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ग्रन्थ

ग्रन्थ:पद्मपुराण - पर्व 66

From जैनकोष



छयासठवां पर्व

अथानंतर रावण, गुप्तचरों के द्वारा विशल्या के चरित के अनुरूप लक्ष्मण का स्वस्थ होना आदि समाचार सुन आश्चर्य और ईर्ष्या दोनों से सहित हुआ तथा मंद हास्य कर धीमी आवाज से बोला कि क्या हानि है ? तदनंतर मंत्र करने में निपुण मृगांक आदि मंत्रियों ने उससे कहा ॥1-2॥ कि हे देव ! यथार्थ एवं हितकारी बात आपसे कहता हूँ आप कुपित हों चाहें संतुष्ट । यथार्थ में सेवकों को निर्भीक होकर हितकारी उपदेश देना चाहिए ॥3॥ हे देव ! आप देख चुके हैं कि राम-लक्ष्मण को पुण्यकर्म के प्रभाव से यत्न के बिना ही सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी विद्याएँ प्राप्त हो चुकी हैं ॥4॥ आपने यह भी देखा है कि उनके यहाँ भाई कुंभकर्ण तथा दो पुत्र बंधन में पड़े हैं तथा परमतेज की धारक दिव्य शक्ति व्यर्थ हो गई है ॥5॥ संभव है कि यद्यपि आप शत्रु को जीत लें तथापि यह निश्चित समझिए कि आपके भाई तथा पुत्रों का विनाश अवश्य हो जायगा ॥6॥ हे नाथ ! हम सब याचना करते हैं कि आप यह जानकर हम पर प्रसाद करो― हम सब पर प्रसन्न हूजिए । आपने हमारे हितकारी वचन को पहले कभी भग्न नहीं किया ॥7॥ सीता को छोड़ो और अपनी पहले जैसी धर्मबुद्धि को धारण करो । तुम्हारे द्वारा पालित समस्त लोग कुशल-मंगल से युक्त हो ॥6॥ राम के साथ संधि तथा मधुर वार्तालाप करो क्योंकि ऐसा करने में कोई हानि नहीं दिखाई देती अपितु बहुत लाभ ही दिखाई देता है।। समस्त संसार की मर्यादाएँ आपके ही द्वारा सुरक्षित हैं― आप ही सब मर्यादाओं का पालन करते हैं । यथार्थ में जिस प्रकार समुद्र रत्नों की उत्पत्ति का कारण है उसी प्रकार आप धर्मों की उत्पत्ति के कारण हैं ॥10॥ इतना कह वृद्ध मंत्री जनों ने शिर पर अंजलि बाँधकर रावण को नमस्कार किया और रावण ने शीघ्रता से उन्हें उठाकर कहा कि आप लोग जैसा कहते हैं वैसा ही करूँगा ।। 11 ॥

तदनंतर मंत्र के जानने वाले मंत्रियों ने संतुष्ट होकर अत्यंत शोभायमान एवं नीतिनिपुण सामंत को संदेश देकर शीघ्र ही दूत के रूप में भेजने का निश्चय किया ॥12॥ वह दूत दृष्टि के संकेत से अभिप्राय के समझने में निपुण था इसलिए रावण ने उसे संकेत द्वारा अपना रुचिकर संदेश शीघ्र ही ग्रहण करा दिया― अपना सब भाव समझा दिया ॥13॥ मंत्रियों ने दूत के लिए जो संदेश दिया था वह यद्यपि बहुत सुंदर था तथापि रावण के अभिप्राय ने उसे इस प्रकार दूषित कर दिया जिस प्रकार कि विष किसी महौषधि को दूषित कर देता है ॥14॥ तदनंतर जो बुद्धि के द्वारा शुक्राचार्य के समान था, महाओजस्वी था, प्रतापी था, राजा लोग जिसकी बात मानते थे और जो कर्णप्रिय भाषण करने में निपुण था, ऐसा सामंत संतुष्ट हो स्वामी को प्रणाम कर जाने के लिए उद्यत हुआ । वह सामंत अपनी बुद्धि के बल से समस्त लोक को गोष्पद के समान तुच्छ देखता था ॥15-16 ।। जब वह जाने लगा तब नाना शस्त्रों से देदीप्यमान एक भयंकर सेना जो उसकी बुद्धि से ही मानो निर्मित थी, निर्भय हो उसके साथ हो गई ॥17॥

तदनंतर दूत की तुरही का शब्द सुनकर वानर पक्ष के सैनिक क्षुभित हो गये और रावण के आने की शंका करते हुए भयभीत हो आकाश की ओर देखने लगे ।। 18 ।। तदनंतर वह दूत जब निकट आ गया और यह रावण नहीं किंतु दूसरा पुरुष है, इस प्रकार समझ में आ गया तब वानरों की सेना पुनः निश्चिंतता को प्राप्त हुई ॥16॥ तदनंतर भामंडलरूपी द्वारपाल ने जिसकी खबर दी थी तथा डेरे के बाहर जिसने अपने सैनिक ठहरा दिये थे, ऐसा वह दूत कुछ आप्तजनों के साथ भीतर पहुँचा ।। 20 ꠰। वहाँ उसने राम के दर्शन कर उन्हें प्रणाम किया । दूत के योग्य सब कार्य किये । तदनंतर क्षणभर ठहरकर क्रम पूर्ण निम्नांकित वचन कहे ।। 21 ।। उसने कहा कि हे पद्म ! मेरे वचनों द्वारा स्वामी रावण, आप से इस प्रकार कहते हैं सो आप कर्णों को एकाग्र कर क्षणभर श्रवण करने का प्रयत्न कीजिए ॥22॥ वे कहते हैं कि मुझे इस विषय में युद्ध से कुछ भी प्रयोजन नहीं है क्योंकि युद्ध का अभिमान करने वाले बहुत से मनुष्य क्षय को प्राप्त हो चुके हैं ।। 23 ।। कार्य की उत्तमसिद्धि प्रीति से ही होती है, युद्ध से तो केवल नरसंहार ही होता है, युद्ध में यदि सफलता नहीं मिली तो यह सबसे बड़ा दोष है और यदि सफलता मिलती भी है तो अनेक अपवादों से सहित मिलती है ।। 24॥ पहले युद्ध की श्रद्धा से दुवृत्त, नरक, शंख, धवलांग तथा शंबर आदि राजा विनाश को प्राप्त हो चुके हैं ।। 25 ।। हमारे साथ प्रीति करना ही आपके लिए अत्यंत हितकारी है, यथार्थ में सिंह महापर्वत की गुफा पाकर ही सुखी होता है ॥26॥ युद्ध में देवों को भय उत्पन्न करने वाले राजा इंद्र को जिसने सामान्य स्त्रियों के योग्य बंदीगृह में भेजा था ॥27॥ पाताल, पृथिवीतल तथा आकाश में स्वेच्छा से की हुई जिसकी गति को कुपित हुए सुर और असुर भी खंडित करने के लिए समर्थ नहीं हैं ॥28॥ नाना प्रकार के अनेक महायुद्धों में वीर लक्ष्मी को स्वयं ग्रहण करने वाला मैं रावण क्या कभी आपके सुनने में नहीं आया ।। 26 ।। हे राजन् ! मैं विद्याधरों से सहित यह समुद्र पर्यंत की समस्त पृथिवी और लंका के दो भागकर एक भाग तुम्हारे लिए देता हूँ ॥30॥ तुम आज अच्छे हृदय से मेरे भाई तथा पुत्रों को भेजकर सीता देना स्वीकृत करो, उसी से तुम्हारा कल्याण होगा ॥31 ।। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो तो तुम्हारी कुशलता कैसे हो सकती है ? क्योंकि सीता तो हमारे पास है ही और युद्ध में बाँधे हुए भाई तथा पुत्रों को हम बलपूर्वक छीन लावेंगे ॥32॥

तदनंतर श्रीराम ने कहा कि मुझे राज्य से प्रयोजन नहीं है और न अन्य स्त्रियों तथा बड़े-बडे भोगों से मतलब है ॥33॥ यदि तुम परम सत्कार के साथ सीता को भेजते हो तो हे दशानन ! मैं तुम्हारे भाई और दोनों पुत्रों को अभी भेज देता हूँ ॥34॥ मैं इस सीता के साथ मृगादि जंतुओं के स्थानभूत वन में सुखपूर्वक भ्रमण करूँगा और तुम समग्र पृथिवी का उपभोग करो ॥35 ।। हे दूत ! तू जाकर लंका के धनी से इस प्रकार कह दे कि यही कार्य तेरे लिए हितकारी है, अन्य कार्य नहीं ।꠰ 36।। सबके द्वारा पूजित तथा सुंदरता से युक्त राम के वे वचन सुन सामंत दूत इस प्रकार बोला कि ॥37॥ हे राजन् ! यतश्च तुम भयंकर समुद्र को लाँघकर निर्भय हो यहाँ आये हो इससे जान पड़ता है कि तुम बहु कल्याणकारी कार्य को नहीं जानते हो ॥38॥ सीता के प्रति तुम्हारी आशा बिल्कुल ही अच्छी नहीं है । अथवा सीता की बात दूर रही, रावण के कुपित होने पर अपने जीवन की भी आशा छोड़ो ॥36॥ बुद्धिमान मनुष्य को अपने आपकी रक्षा सदा स्त्रियों और धन के द्वारा भी सब प्रकार से करना चाहिए ॥40॥ यदि गरुडेंद्र ने तुम्हें दो वाहन भेज दिये हैं अथवा छलपूर्वक तुमने मेरे पुत्रों और भाई को बाँध लिया है तो इतने से तुम्हारा यह कौन-सा बढ़ा-चढ़ा अहंकार है ? क्योंकि मेरे जीवित रहते हुए इतने मात्र से तुम्हारी कृतकृत्यता नहीं हो जाती ॥41-42॥ युद्ध में यत्न करने पर न सीता तुम्हारे हाथ लगेगी और न तुम्हारा जीवन ही शेष रह जायगा । इसलिए दोनों ओर से भ्रष्ट न होओ, सीता संबंधी हठ छोड़ो ॥43॥ समस्त शास्त्रों में निपुण इंद्र जैसे बड़े-बड़े विद्याधर राजाओं को मैंने मृत्यु प्राप्त करा दी है ॥44॥ मेरी भुजाओं के बल से क्षय को प्राप्त हुए राजाओं के जो ये कैलास के शिखर के समान हड्डियों के ढेर लगे हुए हैं इन्हें देखो ॥45 ।।

इस प्रकार दूत के कहने पर, मुख की देदीप्यमान ज्योति से आकाश को प्रज्वलित करता हुआ भामंडल क्रोध से बोला कि अरे पापी ! दूत ! शृगाल ! बातें बनाने में निपुण ! दुर्बुद्ध ! इस तरह व्यर्थ ही निःशंक हो, क्यों बके जा रहा है ॥46-47॥ सीता की तो चर्चा ही क्या है ? राम की निंदा करने के विषय में नीच चेष्टा का धारी पशु के समान नीच राक्षस रावण है ही कौन ? ॥48॥ इतना कहकर ज्यों ही भामंडल ने तलवार उठाई त्यों ही नीतिरूपी नेत्र के धारक लक्ष्मण ने उसे रोक लिया ॥49॥ भामंडल के जो नेत्र लाल कमलदल के समान थे वे क्रोध से दूषित हो संध्या का आकार धारण करते हुए दूषित हो गये संध्या के समान लाल-लाल दिखने लगे ॥50॥ तदनंतर जिस प्रकार विषकणों की कांति को प्रकट करने वाला महासर्प मंत्र के द्वारा शांत किया जाता है उसी प्रकार वह भामंडल मंत्रियों के द्वारा उत्तम उपदेश से धीरे-धीरे शांति को प्राप्त कराया गया ॥51।। मंत्रियों ने कहा कि हे राजन् ! अयोग्य विषय में प्रकट हुए क्रोध को छोड़ो । इस दूत को यदि मार भी डाला तो इससे कौनसा प्रयोजन सिद्ध होने वाला है ? ॥52॥ वर्षाऋतु के मेघ के समान विशाल हाथियों के नष्ट करने में निपुण चंचल केसरों वाला सिंह चूहे पर क्षोभ को प्राप्त नहीं होता ।। 53 ।। प्रति ध्वनियों पर, लकड़ी आदि के बने पुरुषाकार पुतलों पर, सुआ आदि तिर्यंचों पर और यंत्र से चलने वाली मनुष्याकार पुतलियों पर सत्पुरुषों का क्या क्रोध करना है ? अर्थात् इस दूत के शब्द निज के शब्द नहीं हैं ये तो रावण के शब्दों की मानो प्रतिध्वनि ही हैं । यह दीन पुरुष नहीं है, पुरुष तो रावण है और यह उसका आकार मात्र पुतला है, जिस प्रकार सुआ आदि पक्षियों को जैसा पढ़ा दो वैसा पढ़ने लगता है । इसी प्रकार इस दूत को रावण ने जैसा पढ़ा दिया वैसा पढ़ रहा है और कठपुतली जिस प्रकार स्वयं चेष्टा नहीं करती उसी प्रकार यह भी स्वयं चेष्टा नहीं करता― मालिक की इच्छानुसार चेष्टा कर रहा है अतः इसके ऊपर क्या क्रोध करना है ? ॥54॥ इस प्रकार लक्ष्मण के कहने पर भामंडल शांत हो गया । तदनंतर निर्भय हो उस दूत ने राम से पुनः कहा कि ॥55॥ तुम इस प्रकार मूर्ख नीच मंत्रियों के द्वारा अविवेकपूर्ण दुष्प्रवृत्तियों से संशय में डाले जा रहे हो अर्थात् खेद है कि तुम इन मंत्रियों की प्रेरणा से व्यर्थ ही अविचारित रम्य प्रवृत्ति कर अपने आपको संशय में डाल रहे हो ॥56।। तुम इनके द्वारा छले जाने वाले अपने आपको समझो और स्वयं अपनी निपुण बुद्धि से अपने हित का विचार करो ॥57॥ सीता का समागम छोड़ो, समस्त लोक के स्वामी होओ, और वैभव के साथ पुष्पक विमान में आरूढ़ हो इच्छानुसार भ्रमण करो ।। 58 ।। मिथ्या हठ को छोड़ो, क्षुद्र मनुष्यों का कथन मत सुनो, करने योग्य कार्य में मन लगाओ और इस तरह महासुखी होओ ॥59॥ तदनंतर इस क्षुद्र का उत्तर कौन देता है ? यह सोचकर भामंडल तो चुप बैठा रहा परंतु अन्य लोगों ने उस दूत का अत्यधिक तिरस्कार किया उसे खूब धौंस दिखायी ॥60॥

अथानंतर वचनरूपी तीक्ष्ण बाणों से बिंधा और परम असत्कार को प्राप्त हुआ वह दूत मन में अत्यंत पीड़ित होता हुआ स्वामी के समीप गया ॥61 ।। वहाँ जाकर उसने कहा कि हे नाथ ! आपका आदेश पा आपके प्रभाव से नय-विन्यास से युक्त पद्धति से मैंने राम से कहा कि मैं नाना देशों से युक्त, अनेक रत्नों की खानों से सहित तथा विद्याधरों से समन्वित समुद्रांत पृथिवी, बड़े-बड़े हाथी, घोड़े, रथ, देव भी जिसका तिरस्कार नहीं कर सकते ऐसा पुष्पक विमान, अपने-अपने परिकरों से सहित तीन हजार सुंदर कन्याएँ, सूर्य के समान कांतिवाला सिंहासन और चंद्रतुल्य छत्र देता हूँ। अथवा इस विषय में अन्य अधिक कहने से क्या ? यदि तुम्हारी आज्ञा से मुझे सीता स्वीकृत कर लेती है तो इस समस्त निष्कंटक राज्य का सेवन करो ॥62-66 ।। हे विद्वान् ! यदि हमारा कहा करते हो तो हम थोड़ी-सी आजीविका लेकर एक बेत के आसन से ही संतुष्ट हो जावेंगे ॥67॥ इत्यादि वचन मैंने यद्यपि उससे बार-बार कहे तथापि वह सीता की हठ नहीं छोड़ता है उसी एक में उसकी निष्ठा लग रही है ॥68꠰। जिस प्रकार अत्यंत शांत साधु को अपनी चर्या प्रिय होती है उसी प्रकार वह सीता भी राम को अत्यंत प्रिय है । हे स्वामिन् ! आपका राज्य तो दूर रहा, तीन लोक भी देकर उस सुंदरी को उससे कोई नहीं छुड़ा सकता ॥66॥ और राम ने आप से इस प्रकार कहा है कि हे दशानन ! तुम्हें ऐसा सर्वजन निंदित कार्य करना योग्य नहीं है ।। 70 ।। इस प्रकार कहते हुए तुझ पापी नीच मनुष्य की जिह्वा के सौ टुकड़े क्यों नहीं हो गये ॥71 ।। मुझे सीता के बिना इंद्र के भोगों की भी आवश्यकता नहीं है । तू समस्त पृथिवी का उपभोग कर और मैं वन में निवास करूँगा ॥72॥ यदि तू पर-स्त्री के उद्देश्य से मरने के लिए उद्यत हुआ है तो मैं अपनी निज की स्त्री के लिए क्यों नहीं प्रयत्न करूँ ? ।। 73 ॥ हे सुंदर ! समस्त लोक में जितनी कन्याएँ हैं उन सबका उपभोग तुम्हीं करो, मैं तो फल तथा पत्तों आदि का खाने वाला हूँ, केवल सीता के साथ ही घूमता रहता हूँ ॥74॥ दूत रावण से कहता जाता है कि हे नाथ ! वानरों के अधिपति सुग्रीव ने तुम्हारी हँसी उड़ाकर यह कहा था कि जान पड़ता है तुम्हारा वह स्वामी किसी पिशाच के वशीभूत हो गया है ॥75॥ अथवा बकवाद का कारण जो अत्यंत तीव्र वायु है उससे तुम्हारा स्वामी ग्रस्त है । यही कारण है कि वह बेचारा इस प्रकार विपरीतता को प्राप्त हो रहा है ।। 76॥ जान पड़ता है कि लंका में कुशल वैद्य अथवा मंत्रवादी नहीं हैं अन्यथा पक्व तैलादि वायुहर पदार्थों के द्वारा उसकी चिकित्सा अवश्य की जाती ॥77॥ अथवा लक्ष्मणरूपी विषवैद्य संग्रामरूपी मंडल में शीघ्र ही बाणों द्वारा आवेश कर इसके सब रोगों को हरेगा ॥78॥ तदनंतर उसके कुवचनरूपी अग्नि से जिसका चित्त प्रज्वलित हो रहा था, ऐसे मैंने उस सुग्रीव को इस प्रकार धौंसा जिस प्रकार कि श्वान हाथी को धौंसता है ।। 79 ।। मैंने कहा कि अरे सुग्रीव ! जान पड़ता है कि तू राम के गर्व से मरना चाहता है, जो कुपित हुए विद्याधरों के अधिपति की निंदा कर रहा है ॥80॥ हे नाथ ! विराधित ने भी आप से कहा है कि यदि तेरी शक्ति है तो आ, मुझ एक के लिए ही युद्ध प्रदान कर । बैठा क्यों है ? ॥81॥ मैंने राम से पुनः कहा कि हे राम ! क्या तुमने रणांगण में रावण का परम पराक्रम नहीं देखा है ? ॥82॥ जिससे कि तुम उसे क्षोभ को प्राप्त कराना चाहते हो । जो राजारूपी जुगनुओं को दबाने के लिए सूर्य के समान है, वीर है और तीनों जगत् में जिसका प्रताप प्रख्यात है, ऐसा रावण, इस समय आपके पुण्य प्रभाव से क्षमायुक्त है । साम-शांति का प्रयोग करने का इच्छुक है, उदार-त्यागी है, एवं नम्र मनुष्यों से प्रेम करने वाला है ॥83-84॥ जो बलवान सेना रूपी तरंगों की माला से युक्त है तथा शस्त्ररूपी जल-जंतुओं के समूह से सहित है ऐसे रावणरूपी समुद्र को तुम क्या दो भुजाओं से तैरना चाहते हो ? ॥85॥ घोड़े और हाथी ही जिसमें हिंसक जानवर हैं तथा जो पैदल सैनिक रूपी वृक्षों से संकीर्ण हैं ऐसी दुर्गम रावणरूपी अटवी में तुम क्यों घुसना चाहते हो ? ॥86॥ मैंने कहा कि हे पद्म ! वायु के द्वारा सुमेरु नहीं उठाया जाता, सूर्य की किरणों से समुद्र नहीं सूखता, बैल की सींगों से पृथिवी नहीं काँपती और और तुम्हारे जैसे लोगों से दशानन नहीं जीता जाता ॥87॥ इस प्रकार क्रोधपूर्वक मेरे कहने पर क्रोध से लाल-लाल नेत्र दिखाता हुआ भामंडल जब तक चमकती तलवार खींचता है तब तक लक्ष्मण ने उसे मना कर दिया । लक्ष्मण ने भामंडल से कहा कि हे विदेहासुत ! क्रोध छोड़ो, सिंह सियार पर क्रोध नहीं करता, वह तो हाथी का गंडस्थल चीरकर मोतियों के समूह से क्रीड़ा करता है ꠰ जो राजा अतिशय बलिष्ठ शूरवीरों की चेष्टा को धारण करने वाले हैं वे कभी न भयभीत पर, न ब्राह्मण पर, न मुनि पर, न निहत्थे पर, न स्त्री पर, न बालक पर, न पशु पर और न दूत पर प्रहार करते हैं ।। 90॥ इस प्रकार युक्ति युक्त वचनों से जब लक्ष्मणरूपी पंडित ने उसे समझाया तब कहीं दुःसह दीप्ति चक्र को धारण करने वाले भामंडल ने धीरे-धीरे क्रोध छोड़ा ॥91॥

तदनंतर दुष्टता भरे अन्य कुमारों ने वज्र प्रहार के समान क्रूर वचनों से जिसका अत्यधिक तिरस्कार किया तथा अपूर्व कारणों से जिसकी आत्मा अत्यंत लघु हो रही थी, ऐसा मैं अपने आपको तृण से अधिक निःसार मानता हुआ भय से दुःखी हो आकाश में उड़कर आपके पादमूल में पुनः आया हूँ । हे देव ! यदि लक्ष्मण नहीं होता तो मैं आज अवश्य ही भामंडल से मारा जाता ॥92-93॥ हे देव ! इस प्रकार मैंने शत्रु के चरित्र का जैसा कुछ अनुभव किया है वह निःशंक होकर आप से निवेदन किया है । अब इस विषय में जो कुछ उचित हो सो करो क्योंकि हमारे जैसे पुरुष तो केवल आज्ञापालन करने वाले होते हैं ।। 94॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! जिन्हें अनेक शास्त्रों के समूह अच्छी तरह विदित हैं, जो नीति के विषय में सदा उद्यत रहते हैं तथा जिनके समीप अच्छे-अच्छे मंत्री विद्यमान रहते हैं ऐसे मनुष्य भी पुरुष रूपी सूर्य के मोहरूपी सघन मेघ से आच्छादित हो जाने पर मोहभाव को प्राप्त हो जाते हैं ॥95॥

इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मपुराण में रावण के दूत का राम के पास जाने और वहाँ से आने का वर्णन करने वाला छयासठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥66॥



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