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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 112 - तात्पर्य-वृत्ति

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जीवो भवं भविस्सदि णरोऽमरो वा परो भवीय पुणो । (112)

किं दव्वत्तं पजहदि ण जहं अण्णो कहं होदि ॥122॥

अर्थ: 

जीव परिणमित होता हुआ मनुष्य, देव अथवा अन्य (तिर्यंच, नारकी, सिद्ध) होगा । परन्तु मनुष्यादि होकर क्या वह द्रव्यत्व को छोड़ देता है ? (यदि नहीं तो) द्रव्यत्व को न छोड़ता हुआ वह अन्य कैसे हो सकता है? (नहीं हो सकता है) ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ पूर्वोक्तमेव सदुत्पादंद्रव्यादभिन्नत्वेन विवृणोति--

जीवो जीवः कर्ता भवं भवन् परिणमन् सन् भविस्सदि भविष्यति तावत् । किं किं भविष्यति । निर्विकारशुद्धोपयोगविलक्षणाभ्यां शुभाशुभोपयोगाभ्यां परिणम्य णरोऽमरो वा परो नरो देवः परस्तिर्यङ्नारकरूपो वा निर्विकारशुद्धोपयोगेन सिद्धो वा भविष्यति । भवीय पुणो एवंपूर्वोक्तप्रकारेण पुनर्भूत्वापि । अथवा द्वितीयव्याख्यानम् । भवन् वर्तमानकालापेक्षया भविष्यतिभाविकालापेक्षया भूत्वा भूतकालापेक्षया चेति कालत्रये चैवं भूत्वापि किं दव्वत्तं पजहदि किं द्रव्यत्वंपरित्यजति । ण चयदि द्रव्यार्थिकनयेन द्रव्यत्वं न त्यजति, द्रव्याद्भिन्नो न भवति । अण्णो कहं हवदि अन्यो भिन्नः कथं भवति । किंतु द्रव्यान्वयशक्तिरूपेण सद्भावनिबद्धोत्पादः स एवेति द्रव्यादभिन्न इतिभावार्थः ॥११२॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[जीवो] जीवरूपी कर्ता (कर्ताकारक में प्रयुक्त जीव) [भवं] परिणमित होता हुआ [भविस्सदि] होगा । परिणमित होता हुआ जीव क्या-क्या होगा? विकार रहित शुद्धोपयोग से विलक्षण शुभाशुभ उपयोगरूप से परिणमन कर [णरोऽमरो वा परो] मनुष्य, देव और अन्य तिर्यंच, नारकी रूप अथवा पूर्ण विकार रहित शुद्धोपयोग से सिद्ध होगा । [भवीय पुणो] इसप्रकार पहले कहे हुये मनुष्यादि रूप होकर भी ।

अथवा दूसरा व्याख्यान -

  • होता हुआ- वर्तमानकाल की अपेक्षा से,
  • होगा- भविष्यकाल की अपेक्षा से, और
  • होकर- भूतकाल की अपेक्षा से-
इसप्रकार तीनों कालों में (इनरूप) होकर भी [किं दव्वत्तं पजहदि] क्या द्रव्यता छोडता है? [ण चयदि] द्रव्यार्थिकनय से द्रव्यता को नही छोड़ता है, द्रव्य से भिन्न नहीं है । [अण्णो कहं हवदि] - (तब वह जीवद्रव्य से) भिन्न कैसे है? (नही है) वरन् अन्वय-शक्तिरूप से द्रव्य का सद्भाव-निबद्ध उत्पाद-सदुत्पाद वही है; इसप्रकार उत्पाद द्रव्य से अभिन्न है -- ऐसा भाव है ॥१२२॥

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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