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ग्रन्थ

ग्रन्थ:पद्मपुराण - पर्व 65

From जैनकोष



पैसठवां पर्व

अथानंतर प्रतिचंद्र विद्याधर के वचन सुन जिन्हें अत्यंत हर्ष हो रहा था ऐसे श्रीराम ने आश्चर्यचकित हो विद्याधर राजाओं के साथ-साथ उसका बहुत आदर किया ॥1॥ और शीघ्र ही निश्चित मंत्रणा कर हनुमान् भामंडल तथा अंगद को अयोध्या की ओर रवाना किया ॥2॥ तदनंतर इच्छा करते ही वे सब वहाँ पहुँच गये जहाँ उत्तम कीर्ति के धारक प्रतापी एवं गुणवान् राजा भरत विराजमान थे ॥3॥ उस समय भरत सोये हुए थे इसलिए सहसा उठाने से उन्हें दुःख न हो ऐसा विचार कर भामंडल आदि ने सुखदायी संगीत प्रारंभ किया ॥4॥ तदनंतर कर्ण और मन को हरण करने वाले उस भावपूर्ण दिव्य संगीत को सुनकर भरत महाराज धीरे-धीरे जाग उठे ।। 5 ।। हनुमान आदि द्वार के पास तो खड़े ही थे इसलिए जागते ही खबर देकर उनके पास जा पहुँचे । वहाँ पहुँचकर उन्होंने सीता का हरा जाना तथा शक्ति लगने से लक्ष्मण का गिर जाना यह समाचार कहा ॥6॥ अथानंतर क्षणमात्र में उत्पन्न हुए, अतिशय उग्र शोक रस से राजा भरत परम क्रोध को प्राप्त हुए ॥7॥ उन्होंने उसी समय रण में प्रीति उत्पन्न कराने वाली रणभेरी का महाशब्द कराया जिसे सुनकर समस्त अयोध्या परम आकुलता को प्राप्त हो गयी ।। 8 ।। लोग कहने लगे कि राजभवन में अत्यंत भय उत्पन्न करने वाला महान् कल-कल शब्द सुनाई पड़ रहा है सो यह क्या कारण है ? ।।9।। क्या इस अर्धरात्रि के समय दुष्ट बुद्धि का धारक तथा आक्रमण करने में निपुण अतिवीर्य का पुत्र आ पहुँचा है ? ।। 10 ।। कोई एक योद्धा अंक में स्थित कांता को छोड़ कवच धारण करने के लिए उद्यत हुआ और कोई दूसरा योद्धा कवच से निरपेक्ष हो तलवार पर हाथ रखने लगा ॥11॥ कोई मृगनयनी स्त्री, सुंदर बालक को गोद में ले तथा स्तन तट पर हाथ रखकर दिशाओं का अवलोकन करने लगी अर्थात् भय से इधर-उधर देखने लगी ।। 12 ।। कोई एक स्त्री ईर्ष्या वश पति से हटकर पड़ी हुई थी और उसके नेत्रों में नींद नहीं आ रही थी । रणभेरी का शब्द सुन वह इतनी भयभीत हुई कि ईर्ष्याभाव छोड़ शय्या के एक ओर पड़े हुए निद्रातिमग्न पति से जा मिली― उससे सटकर पड़ रही ॥13॥ राजा की तुलना प्राप्त करने वाला कोई धनी मनुष्य अपनी स्त्री से कहने लगा कि हे प्रिये ! जागो, क्यों सो रही हो ? यह कोई अशोभनीय बात है ॥14॥ राजभवन में जो कभी दिखाई नहीं दिया ऐसा प्रकाश दिखाई दे रहा है । रथों के सवार तैयार खड़े हैं और ये मदोन्मत्त हाथी भी एकत्रित हैं ॥15॥ नीति के जानकार पंडित जनों को सदा सावधान रहना चाहिए । उठो उठो धन को प्रयत्नपूर्वक छिपा दो ॥16॥ ये सुवर्ण और चाँदी के घट तथा मणि और रत्नों के पिटारे तलगृह के भीतर कर दो ॥17॥ रेशमी वस्त्र आदि से भरे हुए इन गर्भगृहों को शीघ्र ही बंद कर दो तथा और जो दूसरा सामान अस्त-व्यस्त पडा है उसे ठीक तरह से रख दो ॥18॥ जिसके नेत्र निद्रा से लाल-लाल हो रहे थे ऐसा घबड़ाया हुआ शत्रुघ्न भी घंटा का शब्द करने वाले हाथी पर शीघ्र ही सवार हो भरत के महल में जा पहुंचा । शत्रुघ्न, हाथों में शस्त्र धारण करने वाले उत्तमोत्तम मंत्रियों से सहित था, वकुल की सुगंधि को छोड़ रहा था तथा उसका वस्त्र चंचल-चंचल हो रहा था । शत्रुघ्न के सिवाय दूसरे अन्य राजा भी जो हाथों में शस्त्र धारण किये हुए थे, कवचों से युक्त थे तथा राजा का हित करने में तत्पर थे भरत के महल में जा पहुँचे ॥19-21 ।। अयोध्या के स्वामी भरत, राजाओं को आज्ञा देते हुए स्वयं युद्ध के लिए उद्यत हो गये तब भामंडल आदि ने नमस्कार कर कहा कि ॥22॥ हे देव ! लंकापुरी दूर है, वहाँ जाने के लिए आप समर्थ नहीं हैं, जिसकी लहरें और शंख क्षोभ को प्राप्त हो रहे हैं ऐसा भयंकर समुद्र बीच में पडा है ।। 23 ।। तो मुझे क्या करना चाहिए, इस प्रकार राजा भरत के कहने पर उन सबने विशल्या का मनोहर चरित कहा ।। 24 ।꠰ उन्होंने कहा कि हे नाथ ! द्रोणमेघ की पुत्री का स्नानजल पाप को नष्ट करने वाला, पवित्र और जीवन की रक्षा करने वाला है सो उसे शीघ्र ही दिलाओ ॥25॥ प्रसाद करो, जब तक सूर्य उदित नहीं होता है उसके पहले ही हम चले जायेंगे । शत्रुओं का संहार करने वाले लक्ष्मण शक्ति से घायल हो दुःख में पड़े हैं ॥26 ।। तब भरत ने कहा कि जल का क्या ले जाना, वह द्रोणमेघ की सुंदरी पुत्री स्वयं ही वहाँ जावे अर्थात् उसे ही ले जाओ ॥27॥ मुनिराज ने कहा है कि यह उन्हीं की वल्लभा होगी । यथार्थ में वह उत्तम स्त्री रत्न है सो अन्य किसके योग्य हो सकती है ? ॥28॥

तदनंतर भरत ने द्रोणमेघ के पास अपना आदमी भेजा सो मान दमन करने में उद्यत वह द्रोणमेघ भी युद्ध करने के लिए कुपित हुआ ।।29।। प्रचंड बल को धारण करने वाले उसके जो पुत्र थे वे भी परम आकुलता को प्राप्त हो क्षुभित हो उठे तथा युद्ध करने के लिए मंत्रियों के साथ-साथ तैयार हो गये ॥30॥ तब भरत की माता केकयी ने स्वयं जाकर उसे बड़े आदर से समझाया जिससे उसने अपनी पुत्री दे दी ॥31॥ कांति से दिशाओं को पूर्ण करने वाली उस कन्या को भामंडल ने अपने शीघ्रगामी विमान के अग्रभाग पर बैठाया ॥32 ।। इसके सिवाय राजकुल में उत्पन्न हुई एक हजार से भी अधिक दूसरी मनोहर कन्याएँ विशल्या के साथ भेजी ॥33॥ तदनंतर निमेष मात्र में युद्धभूमि में पहुँच गयी सो समस्त विद्याधरों ने अर्घ्य आदि से उसका योग्य सन्मान किया । तत्पश्चात् जो कन्याओं से घिरी थी और जिस पर सुंदर चमरों के समूह धीरे-धीरे सूख पूर्वक झेले जा रहे थे ऐसी विशल्या विमान के अग्रभाग से नीचे उतरी ॥35॥ द्वार पर खड़े घोड़ों और मदोन्मत्त हाथियों को देखती हुई वह आगे बढ़ी । बड़े-बड़े लोग उसकी आज्ञा पालन करने में तत्पर थे तथा कमल के समान उसका मुख था ॥36॥ महाभाग्यशालिनी विशल्या जैसे-जैसे पास आती जाती थी वैसे-वैसे लक्ष्मण आश्चर्यकारी सुख दशा को प्राप्त होते जाते थे ॥37॥

तदनंतर जिस प्रकार दुष्ट स्त्री चकित हो पति के घर से निकल जाती है उसी प्रकार कांति के मंडल को धारण करने वाली शक्ति लक्ष्मण के वक्षःस्थल से बाहर निकल गयी ॥38॥ जिससे तिलगे और ज्वालाएं निकल रही थीं ऐसी वह शक्ति, शीघ्र ही आकाश को लांघती हई जाने लगी सो वेगशाली हनुमान ने उछलकर उसे पकड़ लिया ॥39॥ तब वह दिव्य स्त्री के रूप में परिणत हो हाथ जोड़कर हनुमान से बोली । उस समय वह घबड़ायी हुई थी तथा उसके शरीर से कंपकपी छूट रही थी ॥40॥ उसने कहा कि हे नाथ! प्रसन्न होओ, मुझे छोड़ो, इसमें मेरा दोष नहीं है, हमारे जैसे सेवकों की ऐसी ही निंद्य दशा है ॥41॥ मैं तीनों लोकों में प्रसिद्ध अमोघ विजया नाम की विद्या हूँ, प्रज्ञप्ति की बहन हूँ और रावण ने मुझे सिद्ध किया है ॥42॥ कैलास पर्वत पर पहले जब बालिमुनि प्रतिमा योग से विराजमान थे तब रावण ने जिन-प्रतिमाओं के समीप भुजा की नाड़ी रूपी मनोहर तंत्री निकाल कर जिनेंद्र भगवान् का दिव्य एवं शुभचरित वीणा द्वारा गाया था । रावण की भक्ति के प्रभाव से धरणेंद्र का आसन कंपायमान हुआ था जिससे परम प्रमोद को धारण करते हुए उसने वहाँ आकर रावण के लिए मुझे दिया था । यद्यपि राक्षसों का इंद्र रावण मुझे नहीं चाहता था तथापि धरणेंद्र ने प्रेरणा कर बड़ी कठिनाई से मुझे स्वीकृत कराया था । यथार्थ में रावण किसी से वस्तु ग्रहण करने में सदा संकुचित रहता था ॥43-46 ।। वह मैं, इस संसार में दुःसह तेज की धारक एक विशल्या को छोड़ और किसी की पकड़ में नहीं आ सकती ॥47॥ मैं अतिशय बलवान् देवों को भी पराजित कर देती हूँ किंतु इस विशल्या ने दूर रहने पर भी मुझे पृथक् कर दिया ॥48॥ यह सय को ठंडा और चंद्रमा को गरम कर सकती है क्योंकि इसने पूर्वभव में ऐसा ही अत्यंत कठिन तपश्चरण किया है ॥49॥ इसने पूर्वभव में अपना शिरीष के फूल के समान सुकुमार शरीर ऐसे तप में लगाया था कि जो प्रायः मुनियों के लिए भी कठिन था ॥50॥ मुझे इतने ही कार्य से संसार सारभूत जान पड़ता है कि इसमें जीवों द्वारा ऐसे-ऐसे कठिन तप सिद्ध किये जाते हैं ॥51॥ तीव्र वायु से जिनका सहन करना कठिन था ऐसे भयंकर वर्षा शीत और घाम से यह कृशांगी सुमेरु की चूलिका के समान रंचमात्र भी कंपित नहीं हुई ॥52॥ अहो इसका रूप धन्य है, अहो इसका धैर्य धन्य है और अहो धर्म में दृढ़ रहने वाला इसका मन धन्य है । इसने जो तप किया है अन्य स्त्रियाँ उसका ध्यान भी नहीं कर सकतीं ॥53॥ सर्वथा जिनेंद्र भगवान् के मत में ही ऐसा विशाल तप धारण किया जाता है कि जिसका इस प्रकार का फल तीनों लोकों में एक जुदा ही जयवंत रहता है ॥54॥ अथवा इसे कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिए क्योंकि जिससे मोक्ष प्राप्त हो सकता है उसके लिए और दूसरा कौन कार्य कठिन है ? ॥55॥ मेरा काम तो पराधीन है देखिए न, इसने मुझे तप से जीत लिया । हे सत्पुरुष ! अब मैं अपने स्थान पर जाती हूँ― मेरी दुश्चेष्टा क्षमा की जाये ॥56॥ इस प्रकार वार्तालाप करने वाली उस शक्तिरूपी देवता को छोड़कर तत्त्व का जानकार तथा अद्भुत चेष्टा का धारक हनुमान् अपनी सेना में स्थित हो गया ॥57॥

अथानंतर जिसका शरीर लज्जा से अलंकृत था, जिसने श्रीराम के चरण-कमलों में प्रणाम कर हाथ जोड़े थे, विद्याधर महामंत्रियों के वचनों से जिसकी प्रशंसा की गयी थी, अन्य विद्याधरों ने जिसे वंदना कर शुभाशीर्वाद से अभिनंदित किया था, जो उत्तम लक्षणों को धारण करने वाली थी; महाभाग्यवती थी, और सखियों की आज्ञाकारिणी थी ऐसी द्रोणमेघ की पुत्री विशल्या लक्ष्मण के पास जाकर उस प्रकार खड़ी हो गयी जिस प्रकार मानो इंद्र के पास इंद्राणी ही खड़ी हो ।। 58-60।। जो अत्यंत सुंदरी थी, भोली मृगी के समान जिसके नेत्र थे, पूर्णचंद्र के समान जिसका मुख था, और महा अनुराग के भार से जिसका उदार हृदय प्रेरित था ऐसी विशल्या ने एकांत में पृथिवी तल पर सुख से सोये हुए प्राणनाथ लक्ष्मण का आलिंगन कर उन्हें सुकोमल हस्त कमल में स्थित होने से अत्यंत सुंदर दिखने वाले गोशीर्ष चंदन से खूब अनुलिप्त किया तथा लज्जा से कुछ-कुछ कांपते हुए हाथ से श्रीराम को भी चंदन का लेप लगाया ॥61-63 ।। शेष कन्याओं ने विशल्या के हाथ में स्थित चंदन के द्वारा अन्य विद्याधरों के शरीर का स्पर्श किया ॥64।। श्रीराम के आज्ञानुसार विशल्या के हाथ का छुआ सुंदर चंदन यथाक्रम से इंद्रजित आदि के पास भी भेजा गया ॥65॥ सो उस शीतल चंदन को सूंघकर तथा आदर के साथ शरीर पर लगाकर वे सब परम सुख को प्राप्त हुए । सबकी आत्माएँ शुद्ध हो गयी तथा सबका ज्वर जाता रहा ॥66॥

इन सबके सिवाय क्षत-विक्षत शरीर के धारक जो अन्य योधा, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिक थे वे सब उसके जल से सींचे जाकर शल्यरहित तथा नूतन सूर्य― प्रातःकालीन सूर्य के समान देदीप्यमान शरीर से युक्त हो गये ॥67।। अथानंतर जो दूसरे जन्म को प्राप्त हुए के समान सुंदर थे और मानो स्वाभाविक निद्रा का ही सेवन कर रहे थे ऐसे लक्ष्मण को बाँसुरी की मधुर तान से मिश्रित उत्तम संगीत के द्वारा उठाया गया ॥68॥ तदनंतर जिनका विशाल वक्षःस्थल धीरे-धीरे उच्छ्वसित हो रहा था और जिनकी भुजाएँ फैली हुई थीं ऐसे लक्ष्मण ने कमल के समान लाल नेत्र खोलकर तथा भुजाओं को संकोचित कर मोहरूपी शय्या का परित्याग किया ॥69 ।। जिस प्रकार उपपाद शय्या को छोड़कर उत्तम शरीर का धारक देव उठकर खड़ा होता है उसी प्रकार लक्ष्मण भी रणभूमि को छोड़ खड़े हो गये और दिशाओं की ओर देख रुष्ट होते हुए बोले कि वह रावण कहां गया ? ॥70॥ तदनंतर जिनके नेत्रकमल विकसित हो रहे थे जो महान् आनंद को प्राप्त थे, उत्कट रोमांचों से जिनका शरीर कर्कश हो रहा था और जिनकी भुजाएँ अतिशय शोभायमान थी ऐसे बड़े भाई श्रीराम ने आलिंगन कर कहा कि हे तात ! रावण तो शक्ति के द्वारा आपको मार कृतकृत्य की तरह चला गया है और तुम भी इस प्रशस्त कन्या के चरित्र से पुनर्जन्म को प्राप्त हुए हो ॥71-72 ।। तत्पश्चात् अत्यंत आश्चर्य को प्राप्त हुए जांबव और सुंदर आदि ने शक्ति लगने से लेकर समस्त वृत्तांत लक्ष्मण के लिए निवेदन किया― सुनाया तथा उदार भावना से युक्त अपूर्व आश्चर्य प्रकट किया ॥73॥

तदनंतर जिसके नेत्र लाल सफेद और नीले इन तीन रंग के कमलों के समान सुशोभित थे, जिसका मुख शरदऋतु के पूर्ण चंद्रमा के समान था, जिसका उदर कृश था, जिसके दोनों स्तन दिग्गज के गंडस्थल के समान सुशोभित थे, जो नूतन यौवन अवस्था में स्थित थी जो, मानो शरीर धारिणी काम की क्रीड़ा ही थी, जिसके उत्तम नितंब विशाल तथा अलसाये हुए थे, और जिसे कर्मों ने एकाग्रचित्त हो सर्व संसार की शोभा ग्रहण कर ही मानो बनाया था ꠰꠰74-75 ।। ऐसी समीप में स्थित उस विशल्या को देख लक्ष्मण ने आश्चर्य से अवरुद्ध चित्त हो विचार किया कि क्या यह इंद्र की लक्ष्मी है ? या चंद्रमा की कांति है ? अथवा सूर्य की प्रभा है ? ॥76 ।। इस प्रकार चिंता करते हुए लक्ष्मण को देख, मंगलाचार करने में निपुण स्त्रियाँ उनसे बोली कि हे स्वामिन् ! यहाँ इकट्ठे हुए सब लोग इसके साथ आपका विवाहोत्सव देखना चाहते हैं ।। 77॥ यह सुन लक्ष्मण ने मुसकराते हुए कहा कि जहाँ प्राणों का संशय विद्यमान है ऐसे युद्ध क्षेत्र में यह किस प्रकार उचित हो सकता है ? इसके उत्तर में सबने पुनः कहा कि इसके द्वारा आपका स्पर्श तो हो ही चुका है परंतु आपको प्रकट नहीं हुआ है ॥78।। हे नाथ ! आपके प्रभाव से जिसके समस्त विघ्न नष्ट हो चुके हैं ऐसा इसका पाणिग्रहण आप स्वीकृत करो । इस प्रकार लोगों की प्रार्थना तथा गौरव पूर्ण वचनों से लक्ष्मण ने विवाह करने की इच्छा की ॥79॥ तदनंतर जिसमें क्षणभर में समस्त प्रशंसनीय कार्यों का योग किया गया था, विद्याधरों ने जिसमें विशाल वैभव का विस्तार प्रदर्शित किया था, और जो देव-संपदा से कल्पित आनंद के समान था ऐसा विशल्या और लक्ष्मण का विवाहोत्सव युद्धभूमि में ही संपन्न हुआ ॥80॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जिन्होंने पूर्वजन्म में उत्तम आचरण किया है ऐसे उदार पुरुष प्राप्त हुए मरण को भी जीतकर शीघ्र ही उत्तम पदार्थों के समागम को प्राप्त होते हैं और चंद्रमा तथा सूर्य के गुणों के समान अपनी अवस्था को प्राप्त करते हैं ॥81॥

इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध, श्री रविषेणाचार्य विरचित पद्मचरित में विशल्या के समागम का वर्णन करने वाला पैसठवां पर्व समाप्त हुआ ॥65॥


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