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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 150 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



आदा कम्ममलिमसो धरेदि पाणे पुणो पुणो अण्णे । (150)

ण चयदि जाव ममत्तिं देहपधाणेसु विसयेसु ॥162॥

अर्थ: 

[यावत्] जब तक [देहप्रधानेषु विषयेषु] देहप्रधान विषयों में [ममत्वं] ममत्व को [न त्यजति] नहीं छोड़ता, [कर्ममलीमस: आत्मा] तब तक कर्म से मलिन आत्मा [पुन: पुन:] पुनः पुन: [अन्यान् प्राणान्] अन्य-अन्य प्राणों को [धारयति] धारण करता है ॥

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ पुद्‌गलप्राणसन्ततिप्रवृत्तिहेतुमन्तरङ्गमासूत्रयति -

येययात्मन: पौद्‌गलिकप्राणानां संतानेन प्रवृत्ति:, तस्या अनादिपौद्‌गलकर्ममूलं शरीरादि-ममत्वरूपमुपरक्तत्वमन्तरङ्गो हेतु: ॥१५०॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

जो इस आत्मा को पौद्गलिक प्राणों की संतानरूप प्रवृत्ति है, उसका अन्तरंग हेतु शरीरादि का ममत्वरूप उपरक्तपना है, जिसका मूल (निमित्त) अनादि पौद्गलिक कर्म है ।

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

तत्त्व-प्रदीपिका अनुक्रमणिका

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