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ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 172 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेदणागुणमसद्‌दं । (172)

जाण अलिंग्गहणं जीवमणिद्दिट्ठसंठाणं ॥184॥

अर्थ: 

[जीवम्] जीव को [अरस] रस-रहित [अरूपम्] रूप-रहित, [अगंधम्] गंध-रहित, [अव्यक्तम्] अव्यक्त, [चेतनागुणम्] चेतना-गुणयुक्त, [अशब्दम्] अशब्द, [अलिंगग्रहणम्] अलिंगग्रहण (लिंग द्वारा ग्रहण न होने योग्य) और [अनिर्दिष्टसंस्थानम्] जिसका कोई निश्चित संस्थान नहीं कहा गया है ऐसा [जानीहि] जानो ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ किं तर्हि जीवस्य शरीरादिसर्वपरद्रव्यविभागसाधनमसाधारणं स्वलक्षणमित्यावेदयति-

आत्मनो हि रसरूपगंधगुणाभावस्वभावत्वात्स्पर्शगुणव्यक्त्यभावस्वभावत्वात्‌

शब्दपर्यायाभावस्वभावत्वात्तथा तन्मूलादलिङ्गग्राह्यत्वात्सर्वसंस्थानाभावास्वभावत्वाच्च पुद्‌गल-द्रव्यविभागसाधनमरसत्वमरूपत्वमगन्धत्वमव्यक्तत्वमशब्दत्वमलिङ्गग्राह्यत्वम-संस्थानत्वं चास्ति । सकलपुद्‌गलापुद्‌गलाजीवद्रव्यविभागसाधनं तु चेतनागुणत्वमस्ति । तदेव च तस्य स्वजीवद्रव्यमात्राश्रितत्वेन स्वलक्षणतां बिभ्राणं शेषद्रव्यान्तरविभागं साधयति ।

अलिङ्गग्राह्य इति वक्तव्ये यदलिङ्गग्रहणमित्युक्तं तद्‌बहुतरार्थप्रतिपत्तये । तथा हि -

(१) न लिंगैरिन्द्रियैर्ग्राहकतामापन्नस्य ग्रहणं यस्येत्यतीन्द्रियज्ञानमयत्वस्य प्रतिपत्ति: ।(२) न लिंगैरिन्द्रियैर्ग्राह्यतामापन्नस्य ग्रहणं यस्येतीन्द्रियप्रत्यक्षाविषयत्वस्य । (३) न लिंगादिन्द्रियगम्याद्‌धूमादग्नेरिव ग्रहणं यस्येतीन्द्रियप्रत्यक्षपूर्वकानुमानाविषयत्वस्य । (४) न लिंगादेव परै: ग्रहणं यस्येत्यनुमेयमात्रस्याभावस्य । (५) न लिंगादेव परेषां ग्रहणं यस्येत्यनुमातृमात्रत्वा-भावस्य । (६) न लिंगात्स्वभावेन ग्रहणं यस्येति प्रत्यक्षज्ञातृत्वस्य । (७) न लिंगेनोपयोगाख्य-लक्षणेन ग्रहणं ज्ञेयार्थालम्बनं यस्येति बहिरर्थालम्बनज्ञानाभावस्य । (८) न लिंगस्यो-पयोगाख्यलक्षणस्य ग्रहणं स्वयमाहरणं यस्येत्यनाहार्यज्ञानत्वस्य ।

(९) न लिंगस्योपयोगाख्यलक्षणस्य ग्रहणं परेण हरणं यस्येत्यहार्यज्ञानत्वस्य । (१०) न लिंगे उपयोगाख्यलक्षणे ग्रहणं सूर्य इवोपरागो यस्येति शुद्धोपयोगस्वभावस्य । (११) न लिंगादुपयोगाख्यलक्षणाद्‌ग्रहणं पौद्‌गलिककर्मादान यस्येति द्रव्यकर्मासंपृथक्तत्वस्य । (१२) न लिंगेभ्य इन्द्रियेभ्यो ग्रहणं विषयाणामुपभोगो यस्येति विषयोपभोक्तृत्वाभावस्य । (१३) न लिंगात्मनो वेन्द्रियादिलक्षणाद्‌ग्रहणं जीवस्य धारणं यस्येति शुक्रार्तवानुविधायित्वाभावस्य । (१४) न लिंगस्य मेहनाकारस्य ग्रहणं यस्येति लौकिकसाधनमात्रत्वाभावस्य । (१५) न लिंगेनामेहनाकारेण ग्रहणं लोकव्याप्तिर्यस्येति कुहुकप्रसिद्धसाधनाकारलोकव्याप्तित्वाभावस्य । (१६) न लिंगानां स्त्रीपुत्रनपुंसकवेदानां ग्रहणं यस्येति स्त्रीपुत्रनपुंसकद्रव्यभावाभावस्य । (१७) न लिंगानां धर्मध्वजानां ग्रहणं यस्येति बहिरङ्गयतिलिंगाभावस्य । (१८) न लिंगं गुणो ग्रहणमर्थावबोधो यस्येति गुणविशेषनालीढशुद्धद्रव्यत्वस्य । (१९) न लिंगं पर्यायो ग्रहणमर्थावबोध-विशेषो यस्येति पर्यायविशेषानालीढशुद्धद्रव्यत्वस्य । (२०) न लिंगं प्रत्यभिज्ञानहेतुर्ग्रहण-मर्थावबोधसामान्यं यस्येति द्रव्यानालीढशुद्धपर्यायत्वस्य ॥१७२॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

आत्मा

  1. रसगुण के अभावरूप स्वभाव वाला होने से,
  2. रूपगुण के अभावरूप स्वभाववाला होने से,
  3. गंधगुण के अभावरूप स्वभाव वाला होने से,
  4. स्पर्शगुण रूप व्यक्तता के अभावरूप स्वभाववाला होने से,
  5. शब्द पर्याय के अभावरूप स्वभाववाला होने से, तथा
  6. इन सबके कारण (अर्थात् रस-रूप-गंध इत्यादि के अभावरूप स्वभाव के कारण) लिंग के द्वारा अग्राह्य होने से और
  7. सर्व संस्थानों के अभावरूप स्वभाववाला होने से,
आत्मा को पुद्‌गलद्रव्य से विभाग का साधनभूत
  1. अरसत्‍व,
  2. अरूपत्‍व,
  3. अगंधत्‍व,
  4. अव्यक्तता,
  5. अशब्दत्‍व,
  6. अलिंगग्राह्यत्‍व और
  7. असंस्थानत्‍व
है । पुद्‌गल तथा अपुद्‌गल ऐसे समस्त अजीव द्रव्यों से विभाग का साधन तो चेतनागुणमयपना है; और वही, मात्र स्व-जीव-द्रव्याश्रित होने से स्व-लक्षणत्‍व को धारण करता हुआ, आत्मा का शेष अन्य द्रव्यों से विभाग (भेद) सिद्ध करता है ।

जहाँ 'अलिंगग्राह्य' करना है वहाँ जो 'अलिंगग्रहण' कहा है, वह बहुत से अर्थों की प्रतिपत्ति (प्राप्ति, प्रतिपादन) करने के लिये है । वह इस प्रकार है :—

  1. ग्राहक (ज्ञायक) जिसके लिंगों के द्वारा अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण (जानना) नहीं होता वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा अतीन्द्रियज्ञानमय है' इस अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  2. ग्राह्य (ज्ञेय) जिसका लिंगों के द्वारा अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण (जानना) नहीं होता वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा इन्द्रियप्रत्यक्ष का विषय नहीं है' इस अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  3. जैसे धुएँ से अग्नि का ग्रहण (ज्ञान) होता है, उसी प्रकार लिंग द्वारा, अर्थात् इन्द्रियगम्य (इन्द्रियों से जानने योग्य चिह्न) द्वारा जिसका ग्रहण नहीं होता वह अलिंगग्रहण है । इस प्रकार 'आत्मा इन्द्रियप्रत्यक्षपूर्वक अनुमान का विषय नहीं है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  4. दूसरों के द्वारा—मात्र लिंग द्वारा ही जिसका ग्रहण नहीं होता वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा अनुमेय मात्र नहीं है' (आत्मा केवल अनुमान से ही ज्ञात होने योग्य नहीं है) ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  5. जिसके लिंग से ही पर का ग्रहण नहीं होता वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा अनुमाता मात्र नहीं है' (आत्मा केवल अनुमान करने वाला नहीं है) ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  6. जिसके लिंग के द्वारा नहीं किन्तु स्वभाव के द्वारा ग्रहण होता है वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा प्रत्यक्ष ज्ञाता है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  7. जिसके लिंग द्वारा अर्थात् उपयोगनामक लक्षण द्वारा ग्रहण नहीं है अर्थात् ज्ञेय पदार्थों का आलम्बन नहीं है, वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा के बाह्य पदार्थों का आलम्बनवाला ज्ञान नहीं है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  8. जो लिंग को अर्थात् उपयोग नामक लक्षण को ग्रहण नहीं करता अर्थात् स्वयं (कहीं बाहर से) नहीं लाता सो अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा जो कहीं से नहीं लाया जाता ऐसे ज्ञानवाला है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  9. लिंग का अर्थात् उपयोगनामक लक्षण का ग्रहण अर्थात् पर से हरण नहीं हो सकता सो अलिंग ग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा के ज्ञान का हरण नहीं किया जा सकता' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  10. जिसे लिंग में अर्थात् उपयोगनामक लक्षण में ग्रहण अर्थात् सूर्य की भाँति उपराग (मलिनता, विकार) नहीं है वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा शुद्धोपयोगस्वभावी है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  11. लिंग द्वारा अर्थात् उपयोगनामक लक्षण द्वारा ग्रहण अर्थात् पौद्‌गलिक कर्म का ग्रहण जिसके नहीं है, वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा द्रव्यकर्म से असंयुक्त (असंबद्ध) है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  12. जिसे 'लिंगों के द्वारा अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण अर्थात् विषयों का उपभोग नहीं है’ सो अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा विषयों का उपभोक्ता नहीं है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  13. लिंग द्वारा अर्थात् मन अथवा इन्द्रियादि लक्षण के द्वारा ग्रहण अर्थात् जीवत्व को धारण कर रखना जिसके नहीं है वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा शुक्र और आर्तव (रक्त) को अनुविधायी (अनुसार होने-वाला) नहीं है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  14. लिंग का अर्थात् मेहनाकार (पुरुषादि की इन्द्रिय का आकार) का ग्रहण जिसके नहीं है सो अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा लौकिक साधन-मात्र नहीं है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  15. लिंग के द्वारा अर्थात् अमेहनाकार के द्वारा जिसका ग्रहण अर्थात् लोक में व्यापकत्व नहीं है सो अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा पाखण्डियों के प्रसिद्ध साधनरूप आकार वाला—लोकव्याप्तिवाला नहीं है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  16. जिसके लिंगों का अर्थात् स्त्री, पुरुष और नपुंसक वेदों का ग्रहण नहीं है वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा द्रव्य से तथा भाव से स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक नहीं है' इस अर्थ की प्राप्ति होती है
  17. लिंगों का अर्थात् धर्मचिह्नों का ग्रहण जिसके नहीं है वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा के बहिरंग यतिलिंगों का अभाव है' इस अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  18. लिंग अर्थात् गुण ऐसा जो ग्रहण अर्थात् अर्थावबोध (पदार्थज्ञान) जिसके नहीं है सो अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा गुणविशेष से आलिंगित न होनेवाला ऐसा शुद्ध द्रव्य है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  19. लिंग अर्थात् पर्याय ऐसा जो ग्रहण, अर्थात् अर्थावबोध-विशेष जिसके नहीं है सो अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा पर्यायविशेष से आलिंगित न होनेवाला ऐसा शुद्ध द्रव्य है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ।
  20. लिंग अर्थात् प्रत्यभिज्ञान का कारण ऐसा जो ग्रहण अर्थात् अर्थावबोध सामान्य जिसके नहीं है वह अलिंगग्रहण है; इस प्रकार 'आत्मा द्रव्य से नहीं आलिंगित ऐसी शुद्ध पर्याय है' ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है ॥१७२॥

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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