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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 152 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



अत्थित्तणिच्छिदस्स हि अत्थस्सत्थंतरम्हि संभूदो । (152)

अत्थो पज्जाओ सो संठाणादिप्पभेदेहिं ॥164॥

अर्थ: 

[अस्तित्वनिश्‍चितस्य अर्थस्य हि] अस्तित्व से निश्‍चित अर्थ का (द्रव्य का) [अर्थान्तरे सद्य:] अन्य अर्थ में (द्रव्य में) उत्पन्न [अर्थ:] जो अर्थ (भाव) [स पर्याय:] वह पर्याय है [संस्थानादिप्रभेदै:] कि जो संस्थानादि भेदों सहित होती है ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ पुनरपि शुद्धात्मनो विशेषभेदभावनार्थंनरनारकादिपर्यायरूपं व्यवहारजीवत्वहेतुं दर्शयति --

अत्थित्तणिच्छिदस्स हि चिदानन्दैकलक्षणस्वरूपास्ति-त्वेन निश्चितस्य ज्ञातस्य हि स्फुटम् । कस्य । अत्थस्स परमात्मपदार्थस्य अत्थंतरम्हि शुद्धात्मार्थादन्यस्मिन्ज्ञानावरणादिकर्मरूपे अर्थान्तरे संभूदो संजात उत्पन्नः अत्थो यो नरनारकादिरूपोऽर्थः, पज्जाओ सो निर्विकारशुद्धात्मानुभूतिलक्षणस्वभावव्यञ्जनपर्यायादन्यादृशः सन् विभावव्यञ्जनपर्यायो भवति स इत्थंभूतपर्यायो जीवस्य । कैः कृत्वा जातः । संठाणादिप्पभेदेहिं संस्थानादिरहितपरमात्मद्रव्यविलक्षणैःसंस्थानसंहननशरीरादिप्रभेदैरिति ॥१६४॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[अत्थित्तणिच्छिदस्स हि] - वास्तव में ज्ञानानन्द एक लक्षण स्वरूपास्तित्व द्वारा निश्चित - ज्ञात का । इस स्वरूपवाले किसका? [अत्थस्स] - इस स्वरूपवाले परमात्म-पदार्थ का [अत्थंतरम्मि] - शुद्धात्म-पदार्थ से अन्य - भिन्न ज्ञानावरणादि कर्मरूप अर्थान्तर में [संभूदो] - संजात-उत्पन्न [अत्थो] - जो मनुष्य नारक आदि रूप अर्थ - पदार्थ है, [पज्जाओ सो] - जीव की वह इसप्रकार की पर्याय विकार रहित शुद्धात्मा की अनुभूति लक्षण स्वभाव व्यंजन पर्याय से भिन्न के समान होती हुई विभाव व्यंजन पर्याय होती है । वह किनसे सहित उत्पन्न होती है? [संठाणादिप्पभेदेहिं] - संस्थान-आकार आदि से रहित परमात्म-द्रव्य से विलक्षण, संस्थान-संहनन शरीर आदि प्रभेदों से सहित उत्पन्न होती है ॥१६४॥

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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