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ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 11 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



धम्मेण परिणदप्पा अप्पा जदि सुद्धसंपयोगजुदो ।

पावदि णिव्वाणसुहं सुहोवजुत्तो य सग्गसुहं ॥11॥

अर्थ: 

[धर्मेण परिणतात्मा] धर्म से परिणमित स्वरूप वाला [आत्मा] आत्मा [यदि] यदि [शुद्धसंप्रयोगयुक्त:] शुद्ध उपयोग में युक्त हो तो [निर्वाणसुख] मोक्ष सुख को [प्राप्नोति] प्राप्त करता है [शुभोपयुक्त: च] और यदि शुभोपयोग वाला हो तो [स्वर्गसुखम्‌] स्वर्ग के सुख को (बन्ध को) प्राप्त करता है ॥११॥

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ वीतरागसरागचारित्रसंज्ञयोः शुद्धशुभोपयोगपरिणामयोः संक्षेपेण फलं दर्शयति --

धम्मेण परिणदप्पा अप्पा धर्म्मेण परिणतात्मापरिणतस्वरूपः सन्नयमात्मा जदि सुद्धसंपओगजुदो यदि चेच्छुद्धोपयोगाभिधानशुद्धसंप्रयोग-परिणामयुतः परिणतो भवति पावदि णिव्वाणसुहं तदा निर्वाणसुखं प्राप्नोति । सुहोवजुत्तो व सग्गसुहं शुभोपयोगयुतः परिणतः सन् स्वर्गसुखं प्राप्नोति । इतो विस्तरम् --

इह धर्मशब्देनाहिंसालक्षणःसागारानगाररूपस्तथोत्तमक्षमादिलक्षणो रत्नत्रयात्मको वा, तथा मोहक्षोभरहित आत्मपरिणामः शुद्ध-

वस्तुस्वभावश्चेति गृह्यते । स एव धर्मः पर्यायान्तरेण चारित्रं भण्यते । 'चारित्तं खलु धम्मो' इतिवचनात् । तच्च चारित्रमपहृतसंयमोपेक्षासंयमभेदेन सरागवीतरागभेदेन वा शुभोपयोगशुद्धोपयोगभेदेन च द्विधा भवति । तत्र यच्छुद्धसंप्रयोगशब्दवाच्यं शुद्धोपयोगस्वरूपं वीतरागचारित्रं तेन निर्वाणं लभते ।निर्विकल्पसमाधिरूपशुद्धोपयोगशक्त्यभावे सति यदा शुभोपयोगरूपसरागचारित्रेण परिणमति तदा पूर्वमनाकुलत्वलक्षणपारमार्थिकसुखविपरीतमाकुलत्वोत्पादकं स्वर्गसुखं लभते । पश्चात् परम-समाधिसामग्रीसद्भावे मोक्षं च लभते इति सूत्रार्थः ॥११॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[धम्मेण परिणदप्पा अप्पा] धर्मरूप से परिणत स्वरूप वाला होता हुआ यह आत्मा, [जदि सुद्धसंपयोगजुदो] यदि शुद्धोपयोग है नाम जिसका ऐसे शुद्धसंप्रयोग परिणामरूप परिणत होता है, [पावदि णिव्वाणसुहं] तो मोक्षसुख प्राप्त करता है । [सुहोवजुत्तो व सग्गसुहं] शुभोपयोग से परिणत होता हुआ स्वर्ग-सुख प्राप्त करता है ।

यहाँ इसका विस्तार करते है- इस गाथा में धर्म शब्द से अहिंसा लक्षण धर्म, गृहस्थ धर्म, मुनि धर्म, उत्तम क्षमादि लक्षण रत्नत्रय स्वरूप धर्म, मोह-क्षोभ रहित आत्मा के परिणाम अथवा वस्तु का शुद्ध स्वभाव ग्रहण किया जाता है । चारित्र ही वास्तविक धर्म है ऐसा वचन होने से, वही धर्म दूसरे शब्दों में चारित्र कहा जाता है । और वह चारित्र अपहृत संयम-उपेक्षा संयम भेद से अथवा सराग-वीतराग भेद से और शुभोपयोग-शुद्धोपयोग भेद से दो प्रकार का है । वहाँ जो शुद्धसंप्रयोग शब्द से कहा जाने वाला शुद्धोपयोग स्वरूप वीतराग चारित्र है उससे मोक्ष की प्राप्ति होती है । निर्विकल्प समाधि रूप शुद्धोपयोग में रहने की शक्ति का अभाव होने पर जब (पूर्वोक्त जीव) शुभोपयोगरूप सराग-चारित्र से परिणत होता है, तो अनाकुलता लक्षण पारमार्थिक सुख से विपरीत आकुलता पैदा करने वाला स्वर्ग-सुख प्राप्त करता है । तथा बाद में परम समाधिरूप मोक्ष की कारणभूत वीतराग चारित्ररूप सामग्री के सद्भाव में मोक्ष प्राप्त करता है- यह गाथा का भाव है ॥११॥

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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