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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 201 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



एवं पणमिय सिद्धे जिणवरवसहे पुणो पुणो समणे । (201)

पडिवज्जदु सामण्णं जदि इच्छदि दुक्खपरिमोक्खं ॥215॥

अर्थ: 

[यदि दु:खपरिमोक्षम् इच्छति] यदि दुःखों से परिमुक्त होने की (छुटकारा पाने की) इच्छा हो तो, [एवं] पूर्वोक्त प्रकार से (ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन की प्रथम तीन गाथाओं के अनुसार) [पुन: पुन:] बारंबार [सिद्धान्] सिद्धों को, [जिनवरवृषभान्] जिनवरवृषभों को (अर्हन्तों को) तथा [श्रमणान्] श्रमणों को [प्रणम्य] प्रणाम करके, [श्रामण्य प्रतिपद्यताम्] (जीव) श्रामण्य को अंगीकार करो ॥२०१॥

तत्त्व-प्रदीपिका: 

यथा ममात्मना दु:खमोक्षार्थिना -

किच्चा अरहंताणं सिद्धाणं तह णमो गणहराणं ।

अज्झावयवग्गाणं साहूणं चेव सव्वेसिं ॥४ ॥

तेसिं विसुद्धदंसणणाणपहाणासमं समासेज्ज ।

उवसंपयामि सम्मं जत्ते णिव्वाणसंपत्ती ॥५॥१

इति अर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसाधूनां प्रणतिवन्दनात्मकनमस्कारपुर:सरं विशुद्धदर्शन-ज्ञानप्रधानं साम्यनाम श्रामण्यमवान्तरग्रन्थसंदर्भोभयसंभावितसौस्थित्यं स्वयं प्रतिपन्नं, परेषामात्मापि यदि दु:खमोक्षार्थी तथा तत्प्रतिपद्यताम्‌ ।

यथानुभूतस्य तत्प्रत्तिपत्तिवर्त्मन: प्रणेतारो वयमिमे तिष्ठाम इति ॥२०१॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

अब दूसरों को चरणानुयोग की सूचक चूलिका है ।

((ज्ञान-ज्ञेय को जानकर धर चारित्र महान ।

शिवमग की परिपूर्णता पावैं श्रद्धावान ॥))

(उसमें, प्रथम श्री अमृतचन्द्राचार्य-देव श्‍लोक के द्वारा अब इस आगामी गाथा की उत्थानिका करते हैं ।)

((द्रव्यसिद्धि से चरण अर चरण सिद्धि से द्रव्य ।

यह लखकर सब आचरो द्रव्यों से अविरुद्ध ॥१३॥))

द्रव्य की सिद्धि में चरण की सिद्धि है, और चरण की सिद्धि में द्रव्य की सिद्धि है,—यह जानकर, कर्मों से (शुभाशुभ भावों से) अविरत दूसरे भी, द्रव्य से अविरुद्ध चरण (चारित्र) का आचरण करो ।

इस प्रकार (श्रीमद् भगवत्कृन्दकुन्दाचार्यदेव इस आगामी गाथा के द्वारा) दूसरों को चरण (चारित्र) के आचरण करने में युक्त करते (जोड़ते) हैं ।

अब गाथा के प्रारंभ करने से पूर्व उसकी संधि के लिये श्री अमृतचन्द्राचार्यदेव ने पंच परमेष्ठी को नमस्कार करने के लिये निम्न प्रकार से ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन अधिकार की प्रथम तीन गाथायें लिखी हैं:—

((एस सुरासुरमणुसिंदवंदिदंधोदघाइकम्ममलं ।

पणमामि वड्ढमाणं तित्थंधम्मस्स कत्तारं ॥

सेसे पुण तित्थयरे ससव्‍वसिद्धे विसुद्धसब्भावे ।

समणे य णाणदंसणचरित्ततववीरियायारे ॥

ते ते सव्‍वे समगं समगं पत्तेगमेव पत्तेगं ।

वंदामि य वट्टंते अरहंते माणुसे खेत्ते ॥))

(अब, इस अधिकार की गाथा प्रारंभ करते हैं : )

जैसे दुःखों से मुक्त होने के अर्थी मेरे आत्माने -

((किच्‍चा अरहंताणं सिद्धाणं तह णमो गणहराणं ।

अज्‍झावयवग्गाणं साहूणं चेव सव्‍वेसिं ॥

तेसिं विसुद्धदंसणणाणपहाणासमं समासेज्‍ज ।

उवसंपयामि सम्मं जत्तो णिव्‍वाणसंपत्ती ॥))

इस प्रकार अर्हन्तों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों तथा साधुओं को प्रणाम--वंदनात्मक नमस्कार पूर्वक विशुद्ध दर्शन-ज्ञान-प्रधान साम्य नामक श्रामण्य को--जिसका इस ग्रंथ में कहे हुए (ज्ञानतत्त्व—प्रज्ञापन और ज्ञेयतत्त्वप्रज्ञापन नामक) दो अधिकारों की रचना द्वारा सुस्थितपन हुआ है उसे--स्वयं अंगीकार किया, उसी प्रकार दूसरों का आत्मा भी, यदि दु:खों से मुक्त होने का अर्थी (इच्छुक) हो तो, उसे अंगीकार करे । उस (श्रामण्य) को अंगीकार करने का जो यथानुभूत मार्ग है उसके प्रणेता हम यह खड़े हुये हैं ॥२०१॥

अब, श्रमण होने का इच्छुक पहले क्या-क्या करता है उसका उपदेश करते हैं :-

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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