• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in
Shivir Banner

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 161 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



देहो य मणो वाणी पोग्गलदव्वप्पग त्ति णिद्दिट्ठा । (161)

पोग्गलदव्वं हि पुणो पिंडो परमाणुदव्वाणं ॥173॥

अर्थ: 

[देह: च मन: वाणी] देह, मन और वाणी [पुद्‌गलद्रव्यात्मका:] पुद्‌गलद्रव्यात्मक [इति निर्दिष्टा:] हैं, ऐसा (वीतरागदेव ने) कहा है [अपि पुन:] और [पुद्‌गल द्रव्य] वे पुद्‌गलद्रव्य [परमाणुद्रव्याणां पिण्ड:] परमाणुद्रव्यों का पिण्ड है ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ कायवाङ्मनसां शुद्धात्मस्वरूपात्परद्रव्यत्वं व्यवस्थापयति --

देहो य मणो वाणी पोग्गलदव्वप्पग त्तिणिद्दिट्ठा देहश्च मनो वाणी तिस्रोऽपि पुद्गलद्रव्यात्मका इति निर्दिष्टाः । कस्मात् । व्यवहारेण जीवेनसहैकत्वेपि निश्चयेन परमचैतन्यप्रकाशपरिणतेर्भिन्नत्वात् । पुद्गलद्रव्यं किं भण्यते । पोग्गलदव्वं हि पुणो पिंडो परमाणुदव्वाणं पुद्गलद्रव्यं हि स्फुटं पुनः पिण्डः समूहो भवति । केषाम् । परमाणुद्रव्याणा-मित्यर्थः ॥१६१॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[देहो य मणो वाणी पोग्गलदव्वप्पग त्ति णिद्दिट्ठा] शरीर और मन, वाणी -- तीनों ही पुद्गल-द्रव्य-स्वरूप हैं -- ऐसा कहा गया है । वे पुद्गल-द्रव्य-स्वरूप क्यों हैं ? व्यवहार से जीव के साथ एकत्व होने पर भी, निश्चय से चैतन्य-प्रकाश-परिणति से भिन्नता होने के कारण, वे पुद्गल-द्रव्य स्वरूप हैं । पुद्गल-द्रव्य क्या कहलाता है? [पोग्गलदव्वं हि पुणो पिंडो परमाणुदव्वाणं] और पुद्गल-द्रव्य वास्तव में पिण्ड (समूह) है । किनका समूह है ? वह परमाणु-द्रव्यों का समूह है -- ऐसा अर्थ है ॥१७३॥

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:प्रवचनसार_-_गाथा_161_-_तात्पर्य-वृत्ति&oldid=134448"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 23 April 2024, at 13:55.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki