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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 213 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



अधिवासे व विवासे छेदविहूणो भवीय सामण्णे । (213)

समणो विहरदु णिच्चं परिहरमाणो णिबंधाणि ॥227॥

अर्थ: 

[अधिवासे] अधिवास में (आत्म-वास में अथवा गुरुओं के सहवास में) वसते हुए [वा] या [विवासे] विवास में (गुरुओं से भिन्न वास में) वसते हुए, [नित्यं] सदा [निबंधान्] (परद्रव्य-सम्बन्धी) प्रतिबंधों को [परिहरमाण:] परिहरण करता हुआ [श्रामण्ये] श्रामण्य में [छेदविहीन: भूत्वा] छेद-विहीन होकर [श्रमण: विहरतु] श्रमण विहरो ॥२१३॥

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ श्रामणस्य छेदायतनत्वात्‌ परद्रव्यप्रतिबन्धा: प्रतिषेध्या इत्युपदिशति -

सर्व एव हि परद्रव्यप्रतिबन्धा उपयोगोपरञ्जकत्वेन निरुपरागोपयोगरूपस्य श्रामण्यस्य छेदायतनानि तदभावादेवाछिन्नश्रामण्यम्‌ । अत आत्मन्येवात्मनो नित्याधिकृत्य वासे वा, गुरुत्वेन गुरूनधिकृत्य वासे वा, गुरुभ्यो विशिष्टे वासे वा, नित्यमेव प्रतिषेधयन्‌ परद्रव्यप्रतिबन्धान्‌ श्रामण्ये छेदविहीनो भूत्वा श्रमणो वर्तताम्‌ ॥२१३॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

वास्तव में सभी पर-द्रव्य-प्रतिबंध उपयोग के उपरंजक होने से निरुपराग उपयोग-रूप श्रामण्य के छेद के आयतन हैं; उनके अभाव से ही अछिन्‍न श्रामण्य होता है । इसलिये आत्मा में ही आत्मा को सदा अधिकृत करके (आत्मा के भीतर) बसते हुए अथवा गुरु-रूप से गुरुओं को अधिकृत करके (गुरुओं के सहवास में) निवास करते हुए या गुरुओं से विशिष्ट—भिन्न वास में वसते हुए, सदा ही पर-द्रव्य-प्रतिबंधों को निषेधता (परिहरता) हुआ श्रामण्य में छेदविहीन होकर श्रमण वर्तो ॥२१३॥

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

तत्त्व-प्रदीपिका अनुक्रमणिका

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