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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 180 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



परिणामादो बंधो परिणामो रागदोसमोहजुदो । (180)

असुहो मोहपदोसो सुहो व असुहो हवदि रागो ॥192॥

अर्थ: 

[परिणामात् बंध:] परिणाम से बन्ध है, [परिणाम: रागद्वेषमोहयुत:] (जो) परिणाम राग-द्वेष-मोहयुक्त है । [मोहप्रद्वेषौ अशुभौ] (उनमें से) मोह और द्वेष अशुभ है, [राग:] राग [शुभ: वा अशुभ:] शुभ अथवा अशुभ [भवति] होता है ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ परिणामस्य द्रव्यबन्धसाधकतमरागविशिष्टत्वं सविशेषं प्रकटयति -

द्रव्यबन्धोऽस्ति तावद्विशिष्टपरिणामात्‌ । विशिष्टत्वं तु परिणामस्य रागद्वेषमोहमयत्वेन । तच्च शुभाशुभत्वेन द्वैतानुवर्ति । तत्र मोहद्वेषमयत्वेनाशुभत्वं रागमयत्वेन तु शुभत्वं चाशुभत्वं च । विशुद्धिसंक्लेशाङ्गत्वेन रागस्य द्वैविध्यात्‌ भवति ॥१८०॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

प्रथम तो द्रव्यबन्ध विशिष्ट परिणाम से होता है । परिणाम की विशिष्टता राग-द्वेष-मोहमयपने के कारण है । वह शुभ और अशुभपने के कारण द्वैत का अनुसरण करता है । (अर्थात् दो प्रकार का है); उसमें से मोह-द्वेषमयपने से अशुभपना होता है, और रागमयपने से शुभपना तथा अशुभपना होता है क्योंकि राग-विशुद्धि तथा संक्लेशयुक्त होने से दो प्रकार का होता है ॥१८०॥

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

तत्त्व-प्रदीपिका अनुक्रमणिका

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