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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 108 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



जं दव्वं तं ण गुणो जो वि गुणो सो ण तच्चमत्थादो । (108)

एसो हि अतब्भावो णेव अभावो त्ति णिद्दिट्ठो ॥118॥

अर्थ: 

वास्तव में जो द्रव्य है वह गुण नहीं है, जो गुण है वह द्रव्य नहीं है - यह अतद्भाव है, सर्वथा अभावरूप अतद्भाव नहीं है - ऐसा जिनेन्द्र भगवान ने कहा है ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ सर्वथाऽभावलक्षणत्वमतद्‌भावस्य निषेधयति -

एकस्मिन्द्रव्ये यद्‌द्रव्यं गुणो न तद्भवति, यो गुण: स द्रव्यं न भवतीत्येवं यद्‌द्रव्यस्य गुण-रूपेण गुणस्य वा द्रव्यरूपेण तेनाभवनं सोऽतद्भाव: । एतावतैवान्यत्वव्यवहारसिद्धेर्न पुर्नद्रव्य- स्याभावो गुणो गुणस्याभावो द्रव्यमित्येवंलक्षणोऽभावोऽतद्‌भाव, एवं सत्येकद्रव्यस्यानेक-त्वमुभयशून्यत्वमपोहरूपत्वं वा स्यात्‌ ।

तथाहि - यथा खलु चेतनद्रव्यस्याभावोऽचेतनद्रव्यमचेतनद्रव्यस्याभावश्चेतनद्रव्यमिति तयोरनेकत्वं, तथा द्रव्यस्याभावो गुणो गुणस्याभावो द्रव्यमित्येकस्यापि द्रव्यस्यानेकत्वं स्यात्‌ ।

यथा सुवर्णस्याभावे सुवर्णत्वस्याभाव: सुवर्णत्वस्याभावे सुवर्णस्याभाव इत्युभयशून्यत्वं, तथा द्रव्यस्याभावे गुणस्याभावो गुणस्याभावे द्रव्यस्याभाव इत्युभयशून्यत्वं स्यात्‌ ।

यथा पटाभावमात्र एव घटो घटाभावमात्र एव पट इत्युभयोरपोहरूपत्वं तथा द्रव्या-भावमात्र एव गुणो गुणाभावमात्र एव द्रव्यमित्यत्राप्यपोहरूपत्वं स्यात्‌ । ततो द्रव्यगुणयोरेक-त्वमशून्यत्व मनपोहत्वं चेच्छता यथोदित एवातद्‌भावोऽभ्युपगन्तव्य: ॥१०८॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

एक द्रव्य में, जो द्रव्य है वह गुण नहीं है, जो गुण है वह द्रव्य नहीं है;—इस प्रकार जो द्रव्य का गुणरूप से (न होना) अथवा गुण का द्रव्यरूप से न होना, अतद्‌भाव है; क्योंकि इतने से ही अन्यत्व व्यवहार (अन्यत्वरूप व्यवहार) सिद्ध होता है । परन्तु द्रव्य का अभाव गुण है, गुण का अभाव द्रव्य है;—ऐसे लक्षण वाला अभाव वह अतद्‌भाव नहीं है । यदि ऐसा हो तो

  1. एक द्रव्य को अनेकत्व आ जायेगा,
  2. उभयशून्यता (दोनों का अभाव) हो जायेगा, अथवा
  3. अपोहरूपता आ जायेगी ।
इसी को समझाते हैं :—
  1. जैसे चेतनद्रव्य का अभाव वह अचेतन द्रव्य है, (और) अचेतनद्रव्य का अभाव वह चेतनद्रव्य है,—इस प्रकार उनके अनेकत्व (द्वित्व) है, उसी प्रकार द्रव्य का अभाव वह गुण, (और) गुण का अभाव द्रव्य- है;—इस प्रकार एक द्रव्य के भी अनेकत्व आ जायेगा । (अर्थात् द्रव्य के एक होने पर भी उसके अनेकत्व का प्रसंग आ जायेगा ।)
  2. जैसे सुवर्ण के अभाव होने पर सुवर्णत्व का अभाव हो जाता है और सुवर्णत्व का अभाव होने पर सुवर्ण का अभाव हो जाता है,—इस प्रकार उभयशून्यत्व- दोनों का अभाव हो जाता है; उसी प्रकार द्रव्य का अभाव होने पर गुण का अभाव और गुण का अभाव होने पर द्रव्य का अभाव हो जायेगा;—इस प्रकार उभयशून्यता हो जायेगी । (अर्थात् द्रव्य तथा गुण दोनों के अभाव का प्रसंग आ जायेगा ।)
  3. जैसे पटाभावमात्र ही घट है, घटाभावमात्र ही पट है, (अर्थात् वस्त्र के केवल अभाव जितना ही घट है, और घट के केवल अभाव जितना ही वस्त्र है)—इस प्रकार दोनों के अपोहरूपता है, उसी प्रकार द्रव्याभावमात्र ही गुण और गुणाभावमात्र ही द्रव्य होगा;—इस प्रकार इसमें भी (द्रव्य-गुण में भी) अपोहरूपता आ जायेगी, (अर्थात् केवल नकाररूपता का प्रसङ्ग आ जायेगा ।)
इसलिये द्रव्य और गुण का एकत्व, अशून्यत्व और २अनपोहत्व चाहने वाले को यथोक्त ही अतद्‌भाव मानना चाहिये ॥१०८॥

१अपोहरूपता = सर्वथा नकारात्मकता; सर्वथा भिन्नता । (द्रव्य और गुण में एक-दूसरे का केवल नकार ही हो तो 'द्रव्य गुणवाला है' 'यह गुण इस द्रव्य का है' -इत्यादि कथन से सूचित किसी प्रकार का सम्बन्ध ही द्रव्य और गुण के नहीं बनेगा) ।

२अनपोहत्व = अपोहरूपता का न होना; केवल नकारात्मकता का न होना ।

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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