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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 144 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



जस्स ण संति पदेसा पदेसमेत्तं व तच्चदो णादुं । (144)

सुण्णं जाण तमत्थं अत्थंतरभूदमत्थीदो ॥155॥

अर्थ: 

[यस्य] जिस पदार्थ के [प्रदेशा:] प्रदेश [प्रदेशमात्रं वा] अथवा एकप्रदेश भी [तत्त्वतः] परमार्थत: [ज्ञातुम् न संति] ज्ञात नहीं होते, [तं अर्थं] उस पदार्थ को [शून्यं जानीहि] शून्य जानो [अस्तित्वात् अर्थान्तरभूतम्] जो कि अस्तित्व से अर्थान्तरभूत (अन्य) है ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथोत्पादव्ययध्रौव्यात्मकास्तित्वावष्टम्भेन कालस्यैकप्रदेशत्वं साधयति --

जस्स ण संति यस्य पदार्थस्यन सन्ति न विद्यन्ते । के । पदेसा प्रदेशाः । पदेसमेत्तं तु प्रदेशमात्रमेकप्रदेशप्रमाणं पुनस्तद्वस्तु तच्चदो णादुं तत्त्वतः परमार्थतो ज्ञातुं शक्यते । सुण्णं जाण तमत्थं यस्यैकोऽपि प्रदेशो नास्ति तमर्थं पदार्थं शून्यं जानीहि हे शिष्य । कस्माच्छून्यमिति चेत् । अत्थंतरभूदं एकप्रदेशाभावे सत्यर्थान्तरभूतं भिन्नं भवतियतः कारणात् । कस्याः सकाशाद्भिन्नम् । अत्थीदो उत्पादव्ययध्रौव्यात्मकसत्ताया इति । तथाहि --

काल-पदार्थस्य तावत्पूर्वसूत्रोदितप्रकारेणोत्पादव्ययध्रौव्यात्मकमस्तित्वं विद्यते; तच्चास्तित्वं प्रदेशं विना न घटते । यश्च प्रदेशवान् स कालपदार्थ इति । अथ मतं कालद्रव्याभावेऽप्युत्पादव्ययध्रौव्यत्वं घटते ।नैवम् । अङ्गुलिद्रव्याभावे वर्तमानवक्रपर्यायोत्पादो भूतर्जुपर्यायस्य विनाशस्तदुभयाधारभूतं ध्रौव्यंकस्य भविष्यति । न कस्यापि । तथा कालद्रव्याभावे वर्तमानसमयरूपोत्पादो भूतसमयरूपोविनाशस्तदुभयाधारभूतं ध्रौव्यं क स्य भविष्यति । न क स्यापि । एवं सत्येतदायाति – अन्यस्य भङ्गोऽन्य-स्योत्पादोऽन्यस्य ध्रौव्यमिति सर्वं वस्तुस्वरूपं विप्लवते । तस्माद्वस्तुविप्लवभयादुत्पादव्ययध्रौव्याणांकोऽप्येक आधारभूतोऽस्तीत्यभ्युपगन्तव्यम् । स चैकप्रदेशरूपः कालाणुपदार्थ एवेति । अत्रातीता-नन्तकाले ये केचन सिद्धसुखभाजनं जाताः, भाविकाले च 'आत्मोपादानसिद्धं स्वयमतिशयवद्' इत्यादिविशेषणविशिष्टसिद्धसुखस्य भाजनं भविष्यन्ति ते सर्वेऽपि काललब्धिवशेनैव । तथापि तत्रनिजपरमात्मोपादेयरुचिरूपं वीतरागचारित्राविनाभूतं यन्निश्चयसम्यक्त्वं तस्यैव मुख्यत्वं, न च कालस्य, तेन स हेय इति । तथा चोक्तम् — ((किं पलविएण बहुणा जे सिद्धा णरवरा गये काले सिज्झहहि जे वि भविया तं जाणह सम्ममाहप्पं)) ॥१५५॥

एवं निश्चयकालव्याख्यानमुख्यत्वेनाष्टमस्थले गाथात्रयंगतम् ।

इति पूर्वोक्तप्रकारेण 'दव्वं जीवमजीवं' इत्याद्येकोनविंशतिगाथाभिः स्थलाष्टकेन विशेष-ज्ञेयाधिकारः समाप्तः ॥

अतः परं शुद्धजीवस्य द्रव्यभावप्राणैः सह भेदनिमित्तं 'सपदेसेहिं समग्गो' इत्यादि यथाक्रमेण गाथाष्टकपर्यन्तं सामान्यभेदभावनाव्याख्यानं करोति । तद्यथा ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[जस्स ण संति] जिस पदार्थ के नहीं हैं- पाये नही जाते हैं । क्या नहीं पाये जाते हैं? [पदेसा] जिसके प्रदेश नहीं पाये जाते हैं । [पदेसमेत्तं तु] प्रदेशमात्र अथवा एकप्रदेश प्रमाण भी (जिसके नहीं पाया जाता है) तो फिर वह वस्तु [तच्चदो णादुं] परमार्थ से वास्तव में ज्ञात होने के लिये समर्थ हो सकती है? (अर्थात् नहीं हो सकती है।) [सुण्णं जाणं तमत्थं] - जिसके एक भी प्रदेश नहीं हैं उस पदार्थ को हे शिष्य! शून्य जानो । उसे शून्य क्यों जाने? यदि यह प्रश्न हो तो उत्तर कहते हैं -- [अत्थंतरभूदं] जिसकारण एक प्रदेश का अभाव होने पर अर्थान्तरभूत-भिन्न है, इसलिये उसे शून्य जानो । वह किससे भिन्न है? [अत्थिदो] - वह उत्पाद-व्यय- ध्रौव्यमय सत्ता से भिन्न है ।

वह इसप्रकार- पहले (१५४ वी) गाथा में कहे अनुसार, काल पदार्थ के उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य स्वरूप अस्तित्व पाया जाता है, और वह अस्तित्व प्रदेश के बिना घटित नहीं हो सकता है । और जो प्रदेशवान है, वह काल पदार्थ है ।

(यहाँ कोई कहता है कि) काल द्रव्य के अभाव में भी उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य घटित होते हैं यदि ऐसा माना जाये तो? (आचार्य कहते है) ऐसा नहीं माना जा सकता । अंगुली द्रव्य के अभाव में वर्तमान वक्र (टेढ़ी) पर्याय का उत्पाद पहले की ऋजु (सीधी) पर्याय का व्यय और उन दोनों का आधारभूत ध्रौव्य किसका होगा? किसी का भी नहीं होगा । उसीप्रकार काल द्रव्य के अभाव में, वर्तमान समयरूप उत्पाद भूत समयरूप विनाश और उन दोनों का आधारभूत ध्रौव्य किसका होगा? किसी का भी नहीं होगा ।

ऐसा होने पर यह सिद्ध हुआ कि अन्य का व्यय, अन्य का उत्पाद और अन्य का ध्रौव्य - इसप्रकार मानने पर सम्पूर्ण-स्वरूप का विप्लव (विनाश) होता है । इसलिये वस्तु-विनाश के भय से उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य का भी एक आधार भूत है -- ऐसा स्वीकार करना चाहिये । और वह एक प्रदेशरूप कालाणु पदार्थ ही है ।

यहाँ भूतकालीन अनन्तकाल में जो सिद्ध सुख के पात्र हुये हैं और भविष्य में 'अपने आत्मरूप उपादान से सिद्ध, स्वयं सातिशय' इत्यादि विशेषणों विशिष्ट सिद्ध सुख के पात्र होंगे, वे सभी काललब्धि के वश से ही हुये हैं; तथापि निज परमात्मा ही उपादेय है ऐसी रुचि रूप वीतराग चारित्र का अविनाभावी जो निश्चय-सम्यक्त्व है, उसकी ही मुख्यता है; काल की नहीं जिस कारण वह हेय है । वैसा ही कहा है-

अधिक कहने से क्या? जो श्रेष्ठ पुरुष भूतकाल में सिद्ध हुये हैं और जो भविष्यकाल में सिद्ध होंगे, वह सम्यक्त्व का ही माहात्म्य जानो ॥१५५॥

इसप्रकार निश्चय काल के व्याख्यान की मुख्यता से आठवें स्थल में तीन गाथायें पूर्ण हुईं ।

इसप्रकार पहले कहे अनुसार 'दव्वं जीवमजीवं' इत्यादि १९ गाथाओं द्वारा आठ स्थलरूप से 'विशेष ज्ञेयाधिकार' समाप्त हुआ ।

अब, इसके बाद शुद्ध जीव का द्रव्य-भाव प्राणों के साथ भेद में निमित्त [सपदेसेहिं समरयो] इत्यादि यथाक्रम से आठ गाथा पर्यन्त 'सामान्य भेद भावना'(नामक तीसरे अधिकार) का विशेष कथन करते हैं--

वह इसप्रकार --

अब, ज्ञान और ज्ञेय के ज्ञापन के लिये (ज्ञान करने के लिये) अथवा उसीप्रकार आत्मा की चार प्राणों के साथ भेदरूप भावना के लिये इस गाथा का प्रतिपादन करते हैं --

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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