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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 15 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



उवओगविसुद्धो जो विगदावरणंतरायमोहरओ ।

भूदो सयमेवादा जादि परं णेयभूदाणं ॥15॥

अर्थ: 

[यः] जो [उपयोगविशुद्ध:] उपयोग विशुद्ध (शुद्धोपयोगी) है [आत्मा] वह आत्मा [विगतावरणान्तरायमोहरजा:] ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय और मोहरूप रज से रहित [स्वयमेव भूत:] स्वयमेव होता हुआ [ज्ञेयभूतानां] ज्ञेयभूत पदार्थों के [पारं याति] पार को प्राप्त होता है ॥१५॥

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ शुद्धोपयोगलाभानन्तरभाविशुद्धात्मस्वभावलाभमभिनन्दति -

यो हि नाम चैतन्यपरिणामलक्षणेनोपयोगेन यथाशक्ति विशुद्धो भूत्वा वर्तते स खलु प्रतिपदमुद्भिद्यमानविशिष्टविशुद्धिशक्तिरुद्‌ग्रन्थितासंसारबद्धदृढ़तरमोहग्रंथितयात्यंतनिर्विकारचैतन्यो निरस्तसमस्तज्ञानदर्शनावरणान्तरायतया नि:प्रतिघविजृम्भितात्मशक्तिश्च स्वयमेव भूतो ज्ञेयत्वमापन्नानामन्तमवाप्नोति । इह किलात्मा ज्ञानस्वभावो, ज्ञानं तु ज्ञेयमात्रं; तत: समस्तज्ञेयान्तर्वर्तिज्ञानस्वभावमात्मानमात्मा शुद्धोपयोगप्रसादादेवासादयति ॥१५॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

अब, शुद्धोपयोग की प्राप्ति के बाद तत्काल (अन्तर पड़े बिना) ही होनेवाली शुद्धआत्मस्वभाव (केवलज्ञान) प्राप्ति की प्रशंसा करते हैं :-

जो (आत्मा) चैतन्य परिणाम-स्वरूप उपयोग के द्वारा यथा-शक्ति विशुद्ध होकर वर्तता है, वह (आत्मा) जिसे पद-पद पर (प्रत्येक पर्याय में) विशिष्ट (असाधारण) विशुद्ध शक्ति प्रगट होती जाती है, ऐसा होने से, अनादि संसार से बँधी हुई दृढ़तर मोह-ग्रंथी छूट जाने से अत्यन्त निर्विकार चैतन्यवाला और समस्त ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा अन्तराय के नष्ट हो जाने से निर्विघ्न विकसित आत्म-शक्तिवान स्वयमेव होता हुआ ज्ञेयता (पदार्थों) के अन्त को पा लेता है ।

यहाँ (यह कहा है कि) आत्मा ज्ञान-स्वभाव है, और ज्ञान ज्ञेय प्रमाण है; इसलिये समस्त ज्ञेयों के भीतर प्रवेश को प्राप्त (ज्ञाता) ज्ञान जिसका स्वभाव है ऐसे आत्मा को आत्मा शुद्धोपयोग के ही प्रसाद से प्राप्त करता है ।

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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