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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 117 - तत्त्व-प्रदीपिका

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कम्मं णामसमक्खं सभावमध अप्पणो सहावेण । (117)

अभिभूय णरं तिरियं णेरइयं वा सुरं कुणदि ॥127॥

अर्थ: 

[अथ] वहाँ [नामसमाख्यं कर्म] 'नाम' संज्ञावाला कर्म [स्वभावेन] अपने स्वभाव से [आत्मनः स्वभावं अभिभूय] जीव के स्वभाव का पराभव करके, [नरं तिर्यञ्चं नैरयिकं वा सुरं] मनुष्य, तिर्यंच, नारक अथवा देव (-इन पर्यायों को) [करोति] करता है ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ मनुष्यादिपर्यायाणां जीवस्य क्रियाफलत्वं व्यनक्ति -

क्रिया खल्वात्मना प्राप्यत्वात्कर्म, तन्निमित्तप्राप्तपरिणाम: पुद्‌गलोऽपि कर्म, तत्कार्य-भूता मनुष्यादिपर्याया जीवस्य क्रियाया मूलकारणभूताया: प्रवृत्तत्वात्‌ क्रियाफलमेव स्यु: । क्रियाऽभावे पुद्‌गलानां कर्मत्वाभावात्तत्कार्यभूतानां तेषामभावात्‌ ।

अथ कथं ते कर्मण: कार्यभावमायान्ति कर्मस्वभावेन जीवस्वभावमभिभूय क्रियमाणत्वात्‌ प्रदीपवत्‌ । तथाहि - यथा खलु ज्योति:स्वभावेन तैलस्वभावमभिभूय क्रियमाण: प्रदीपो ज्योति: कार्यं तथा कर्मस्वभावेन जीवस्वभावमभिभूय क्रियमाणा मनुष्यादिपर्याया: कर्म-कार्यम्‌ ॥११७॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

क्रिया वास्तव में आत्मा के द्वारा प्राप्य होने से कर्म है, (अर्थात् आत्मा क्रिया को प्राप्त करता है—पहुँचता है—इसलिये वास्तव में क्रिया ही आत्मा का कर्म है ।) उसके निमित्त से परिणमन को प्राप्त होता हुआ (द्रव्य-कर्मरूप से परिणमन करता हुआ) पुद्‌गल भी कर्म है । उस (पुद्‌गलकर्म) की कार्यभूत मनुष्यादि-पर्यायें मूलकारणभूत ऐसी जीव की क्रिया से प्रवर्तमान होने से क्रियाफल ही हैं; क्योंकि क्रिया के अभाव में पुद्‌गलों को कर्मपने का अभाव होने से उस (पुद्‌गलकर्म) की कार्यभूत मनुष्यादि-पर्यायों का अभाव होता है ।

वहाँ, वे मनुष्यादि-पर्यायें कर्म के कार्य कैसे हैं? (सो कहते हैं कि) वे कर्म-स्वभाव के द्वारा जीव के स्वभाव का पराभव करके की जाती हैं, इसलिये; दीपक की भाँति । यथा :- ज्योति (लौ) के स्वभाव के द्वारा तेल के स्वभाव का पराभव करके किया जानेवाला दीपक ज्योति का कार्य है, उसीप्रकार कर्म-स्वभाव के द्वारा जीव के स्वभाव का पराभव करके की जाने वाली मनुष्यादि पर्यायें कर्म के कार्य हैं ॥११७॥

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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