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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 216 - तत्त्व-प्रदीपिका

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अपयत्ता वा चरिया सयणासणठाणचंकमादीसु । (216)

समणस्स सव्वकाले हिंसा सा संतय त्ति मदा ॥230॥

अर्थ: 

[श्रमणस्य] श्रमण के [शयनासनस्थानचंक्रमणादिषु] शयन, आसन (बैठना), स्थान (खड़े रहना), गमन इत्यादि में [अप्रयता वा चर्या] जो अप्रयत चर्या है [सा] वह [सर्वकाले] सदा [संतता हिंसा इति मता] सतत हिंसा मानी गई है ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ को नाम छेद इत्युपदिशति -

अशुद्धोपयोगो हि छेद:, शुद्धोपयोगरूपस्य श्रामण्यस्य छेदनात्‌, तस्य हिंसनात्‌ स एव च हिंसा । अत: श्रमणस्याशुद्धोपयोगाविनाभाविनी शयनासनस्थानचंक्रमणादिष्वप्रयता या चर्या सा खलु तस्य सर्वकालमेव संतानवाहिनी छेदानर्थान्तरभूता हिंसैव ॥२१६॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

अशुद्धोपयोग वास्तव में छेद है, क्योंकि (उससे) शुद्धोपयोगरूप श्रामण्य का छेदन होता है; और वही (अशुद्धोपयोग ही) हिंसा है, क्योंकि (उससे) शुद्धोपयोगरूप श्रामण्य का हिंसन (हनन) होता है । इसलिये श्रमण के, जो अशुद्धोपयोग के बिना नहीं होती ऐसे शयन-आसन-स्थान-गमन इत्यादि में *अप्रयत चर्या (आचरण) वह वास्तव में उसके लिये सर्वकाल में (सदा) ही संतानवाहिनी हिंसा ही है, -- जो कि छेद से अनन्यभूत है (अर्थात् छेद से कोई भिन्न वस्तु नहीं है) ॥२१६॥

*अप्रयत = = प्रयत्न रहित, असावधान, असंयमी, निरंकुश, स्वच्छन्दी ।

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

तत्त्व-प्रदीपिका अनुक्रमणिका

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