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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 113 - तत्त्व-प्रदीपिका

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मणुवो ण होदि देवो देवो वा माणुसो व सिद्धो वा । (113)

एवं अहोज्जमाणो अणण्णभावं कधं लहदि ॥123॥

अर्थ: 

मनुष्य देव नहीं है; देव, मनुष्य अथवा सिद्ध नहीं है; ऐसा नही होने पर वह अनन्यभाव- अभिन्नता को कैसे प्राप्त कर सकता है?

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथासदुत्पादमन्यत्वेन निश्चिनोति -

पर्याया हि पर्यायभूताया आत्मव्यतिरेकव्यक्ते: काल एव सत्त्वात्ततोऽन्यकालेषु भवन्त्यसन्त एव । यश्च पर्यायाणां द्रव्यत्वभूतयान्वयशक्त्यानुस्यूत: क्रमानुपाती स्वकाले प्रादुर्भाव:तस्मिन्न पर्यायभूताया आत्मव्यतिरेकव्यक्ते: पूर्वमसत्त्वात्पर्याया अन्य एव । तत: पर्यायाणामन्यत्वेन निश्चीयते पर्यायस्वरूपकर्तृकरणाधिकरणभूतत्वेन पर्यायेभ्योऽपृथग्भूतस्य द्रव्यस्या सदुत्पाद: ।

तथाहि - न हि मनुजस्त्रिदशो वा सिद्धो वा स्यात्‌ न हि त्रिदशो मनुजो वा सिद्धो वा स्यात्‌ । एवमसन्‌ कथमनन्यो नाम स्यात्‌ येनान्य एव न स्यात्‌ । येन च निष्पद्यमानमनुजादि-पर्यायं जायमानवलयादिविकारं काञ्चनमिव जीवद्रव्यमपि प्रतिपदमन्यन्न स्यात्‌ ॥११३॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

पर्यायें पर्यायभूत स्वव्यतिरेकव्यक्ति के काल में ही सत् (विद्यमान) होने से, उससे अन्य कालों में असत् (अविद्यमान) ही हैं । और पर्यायों का द्रव्यत्वभूत अन्वयशक्ति के साथ गुंथा हुआ (एकरूपता से युक्त) जो क्रमानुपाती (क्रमानुसार) स्वकाल में उत्पाद होता है उसमें पर्यायभूत स्वव्यतिरेकव्यक्ति का पहले असत्पना होने से, पर्यायें अन्य ही हैं । इसीलिये पर्यायों की अन्यता के द्वारा द्रव्य का—जो कि पर्यायों के स्वरूप का कर्ता, करण और अधिकरण होने से पर्यायों से अपृथक् है—असत्-उत्पाद निश्‍चित होता है ।

इस बात को (उदाहरण देकर) स्पष्ट करते हैं :—

मनुष्य वह देव या सिद्ध नहीं है, और देव, वह मनुष्य या सिद्ध नहीं है; इस प्रकार न होता हुआ अनन्य (वह का वही) कैसे हो सकता है, कि जिससे अन्य ही न हो और जिससे मनुष्यादि पर्यायें उत्‍पन्‍न होती हैं ऐसा जीव द्रव्य भी,—जिसकी कंकणादि पर्यायें उत्पन्न होती हैं ऐसे सुवर्ण की भाँति-पद-पद पर (प्रति पर्याय पर) अन्य न हो? (जैसे कंकण, कुण्डल इत्यादि पर्यायें अन्य हैं, --भिन्न-भिन्न हैं, वे की वे ही नहीं हैं, इसलिये उन पर्यायों का कर्ता सुवर्ण भी अन्य है, इसी प्रकार मनुष्य, देव इत्यादि पर्यायें अन्य हैं, इसलिये उन पर्यायों का कर्ता जीव-द्रव्य भी पर्यायापेक्षा से अन्य है) ॥११३॥

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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