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ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 119 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



जायदि णेव ण णस्सदि खणभंगसमुब्भवे जणे कोई । (119)

जो हि भवो सो विलओ संभवविलय त्ति ते णाणा ॥129॥

अर्थ: 

[क्षणभङ्गसमुद्भवे जने] प्रतिक्षण उत्पाद और विनाशवाले जीवलोक में [कश्चित्] कोई [न एव जायते] उत्पन्न नहीं होता और [न नश्यति] न नष्ट होता है; [हि] क्योंकि [यः भवः सः विलयः] जो उत्पाद है वही विनाश है; [संभव-विलयौ इति तौ नाना] और उत्पाद तथा विनाश, इसप्रकार वे अनेक (भिन्न) भी हैं ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ जीवस्य द्रव्येणनित्यत्वेऽपि पर्यायेण विनश्वरत्वं दर्शयति --

जायदि णेव ण णस्सदि जायते नैव न नश्यतिद्रव्यार्थिकनयेन । क्व । खणभंगसमुब्भवे जणे कोई क्षणभङ्गसमुद्भवे जने कोऽपि । क्षणं क्षणं प्रति भङ्गसमुद्भवो यत्र संभवति क्षणभङ्गसमुद्भवस्तस्मिन्क्षणभङ्गसमुद्भवे विनश्वरे पर्यायार्थिकनयेन जने लोके जगति कश्चिदपि, तस्मान्नैव जायते न चोत्पद्यत इति हेतुं वदति । जो हि भवो सो विलओ द्रव्यार्थिकनयेनयो हि भवस्स एव विलयो यतः कारणात् । तथाहि --

मुक्तात्मनां य एव सकलविमलकेवलज्ञानादिरूपेणमोक्षपर्यायेण भव उत्पादः स एव निश्चयरत्त्त्त्त्नत्रयात्मकनिश्चयमोक्षमार्गपर्यायेण विलयो विनाशस्तौ चमोक्षपर्यायमोक्षमार्गपर्यायौ कार्यकारणरूपेण भिन्नौ, तदुभयाधारभूतं यत्परमात्मद्रव्यं तदेव, मृत्पिण्ड-घटाधारभूतमृत्तिकाद्रव्यवत् मनुष्यपर्यायदेवपर्यायाधारभूतसंसारिजीवद्रव्यवद्वा । क्षणभङ्गसमुद्भवे हेतुःकथ्यते । संभवविलय त्ति ते णाणा संभवविलयौ द्वाविति तौ नाना भिन्नौ यतः कारणात्ततःपर्यायार्थिकनयेन भङ्गोत्पादौ । तथाहि – य एव पूर्वोक्तमोक्षपर्यायस्योत्पादो मोक्षमार्गपर्यायस्य विनाश-स्तावेव भिन्नौ न च तदाधारभूतपरमात्मद्रव्यमिति । ततो ज्ञायते द्रव्यार्थिकनयेन नित्यत्वेऽपिपर्यायरूपेण विनाशोऽस्तीति ॥११९॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[जायदि णेव ण णस्सदि] द्रव्यार्थिकनय से न उत्पन्न होता है न नष्ट होता है । कहाँ उत्पन्न और नष्ट नही होता है ? [खणभंगसमुब्भवे जणे कोई] पर्यायार्थिकनय से प्रतिसमय उत्पाद और व्यय जिसमें संभव हैं - हो रहे हैं, वह क्षणभंग समुद्भव है, उस प्रतिसमय नश्वर उत्पाद- व्यय वाले इस लोक मे कोई भी उसकारण से ही न उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है - इसप्रकार हेतु कहते है । [जो हि भवो सो विलओ] जिसकारण द्रव्यार्थिकनय से उत्पाद का ही नाश होता है ।

वह इसप्रकार- मुक्तात्मा के जो ही परिपूर्ण, निर्मल केवलज्ञानादिरूप मोक्षपर्याय से उत्पाद है, वही निश्चयरत्नत्रयस्वरूप निश्चयमोक्षमार्गपर्याय से विनाश है और वे दोनों मोक्षपर्याय और मोक्षमार्गपर्याय कार्य-कारण रूप से पृथक-पृथक् है, तथापि मिट्टी के पिण्ड और घड़े के आधारभूत मिट्टी द्रव्य के समान और मनुष्यपर्याय वा देवपर्याय के आधारभूत संसारी जीव के समान, उन दोनों का आधारभूत जो परमात्मद्रव्य है, वह वही है । प्रतिसमय के उत्पाद और विनाश में हेतु कहते हैं - [संभवविलय त्ति ते णाणा] जिसकारण उत्पाद और विनाश दोनों भिन्न हैं इसलिये पर्यायार्थिकनय से उत्पाद और विनाश हैं ।

वह इसप्रकार - जो ही पूर्वोक्त मोक्षपर्याय का उत्पाद और मोक्षमार्गपर्याय का विनाश है - वे दोनों भिन्न ही हैं परन्तु उन दोनों का आधारभूत परमात्मद्रव्य भिन्न नहीं है । इससे ज्ञात होता है कि द्रव्यार्थिकनय से नित्य होने पर भी पर्यायरूप से विनाशशील है ॥१२९॥

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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