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ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 200.1 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



दंसणसंसुद्धाणं सम्मण्णाणोवजोगजुत्ताणं ।

अव्वाबाधरदाणं णमो णमो सिद्धसाहूणं ॥214॥

अर्थ: 

दर्शन से संशुद्ध, सम्यग्ज्ञान और उपयोग से सहित निर्बाध-रूप से स्वरूप-लीन सिद्ध-साधुओं को बारम्बार नमस्कर हो ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

एवं निजशुद्धात्मभावनारूपमोक्षमार्गेण ये सिद्धिं गता ये च तदाराधकास्तेषां दर्शनाधि-कारापेक्षयावसानमङ्गलार्थं ग्रन्थात्पेक्षया मध्यमङ्गलार्थं च तत्पदाभिलाषी भूत्वा नमस्कारं करोति --

णमो णमो नमो नमः । पुनः पुनर्नमस्करोमीति भक्ति प्रकर्षं दर्शयति । केभ्यः । सिद्धसाहूणं सिद्धसाधुभ्यः । सिद्धशब्दवाच्यस्वात्मोपलब्धिलक्षणार्हत्सिद्धेभ्यः, साधुशब्दवाच्यमोक्षसाधकाचार्यो-पाध्यायसाधुभ्यः । पुनरपि कथंभूतेभ्यः । दंसणसंसुद्धाणं मूढत्रयादिपञ्चविंशतिमलरहितसम्यग्दर्शन-संशुद्धेभ्यः । पुनरपि कथंभूतेभ्यः । सम्मण्णाणोवजोगजुत्ताणं संशयादिरहितं सम्यग्ज्ञानं, तस्योपयोगःसम्यग्ज्ञानोपयोगः, योगो निर्विकल्पसमाधिर्वीतरागचारित्रमित्यर्थः, ताभ्यां युक्ताः सम्यग्ज्ञानोपयोग-युक्तास्तेभ्यः । पुनश्च किंरूपेभ्यः। अव्वाबाधरदाणं सम्यग्ज्ञानादिभावनोत्पन्नाव्याबाधानन्तसुख-रतेभ्यश्च ॥२१४॥

इति नमस्कारगाथासहितस्थलचतुष्टयेन चतुर्थविशेषान्तराधिकारः समाप्तः ।

एवं 'अत्थित्तणिच्छिदस्स हि' इत्याद्येकादशगाथापर्यन्तं शुभाशुभशुद्धोपयोगत्रयमुख्यत्वेन प्रथमो विशेषान्तराधिकारस्तदनन्तरं 'अपदेसो परमाणू पदेसमेत्तो य' इत्यादिगाथानवकपर्यन्तं पुद्गलानां परस्परबन्धमुख्यत्वेन द्वितीयो विशेषान्तराधिकारस्ततः परं 'अरसमरूवं' इत्याद्येकोनविंशतिगाथापर्यन्तं जीवस्य पुद्गलकर्मणा सह बन्धमुख्यत्वेन तृतीयो विशेषान्तराधिकारस्ततश्च 'ण चयदि जो दु ममत्तिं' इत्यादिद्वादशगाथापर्यन्तं विशेषभेदभावनाचूलिकाव्याख्यानरूपश्चतुर्थो विशेषान्तराधिकार इत्येकाधिक-पञ्चाशद्गाथाभिर्विशेषान्तराधिकारचतुष्टयेन विशेषभेदभावनाभिधानश्चतुर्थोऽन्तराधिकारः समाप्तः ।इति श्रीजयसेनाचार्यकृतायां तात्पर्यवृत्तौ 'तम्हा तस्स णमाइं' इत्यादिपञ्चत्रिंशद्गाथापर्यन्तंसामान्यज्ञेयव्याख्यानं, तदनन्तरं 'दव्वं जीवं' इत्याद्येकोनविंशतिगाथापर्यन्तं जीवपुद्गलधर्मादिभेदेन विशेषज्ञेयव्याख्यानं, ततश्च 'सपदेसेहिं समग्गो' इत्यादिगाथाष्टकपर्यन्तं सामान्यभेदभावना, ततः परं 'अत्थित्तणिच्छिदस्स हि' इत्याद्येकाधिक पञ्चाशद्गाथापर्यन्तं विशेषभेदभावना चेत्यन्तराधिकारचतुष्टयेन त्रयोदशाधिकशतगाथाभिः सम्यग्दर्शनाधिकारनामा ज्ञेयाधिकारापरसंज्ञो द्वितीयो महाधिकारः समाप्तः ॥२॥

कार्यं प्रत्यत्रैव ग्रन्थः समाप्त इति ज्ञातव्यम् । कस्मादिति चेत् । 'उवसंपयामि सम्मं' इतिप्रतिज्ञासमाप्तेः ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[णमो णमो] नमस्कार हो-नमस्कार हो । बारम्बार नमस्कार करता हूँ -- इसप्रकार भक्ति की अधिकता दिखाई है । किन्हें नमस्कार हो ? [सिद्धसाहूणं] सिद्ध, साधुओं को नमस्कार हो । सिद्ध शब्द से वाच्य अपने आत्मा की उपलब्धि लक्षण अरहन्त और सिद्धों को तथा साधु शब्द से वाच्य सिद्ध दशा को साधने वाले आचार्य, उपाध्याय और साधुओं को नमस्कर हो । और भी किस विशेषता वालों को नमस्कार हो ? [दंसणसंसुद्धाणं] तीन मूढ़ता आदि २५ दोषों से रहित, सम्यग्दर्शन से संशुद्ध जीवों को नमस्कार हो । और भी किस विशेषता वालों को नमस्कार हो ? [सम्मण्णाणोवजोगजुत्ताणं] संशय आदि दोषों से रहित ज्ञान सम्यग्ज्ञान है, उसका उपयोग सम्यग्ज्ञानोपयोग है, योग अर्थात् विकल्प-रहित समाधि स्वरूप-लीनता-रूप वीतराग-चारित्र ऐसा अर्थ है, उनसे सहित सम्यग्ज्ञानोपयोग से सहित, उनके लिये (इसप्रकार षष्ठी तत्पुरुष, तृतीया तत्पुरुष तथा चतुर्थी तत्पुरुष समास द्वारा विश्लेषण किया गया है) उन्हें नमस्कर हो । और भी किस स्वरूप-वालों को नमस्कर हो? [अव्वाबाधरदाणं] सम्यग्ज्ञान आदि रूप भावना से उत्पन्न अव्याबाध-बाधा-रहित और अनन्त सुख में लीन जीवों को नमस्कर हो ।

इसप्रकार नमस्कार गाथा सहित चार स्थलों द्वारा चौथा विशेषान्तराधिकार पूर्ण हुआ ।

इसप्रकार 'अत्थित्तणिच्छिदस्स हि' इत्यादि ग्यारह गाथाओं तक शुभोपयोग, अशुभोपयोग, शुद्धोपयोग इन तीन की मुख्यता से पहला विशेषान्तराधिकार, उसके बाद 'अपदेसो परमाणु पदेसमेत्तो य' इत्यादि नौ गाथाओं तक पुद्गलों के परस्पर बन्ध की मुख्यता से दूसरा विशेषान्तराधिकार तदुपरान्त 'अरसमरूवं' इत्यादि ११ गाथाओं तक पुद्गल कर्म के साथ जीव के बन्ध की मुख्यता से तीसरा विशेषान्तराधिकार और तत्पश्चात् 'ण चयदि जो ममत्ति' इत्यादि बारह गाथाओं तक विशेष भेद-भावना चूलिका व्याख्यान-रूप चौथा विशेषान्तराधिकार -- इसप्रकार ५१ गाथाओं द्वारा चार विशेषान्तराधिकार रूप से विशेष भेद-भावना नामक चौथा अधिकार पूर्ण हुआ ।

इसप्रकार 'श्री जयसेनाचार्य' कृत 'तात्पर्यवृत्ति' में 'तम्हा तस्स णमाइं' इत्यादि ३५ गाथाओं तक सामान्य ज्ञेय व्याख्यान, तदुपरान्त 'दव्यं जीवं' इत्यादि ११ गाथाओं तक जीव्-पुद्गल-धर्मादि भेद से विशेष ज्ञेय-व्याख्यान, तत्पश्चात् 'सपदेसेहिं समग्गो' इत्यादि आठ गाथाओं तक सामान्य भेद-भावना अधिकार और उसके बाद 'अत्थित्तणिच्छिदस्स हि' इत्यादि ५१ गाथाओं तक विशेष भेद-भावना-अधिकार -- इसप्रकार चार अधिकारों से ११३ गाथाओं द्वारा 'सम्यग्दर्शन अधिकार' अपर नाम 'ज्ञेयाधिकार' नामक दूसरा महाधिकार पूर्ण हुआ ।

कार्य की अपेक्षा यहाँ (२१४ वीं गाथा की पूर्णता पर) ही ग्रन्थ पूरा हो गया है -- ऐसा जानना चाहिये । ऐसा क्यों जानना चाहिये? यदि ऐसा प्रश्न हो तो कहते हैं -- 'उवसंपयामि सम्मं' साम्य का आश्रय ग्रहण करता हूँ -- इस प्रतिज्ञा की पूर्णता हो जाने से, यहाँ ही ग्रन्थ की पूर्णता जानना चाहिये ।

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