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ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 146 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



इंदियपाणो य तधा बलपाणो तह य आउपाणो य । (146)

आणप्पाणप्पाणो जीवाणं होंति पाणा ते ॥157॥

अर्थ: 

[इन्द्रिय प्राण: च] इन्द्रिय प्राण, [तथा बलप्राण:] बलप्राण, [तथा च आयुःप्राण:] आयुप्राण [च] और [आनपानप्राण:] श्‍वासोच्‍छ्‌वास प्राण; [ते] ये (चार) [जीवानां] जीवों के [प्राणा:] प्राण [भवन्ति] हैं ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथेन्द्रियादिप्राणचतुष्कस्वरूपं प्रतिपादयति--

अतीन्द्रियानन्तसुखस्व-भावात्मनो विलक्षण इन्द्रियप्राणः, मनोवाक्कायव्यापाररहितात्परमात्मद्रव्याद्विसदृशो बलप्राणः, अनाद्यनन्तस्वभावात्परमात्मपदार्थाद्विपरीतः साद्यन्त आयुःप्राणः, उच्छ्वासनिश्वासजनितखेदरहिताच्छुद्धात्मतत्त्वात्प्रतिपक्षभूत आनपानप्राणः । एवमायुरिन्द्रियबलोच्छ्वासरूपेणाभेदनयेन जीवानांसंबन्धिनश्चत्वारः प्राणा भवन्ति । ते च शुद्धनयेन जीवाद्भिन्ना भावयितव्या इति ॥१४६॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

  • अतीन्द्रिय- अनन्त सुख स्वभावी आत्मा से विलक्षण इन्द्रिय-प्राण,
  • मन, वचन और शरीर के व्यापार से रहित परमात्मद्रव्य से विसदृश (भिन्न) बल प्राण;
  • अनादि-अनन्त स्वभावी परमात्म-पदार्थ से विपरीत सादि-सान्त आयु-प्राण और
  • उच्छ्वास-निश्वास--स्वासोच्छवास से उत्पन्न खेद से रहित शुद्धात्मतत्त्व से विरुद्ध आनपान-स्वासोच्छवास प्राण
इसप्रकार अभेद नय से आयु, इन्द्रिय, बल और स्वासोच्छ्वास रूप से चार प्राण जीवों के होते हैं । और वे शुद्ध नय से जीव से भिन्न है - ऐसी भावना करना चाहिये ॥१५७॥

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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