृक्षों के साथ पक्षियों के शब्द के बहाने मानो वार्तालाप ही कर रहे थे ॥8॥ जिसने नाना प्रकार के फूलों की सुगंधि धारण की थी तथा जो आकाशरूपी स्वच्छ वस्त्र से सुशोभित थी ऐसी रात्रिरूपी स्त्री उत्तमकालरूपी पति को पाकर मानो चंद्रमारूपी तिलक को धारण कर रही थी ॥9॥ केतकी के फूलों से उत्पन्न पराग के द्वारा शरीर शुक्लवर्ण हो रहा था ऐसी वायु कामिनी जनों को उन्मत्त करती हुई धीरे-धीरे बह रही थी ।। 10 ।। इस प्रकार जिसमें समस्त संसार उत्साह से युक्त था ऐसे उस शरत्काल के प्रसन्नता को प्राप्त होने पर सिंह के समान निर्भय विचरने वाले महापराक्रमी लक्ष्मण बड़े भाई राम से आज्ञा प्राप्त कर दिशाओं की ओर दृष्टि डालते हुए किसी समय अकेले ही उस दंडक वन के समीप घूम रहे थे ।। 11-12॥ उसी समय उन्होंने विनयी पवन के द्वारा लायी हुई दिव्य सुगंधि सूंघी । उसे सूंघते ही वे विचार करने लगे कि यह मनोहर गंध किसकी होनी चाहिए ? ॥13 ।। क्या यह गंध विकसित फूलों को धारण करने वाले इन वृक्षों की है अथवा पुष्पसमूह पर शयन करने वाले मेरे शरीर की है ? ॥14॥ अथवा ऊपर सीता के साथ श्रीराम विराजमान हैं ? या कोई देव यहाँ आया है ? ॥15॥ तदनंतर मगधदेश के सम्राट् राजा श्रेणिक ने गौतम स्वामी से पूछा कि हे भगवन् ! वह किसकी गंध थी जिसने लक्ष्मण को आश्चर्य उत्पन्न किया था ॥16 ।। तदनंतर लोगों की चेष्टाओं को जानने वाले, संदेहरूपी अंधकार को नष्ट करने के लिए सूर्य एवं पापरूपी धूलि को उड़ाने के लिए वायु स्वरूप गणधर भगवान बोले ॥17॥ कि द्वितीय जिनेंद्र श्रीअजितनाथ के समवशरण मेघवाहन नाम का विद्याधर भयभीत होकर प्रभु की शरण में आया था । उस समय राक्षसों के अधिपति बुद्धिमान् महाभीम ने करुणावश मेघवाहन के लिए इस प्रकार वर दिया था ॥18-19।। कि हे मेघवाहन ! दक्षिणसमुद्र में एक विशाल राक्षस द्वीप है उसी द्वीप में त्रिकूट नाम का पर्वत है सो तू निश्चिंत होकर उसी त्रिकूट पर्वत पर चला जा । वहाँ जंबूद्वीप की जगती (वेदिका) का आश्रय कर दक्षिणदिशा में राक्षसों ने एक लंका नाम की नगरी बसायी है । वहाँ ही तू निवास कर । हे विद्याधर ! इसके साथ ही एक रहस्य― गुप्तवार्ता और सुन । जंबूद्वीप संबंधी भरतक्षेत्र की दक्षिणदिशा में लवणसमुद्र के उत्तरतट का आश्रय कर पृथिवी के भीतर एक लंबा-चौड़ा स्वाभाविक स्थान है जो योजन के आठवें भाग विस्तृत है । दंडक पर्वत के गुफा द्वार से नीचे जाने पर मणिमय तोरणों से देदीप्यमान एक महाद्वार मिलता है उसमें प्रवेश करने पर अलंकारोदय नाम का एक उत्कृष्ट सुंदर नगर दिखाई देता है ॥20-25॥ वह नगर नाना प्रकार के रत्नों की किरणों के समूह से सुशोभित है तथा देवों को भी आश्चर्य उत्पन्न करने में समर्थ है । आकाश में गमन करने वाले विद्याधर उसका विचार ही नहीं कर सकते तथा विद्या से रहित मनुष्यों के लिए वह अत्यंत दुर्गम है । वह सब प्रकार के मनोरथों को पूर्ण करने वाले गुणों से सहित है तथा विविध प्रकार के भवनों से व्याप्त है ॥26-27॥ यदि कदाचित् आपत्ति के समय पर चक्र के द्वारा आक्रांत हो तो उस दुर्ग का आश्रय कर निर्भय निवास करना ॥28॥ इस प्रकार महाभीम राक्षसेंद्र के कहने पर जो विद्याधर बालक, लंकापुरी गया था उसी से अनेक उत्तमोत्तम संतति उत्पन्न हुई ।।29।। जो पदार्थ जिस प्रकार अवस्थित हैं उनका उसी प्रकार श्रद्धान् करना सो परमसुख है और मिथ्या कल्पित पदार्थों का ग्रहण करना सो अत्यधिक दुःख है ॥30॥ विद्याधरों और देवों के बीच बुद्धिमान् मनुष्यों को शक्ति, कांति आदि गुणों के कारण तिल तथा पर्वत के समान भारी भेद समझना चाहिए ॥31॥ जिस प्रकार कीचड़ और चंदन तथा पाषाण और रत्न में भेद है उसी प्रकार विद्याधर और देवों में भेद है ॥32।। विद्याधर तो गर्भवास का दुःख भोगकर बाद में कर्मोदय की अनुकूलता से विद्या मात्र के धारक होते हैं । ये विद्याधरों के क्षेत्र-विजयार्धपर्वत पर तथा उनके योग्य कुलों में उत्पन्न होते हैं तथा आकाश में चलते हैं इसलिए खेचर कहलाते हैं । परंतु देवों का स्वभाव ही मनोहर है ।। 33-34॥ देव सुंदर रूप तथा पवित्र शरीर के धारक हैं, गर्भावास से रहित हैं, मांस-हड्डी तथा स्वेद आदि से दूर हैं और टिमकार रहित नेत्रों के धारक हैं ।। 35 ।। वे वृद्धावस्था तथा रोगों से रहित हैं, सदा यौवन से सहित रहते हैं, उत्कृष्ट तेज से युक्त, सूख और सौभाग्य के सागर, स्वाभाविक विद्याओं से संपन्न, अवधिज्ञानरूपी नेत्रों के धारक, इच्छानुसार रूप रखने वाले, धीर, वीर और स्वच्छंद गति से विचरण करने वाले हैं ॥36-37।। हे राजन् ! लंका में रहने वाले विद्याधर न देव हैं और न राक्षस हैं किंतु राक्षस द्वीप की रक्षा करते हैं इसलिए राक्षस कहलाते हैं ॥38॥ अनेक युगांतरों के साथ उनके वंश का अनुक्रम चला आता है और उसी अनुक्रम-परंपरा के अनुसार अनेक सागर प्रमाण काल व्यतीत हो चुका है ।।39।। राक्षस आदि बहुत से प्रशंसनीय उत्तमोत्तम विद्याधर राजाओं के व्यतीत हो चुकने पर उसी वंश में तीन खंड का स्वामी रावण उत्पन्न हुआ है ।। 40॥ उसकी एक दुर्नखा नाम की बहन है जो पृथ्वी पर अपने सौंदर्य की उपमा नहीं रखती । उसने महाशक्तिशाली खरदूषण नामक पति प्राप्त किया है ॥41॥ अतिशय बलवान् खरदूषण चौदह हजार प्रमाण मनुष्यों का विश्वास प्राप्त सेनापति है ॥42॥ वह दिक्कुमार-भवनवासीदेव के समान उदार है । पृथ्वी के मध्य में स्थित अलंकारपुर नाम का नगर उस महाप्रतापी का निवास स्थान है ।।43॥ उसके शंबूक और सुंद नाम के दो पुत्र उत्पन्न हुए थे । साथ ही वह अपने संबंधी रावण से भी पृथ्वी पर गौरव को प्राप्त हुआ था ॥44॥ जिसे मृत्यु का फंदा देख रहा था ऐसे शंबूक ने गुरुजनों के द्वारा रोके जाने पर भी सूर्यहास नामा खड़ग् प्राप्त करने के लिए भयंकर वन में प्रवेश किया ॥45॥ हे राजन् ! वह यथोक्त आचरण करता हुआ सूर्यहास खड़ग् को प्राप्त करने के लिए उद्यत हुआ । वह एक अन्न खाता है, निर्मल आत्मा का धारक है, ब्रह्मचारी है और इंद्रियों को जीतने वाला है, ॥46॥ उपयोग पूर्ण हुए बिना जो मेरी दृष्टि के सामने आवेगा वह मेरे द्वारा वध्य होगा इस प्रकार कहकर वह वंशस्थल पर्वत परवंश की एक झाड़ी में जा बैठा ॥47॥ वह दंडकवन के अंत में क्रौंचरवा नदी और समुद्र के उत्तरतट के बीच जो स्थान है वहाँ अवस्थित है ॥48॥ तदनंतर बारह वर्ष व्यतीत होने पर वह सूर्यहास नामा खड़ग् प्रकट हुआ जो सात दिन ठहरकर ग्रहण करने योग्य होता है अन्यथा सिद्ध करने वाले को ही मार डालता ॥49।। दुर्नखा (चंद्रनखा) पुत्र के स्नेह से उसे बार-बार देखने के लिए उस स्थान पर आती रहती थी सो उसने उसी क्षण उत्पन्न उस देवाधिष्ठित सूर्यहास खड़ग् को देखा ॥50॥ जिसका मुख प्रसन्नता से भर रहा था ऐसी दुर्नखा ने अपने पति खरदूषण से कहा कि हे महाराज ! मेरा पुत्र मेरुपर्वत की प्रदक्षिणा देकर तीन दिन में आ जायेगा क्योंकि उसका नियम आज भी समाप्त नहीं हुआ है ॥51-52॥ इस प्रकार इधर शंबूक की माता चंद्रनखा, सिद्ध हुए मनोरथ का सदा ध्यान कर रही थी उधर लक्ष्मण वन में घूमते हुए उस स्थान पर जा पहुँचे ॥53॥ एक हजार देव जिसकी पूजा करते थे, जिसको स्वाभाविक उत्तम गंध थी, जिसका न आदि था न अंत था, जो दिव्य गंध से लिप्त था और दिव्य मालाओं से जो अलंकृत था ऐसे सूर्यहास नामक खड̖ग रत्न की गंध लक्ष्मण तक पहुँची ॥54-55॥ आश्चर्य को प्राप्त हुए लक्ष्मण अन्य कार्य छोड़कर जिस मार्ग से गंध आ रही थी उसी मार्ग से सिंह के समान निर्भय हो चल पड़े ॥56॥ । वहाँ जाकर उन्होंने वृक्षों से आच्छादित, लताओं के समूह से घिरा तथा ऊँचे-ऊंचे पाषाणों से वेष्टित एक अत्यंत दुर्गम स्थान देखा ।। 57।। इसी वन के बीच में एक समान पृथ्वीतल था जो चित्र-विचित्र रत्नों से बना था तथा सुवर्णमय कमलों से अचित था ।। 58 ꠰। उसी समान धरातल के मध्य में एक बांसों का विस्तृत स्तंभ ( भिड़ा ) था जो किसी अज्ञात कुतूहल के कारण सौधर्म स्वर्ग को देखने के लिए ही मानो ऊँचा उठा हुआ था ॥59 ।।

अथानंतर उस बाँसों के स्तंभ में देदीप्यमान किरणों के समूह से सुशोभित एक खड̖ग दिखाई दिया जिससे बाँसों के साथ-साथ समस्त वन प्रज्वलित-सा जान पड़ता था ॥60॥ आश्चर्य चकित लक्ष्मण ने नि:शंक हो वह खड̖ग ले लिया और उसकी तीक्ष्णता को परख करने के लिए उसी वंश स्तंभ को उन्होंने काट डाला ॥61॥ खड̖गधारी लक्ष्मण को देखकर वहाँ सब देवताओं ने आप हमारे स्वामी हो यह कहकर नमस्कार के साथ-साथ उनकी पूजा की ॥62॥

अथानंतर जिनके नेत्र कुछ-कुछ आँसुओं से भर रहे थे ऐसे राम ने यह कहा कि आज लक्ष्मण बड़ी देर कर रहा है कहाँ गया होगा ? ।।63 ।। हे भद्र जटायु ! उठो और शीघ्र ही आकाश में दूर तक उड़कर लक्ष्मण कुमार की अच्छी तरह खोज करो ॥64 ।। इस प्रकार राम के करुणा पूर्वक कहने पर जटायु उड़ने को तैयारी करता है कि इतने में सीता अंगुलि ऊपर उठाकर कहती है ॥65॥ कि जिनका शरीर केशर की पंक से लिप्त है, जो नाना प्रकार की मालाओं और वस्त्रों को धारण कर रहे हैं तथा जो अलंकारों से अलंकृत हैं ऐसे लक्ष्मण यह आ रहे हैं ॥66॥ इन्होंने यह महादेदीप्यमान खड̖ग ले रखा है और इससे ये सिंह से पर्वत के समान अत्यंत सुशोभित हो रहे हैं ॥67॥ लक्ष्मण को वैसा देख राम का मन आश्चर्य से व्याप्त हो गया तथा वे हर्ष को रोकने के लिए असमर्थ हो गये जिससे उन्होंने उठकर उनका आलिंगन किया ॥68॥ पूछने पर लक्ष्मण ने अपना सब वृत्तांत बतलाया । इस तरह राम-लक्ष्मण और सीता― तीनों प्राणी नाना प्रकार की कथाएँ करते हुए सुख से वहाँ ठहरे ॥69॥

अथानंतर जो चंद्रनखा प्रतिदिन खड̖ग को तथा नियम में स्थित पुत्र को देख जाती थी उस दिन वह अकेली ही वहाँ आयी ॥70॥ आते ही उसने बाँसों के उस समस्त वन को सब ओर से कटा देखा । वह विचार करने लगी कि पुत्र इस अटवी में रहकर अब कहाँ चला गया ? ।।71॥ जिस वन में यह रहा तथा जहाँ यह खड̖ग रत्न सिद्ध हुआ परीक्षा के लिए उसी वन को काटते हुए पुत्र ने अच्छा नहीं किया ॥72॥ इतने में ही उसने अस्ताचल पर स्थित सूर्यमंडल के समान निष्प्रभ, तथा कुंडलों से युक्त शिर और एक ठूँठ के बीच पड़ा हुआ पुत्र का धड़ देखा ।। 73।। उसी क्षण मूर्च्छा ने उसका परम उपकार किया जिससे पुत्र की मृत्यु से उत्पन्न दुःख से वह पीड़ित नहीं हुई । सचेत होनेपर हाहाकार से मुखर शिर ऊपर उठाकर उसने बड़ी कठिनाई से पुत्र के शिर पर दृष्टि डाली ॥74-75।। झरते हुए आँसुओं से जिसके नेत्र आकुलित थे तथा जो अपनी छाती कूट रही थी ऐसी शौक से पीड़ित चंद्रनखा, वन में अकेली कुररी के समान विलाप करने लगी ।। 76 ।। मेरा पुत्र बारह वर्ष और चार दिन तक यहाँ रहा । हाय दैव ! इसके आगे तूने तीन दिन सहन नहीं किये ॥77॥ हे अतिशय निष्ठुर दैव ! मैंने तेरा क्या अपकार किया था जिससे पुत्र को निधि दिखाकर सहसा नष्ट कर दिया ॥78।। निश्चय ही मुझ पापिनी ने अन्य जन्म में किसी का पुत्र हरा होगा इसीलिए तो मेरा पुत्र मृत्यु को प्राप्त हुआ है ।। 79।। हे पुत्र! तू मुझ से उत्पन्न हुआ था फिर ऐसी दशा को कैसे प्राप्त हो गया ? अथवा इसी अवस्था में तू दुःख को दूर करने वाला एक वचन तो मुझे हे----एक बार तो मुझ से बोल ॥80।। आओ वत्स ! अपना मनोहर रूप धरकर आओ । यह तेरी अमंगल रूप छल क्रीड़ा अच्छी नहीं लगती ।। 81 ।। हाय वत्स ! भाग्यवश तू स्पष्ट ही परलोक चला गया है । यह कार्य अन्य प्रकार से सोचा था और अन्य प्रकार हो गया ।। 82 ।। तूने कभी भी माता के प्रतिकूल कार्य नहीं किया है अब यह अकारण विनय का त्याग क्यों कर रहा है ? ।।83 ।। सूर्यहास खड̖ग सिद्ध होनेपर यदि तू जीवित रहेगा तो इस संसार में चंद्रहास से आवृत की तरह ऐसा कौन पुरुष है जो तेरे सामने खड़ा हो सकेगा ? ॥84॥ चंद्रहास खड̖ग मेरे भाई के पास है सो जान पड़ता है उसने अपने विरोधी सूर्यहास खड̖ग को सहन नहीं किया है ।। 85॥ तू इस भयंकर वन में अकेला रहकर नियम का पालन करता था किसी का कुछ भी अपराध तूने नहीं किया था फिर भी किस मूर्ख दुष्ट शत्रु का हाथ तुझे मारने के लिए आगे बढ़ा ? ।।86 ।। तुम्हें मारते हुए उस शत्रु ने शीघ्र ही प्रकट होने वाली अपनी उपेक्षा प्रकट की है । अब वह अविचारी पापी कहाँ जायेगा? ॥87॥ इस प्रकार उत्तम पुत्र को गोद में रखकर विलाप करते-करते जिसके नेत्र मूंगा के समान लाल हो गये थे ऐसी चंद्रनखा ने हाथ में लेकर पुत्र का चुंबन किया ॥88॥

तदनंतर क्षण एक में शोक छोड़कर वह उठी । उसके अश्रुओं की धारा नष्ट हो गयी और तीव्र क्रोध धारण करने से उसका मुख दमकने लगा ॥89॥ वह मार्ग के समीप में ही स्थित उस स्थानार इच्छानुसार इधर-उधर घूमने लगी । उसी समय उसने चित्त को बाँधने वाले दोनों तरुण-राम-लक्ष्मण को देखा ॥90 ।। उन्हें देखते ही उसका वैसा तीव्र क्रोध नष्ट हो गया और आदेश के समान उसके स्थानपर परम रागरूपी रस आ जमा ।। 11 ।। इसके बाद उसने ऐसा विचार किया कि इन दोनों पुरुषों में से मैं अपने इच्छुक पुरुष को वरूँगी इस प्रकार उसके मन में ऊँची तरंगें उठने लगीं ॥12॥ ऐसा विचार कर वह कन्या भाव को प्राप्त हुई । वह उस समय भावरूपी गुफा में वर्तमान हृदय से अत्यंत आतुर हो रही थी ॥13॥ जिस प्रकार हंसी कमलिनी के झुंड में, महिषी (भैंस) महासरोवर में और हरिणी धान्य में अभिलाषा से युक्त होती है उसी प्रकार वह भी राम-लक्ष्मण में अभिलाषा से युक्त हो गयी ॥94॥ वह हाथ की अंगुलियाँ चटखाती हुई भयभीत मुद्रा में पुन्नाग वृक्ष के नीचे बैठकर रोने लगी ।। 95॥ जो अत्यंत दीन शब्द कर रही थी, तथा वन की धूलि से धूसरित थी ऐसी उस कन्या को देख सीता का हृदय दया से द्रवीभूत हो गया ॥96 ।। वह उठकर उसके पास गयी तथा शरीर पर हाथ फेरने लगी । तदनंतर डरो मत यह कहकर उसका हाथ पकड़कर पति के पास ले आयी । उस समय वह कुछ-कुछ लज्जित हो रही थी, तथा मलिन वस्त्र को धारण किये हुई थी । सीता उसे शुभ वचनों से सांत्वना दे रही थी ॥97-98।।

तदनंतर राम ने उससे कहा कि हे कन्ये! जंगली जानवरों से भरे इस वन में अतिशय दुःख से युक्त तू कौन अकेली विचरण कर रही है ? ।।99 ।। तदनंतर संभाषण प्राप्त कर जिसके नेत्र कमल के समान खिल रहे थे ऐसी वह कन्या भ्रमर समूह का अनुकरण करने वाली वाणी से बोली ॥100॥ कि हे पुरुषोत्तम ! मूर्छा आने पर मेरी माता मर गयी और उसके उत्पन्न शोक से पिता भी मर गये ॥101 ।। इस तरह पूर्वोपाजित पाप के कारण बंधुजनों से रहित हो परम वैराग्य को धारण करती हुई मैं इस दंडकवन में प्रविष्ट हुई थी ॥102 ।। पाप का माहात्म्य तो देखो कि मैं यद्यपि मृत्यु की इच्छा करती हूँ फिर भी इस महाभयंकर वन में दुष्ट जीव भी मुझे छोड़ देते हैं ॥103 ।। चिरकाल से इस निर्जन वन में भ्रमण करती हुई मैंने पापकर्म के क्षय से आज आप सज्जनों के दर्शन किये हैं ।। 104॥ जो पहले का अपरिचित मनुष्य किसी मनुष्य से मैत्रीभाव प्रकट करता है, विना बुलाया निर्लज्ज हो उसके पास जाता है तथा बिना आदर के शून्य चित्त हो अधिक भाषण करता है वह क्रमहीन मनुष्य किसे द्वेष नहीं उत्पन्न करता? ॥105-106॥ ऐसी होनेपर भी हे सुंदर ! जब तक मैं प्राण नहीं छोड़ती हूँ तब तक आज ही मुझे चाहो, मेरी इच्छा करो मुझ दुःखिनी पर दया करो ॥107॥ जो न्याय से संगत है, साध्वी है, सर्व प्रकार की बाधाओं से रहित है, तथा जिसकी कल्याणरूप प्रकृति है ऐसी कन्या को इस संसार में कौन नहीं चाहता ?॥108॥ राम-लक्ष्मण उसके लज्जा शून्य वचन सुनकर परस्पर एक दूसरे को देखते हुए चुप रह गये ॥109॥ समस्त शास्त्रों के अर्थज्ञानरूपी जल से धुला हुआ उनका निर्मल मन करने योग्य तथा नहीं करने योग्य कार्यों में अत्यंत प्रकाशित हो रहा था ॥110 ।। दुःख-भरी श्वास छोड़कर जब उसने कहा कि मैं जाती हूँ तब राम आदि ने उत्तर दिया कि जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो ॥111 ।। उसके जाते ही उसकी अकुलीनता से प्रेरित हुए शूरवीर राम-लक्ष्मण सीता के साथ आश्चर्य से चकित हो हँसने लगे ।। 112 ।।

तदनंतर शोक से व्याकुल चंद्रनखा मन मार क्रुद्ध हो उड़कर शीघ्र ही अपने घर चली गयी ॥113॥ लक्ष्मण उसकी सुंदरता से हरे गये थे इसलिए उनके नेत्र चंचल हो रहे थे । वे उसे पुनः देखने की इच्छा करते हुए विरह से आकुल हो गये ॥114॥ वे किसी अन्य कार्य के बहाने राम के पास से उठकर चंद्रनखा की खोज में व्यग्र होते हुए पैदल ही वन में भ्रमण करने लगे ॥115॥ जिनका हृदय अत्यंत खिन्न था, जिनके नेत्र आँसुओं से व्याप्त थे, जिन्होंने अपने आपके विषय में प्रकट हुए चंद्रनखा के प्रेम की उपेक्षा की थी तथा जो उसके प्रेम से परिपूर्ण थे ऐसे लक्ष्मण इस प्रकार विचार करने लगे कि जो रूप-यौवन-सौंदर्य तथा अनेक गुणों से परिपूर्ण थी, जिसके स्तन अतिशय सघन थे और जो कामोन्मत्त हस्तिनी के समान चलती थी ऐसी उस सती का मैंने आने तथा दिखने के साथ ही स्तनों को पीड़ित करने वाला आलिंगन क्यों नहीं किया ॥116-118॥ उसके वियोग से मोहित हुआ मेरा चित्त कर्तव्य वस्तु― करने योग्य कार्य से च्युत होता हुआ इस समय शोकरूपी अग्नि के द्वारा निर्वाध रूप से जल रहा है ॥119॥ वह किस देश में उत्पन्न हुई है । किसकी पुत्री है ? यह उत्तम नेत्रों की धारक झुंड से बिछुड़ी हरिणी के समान यहाँ कहाँ से आयी थी ? ॥120॥ इस प्रकार विचार कर जो इधर-उधर भ्रमण कर रहे थे तथा उसे न देखकर जो अत्यंत व्याकुल थे ऐसे लक्ष्मण ने उस वन को सब ओर से आकाशपुष्प के समान माना था ॥121॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! निर्मल चित्त के धारक मनुष्यों को इस तरह परमार्थ के जाने बिना निरर्थक कार्य प्रारंभ नहीं करना चाहिए । क्योंकि जो बालकों के समान निर्बुद्धि मनुष्य अयोग्य विषय में चित्त लगाते हैं वे उसकी प्राप्ति से रहित हो परम शोक को धारण करते हैं ॥122।। यह क्या है ? इसमें मुझे मन क्यों लगाना चाहिए ? वह इष्ट क्यों है ? और करने योग्य कार्यों का अनुसरण करने वाले मनुष्य ही सुख-शांति प्राप्त कर पाते हैं । इस प्रकार विचार कर जो उत्कृष्ट विवेक का कर्ता होता है वह सूर्य की तरह निर्मल होता हुआ लोक के मार्ग में सुशोभित होता है ॥123 ।।

इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मचरित में शंबूक के वध का वर्णन करने वाला तैंतालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥43॥


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