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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 219 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



हवदि व ण हवदि बंधो मदम्हि जीवेऽध कायचेट्ठम्हि । (219)

बंधो धुवमुवधीदो इदि समणा छड्डिया सव्वं ॥235॥

अर्थ: 

[अथ] अब (उपधि के संबंध में ऐसा है कि), [कायचेष्टायाम्] कायचेष्टापूर्वक [जीवे मृते] जीव के मरने पर [बन्ध:] बंध [भवति] होता है [वा] अथवा [न भवति] नहीं होता; (किन्तु) [उपधे:] उपधि से-परिग्रह से [ध्रुवम् बंध:] निश्‍चय ही बंध होता है; [इति] इसलिये [श्रमणा:] श्रमणों (अर्हन्तदेवों) ने [सर्वं] सर्व परिग्रह को [त्यक्तवन्तः] छोड़ा है ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ बहिरङ्गजीवघाते बन्धो भवति, न भवति वा, परिग्रहे सति नियमेन भवतीति प्रतिपादयति --

हवदि व ण हवदि बंधो भवतिवा न भवति बन्धः । कस्मिन्सति । मदम्हि जीवे मृते सत्यन्यजीवे । अध अहो । कस्यां सत्याम् । कायचेट्ठम्हि कायचेष्टायाम् । तर्हि कथं बन्धो भवति । बंधो धुवमुवधीदो बन्धो भवति ध्रुवं निश्चितम् । कस्मात् । उपधेः परिग्रहात्सकाशात् । इदि इति हेतोः समणा छड्डिया सव्वं श्रमणा महाश्रमणाः सर्वज्ञाःपूर्वं दीक्षाकाले शुद्धबुद्धैकस्वभावं निजात्मानमेव परिग्रहं कृत्वा, शेषं समस्तं बाह्याभ्यन्तरपरिग्रहं

छर्दितवन्तस्त्यक्तवन्तः । एवं ज्ञात्वा शेषतपोधनैरपि निजपरमात्मपरिग्रहं स्वीकारं कृत्वा, शेषः सर्वोऽपिपरिग्रहो मनोवचनकायैः कृतकारितानुमतैश्च त्यजनीय इति । अत्रेदमुक्तं भवति – शुद्धचैतन्यरूपनिश्चय-प्राणे रागादिपरिणामरूपनिश्चयहिंसया पातिते सति नियमेन बन्धो भवति । परजीवघाते पुनर्भवति वा न भवतीति नियमो नास्ति, परद्रव्ये ममत्वरूपमूर्च्छापरिग्रहेण तु नियमेन भवत्येवेति ॥२३५॥

एवंभावहिंसाव्याख्यानमुख्यत्वेन पञ्चमस्थले गाथाषटंक गतम् ।

इति पूर्वोक्तक्रमेण 'एवं पणमिय सिद्धे' इत्याद्येकविंशतिगाथाभिः स्थलपञ्चकेनोत्सर्गचारित्रव्याख्याननामा प्रथमोऽन्तराधिकारः समाप्तः ।

अतःपरं चारित्रस्य देशकालापेक्षयापहृतसंयमरूपेणापवादव्याख्यानार्थं पाठक्रमेण त्रिंशद्गाथाभिर्द्वितीयो-ऽन्तराधिकारः प्रारभ्यते । तत्र चत्वारि स्थलानि भवन्ति । तस्मिन्प्रथमस्थले निर्ग्रन्थमोक्षमार्ग-स्थापनामुख्यत्वेन 'ण हि णिरवेक्खो चागो' इत्यादि गाथापञ्चकम् । अत्र टीकायां गाथात्रयं नास्ति । तदनन्तरं सर्वसावद्यप्रत्याख्यानलक्षणसामायिकसंयमासमर्थानां यतीनां संयमशौचज्ञानोपकरण-निमित्तमपवादव्याख्यानमुख्यत्वेन 'छेदो जेण ण विज्जदि' इत्यादि सूत्रत्रयम् । तदनन्तरं स्त्रीनिर्वाण-निराकरणप्रधानत्वेन 'पेच्छदि ण हि इह लोगं' इत्याद्येकादश गाथा भवन्ति । ताश्च अमृतचन्द्रटीकायां नसन्ति । ततः परं सर्वोपेक्षासंयमासमर्थस्य तपोधनस्य देशकालापेक्षया किंचित्संयमसाधकशरीरस्य निरवद्याहारादिसहकारिकारणं ग्राह्यमिति पुनरप्यपवादविशेषव्याख्यानमुख्यत्वेन 'उवयरणं जिणमग्गे' इत्याद्येकादशगाथा भवन्ति । अत्र टीकायां गाथाचतुष्टयं नास्ति । एवं मूलसूत्राभिप्रायेण त्रिंशद्गाथाभिः, टीकापेक्षया पुनर्द्वादशगाथाभिः द्वितीयान्तराधिकारे समुदायपातनिका । तथाहि --

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[हवदि वा ण हवदि बंधे] बन्ध होता है अथवा नहीं होता है । क्या होने पर बन्ध होता है अथवा नहीं होता है? [मदम्हि जीवे] दूसरे जीव के मर जाने पर, बन्ध होता है अथवा नहीं होता है । [अध] अहो! कैसे मर जाने पर बन्ध होता है अथवा नहीं होता है? [कायचेट्ठम्हि] शरीर की चेष्टा से जीव मर जाने पर बन्ध होता है अथवा नहीं होता है । तो बन्ध कैसे होता है? [बन्धो धुवमुवधीदो] ध्रुव-निश्चित बन्ध होता है । किससे निश्चित ही बन्ध होता है? उपधि अर्थात् परिग्रह से बन्ध निश्चित ही होता है । [इदि] इस कारण- [समणा छड्डिया सव्वं] श्रमण अर्थात महाश्रमण सर्वज्ञ भगवान ने, पहले दीक्षा के समय शुद्ध-बुद्ध एक स्वभावी अपने आत्मा को सब ओर से ग्रहण कर, शेष सम्पूर्ण अन्तरंग और बहिरंग परिग्रह, छर्दि (वमन) के समान छोड़ा है । ऐसा जानकर, शेष मुनिराजों को भी अपने परमात्मा को परिग्रहण कर-स्वीकार कर शेष सभी परिग्रह, मन-वचन-काय और कृत-कारित-अनुमोदना रूप से छोड़ देना चाहिये ।

यहाँ यह कहा गया है कि रागादि परिणामरूप निश्चय हिंसा से चैतन्यरूप निश्चय प्राणों का घात होने पर, नियम से बन्ध होता है । दूसरे जीव का घात होने पर होता भी है, नहीं भी होता, नियम नहीं है; परन्तु परद्रव्य में ममत्वरूप मूर्च्छा परिग्रह से तो नियम से बंध होता ही है ।

इसप्रकार भावहिंसा के व्याख्यान की मुख्यता से पाँचवे स्थल में छह गाथायें पूर्ण हुई । इसप्रकार पहले कहे गये क्रम से '[एवं पणमिय सिद्धे]' इत्यादि २१ गाथाओं द्वारा पाँचवे स्थलरूप से '[उत्सर्ग चारित्र व्याख्यान]' नामक पहला अन्तराधिकार समाप्त हुआ ।

अब इसके बाद चारित्र के देश-काल की अपेक्षा अपहृत संयमरूप से अपवाद व्याख्यान के लिये पाठक्रम में ३० गाथाओं द्वारा दूसरा अन्तराधिकार प्रारम्भ होता है । वहीं चार स्थल हैं । उनमें

  • प्रथम स्थल में निर्ग्रन्थ मोक्षमार्ग की स्थापना की मुख्यता से व '[ण हि णिरवेक्खो चागो]' इत्यादि पाँच गाथायें हैं । यहाँ टीका में (तत्त्वप्रदीपिका टीका में) तीन गाथायें नहीं हैं ।
  • उसके बाद दूसरे स्थल में, सम्पूर्ण सावद्य (पाप क्रियाओं) का त्याग लक्षण सामायिक संयम में असमर्थ मुनिराजों के संयम, शौच और ज्ञान के उपकरण निमित्त अपवाद व्याख्यान की मुख्यता से '[छेदो जेण ण विज्जदि]' इत्यादि तीन गाथायें हैं ।
  • उसके बाद तीसरे स्थल में, स्त्री- मुक्ति के निराकरण की प्रधानता से '[पेच्छदि ण हि इह लोगं]' इत्यादि ग्यारह गाथायें हैं । और वे गाथायें '[आचार्य अमृतचन्द्र]' कृत टीका में नहीं हैं ।
  • तदुपरान्त चौथे स्थल में परिपूर्ण उपेक्षा संयम में असमर्थ मुनिराजों के, देशकाल की अपेक्षा किंचित् संयम के साधक शरीर के लिये निर्दोष आहार आदि सहकारी कारण ग्रहण करने योग्य हैं
- इसप्रकार फिर से अपवाद के विशेष व्याख्यान की मुख्यता से '[उवयरणं जिणमग्गे]' इत्यादि ग्यारह गाथायें हैं । यहाँ टीका (त.प्र.) में चार गाथायें नहीं हैं ।

इस प्रकार गाथाओं के अभिप्राय से ३० गाथाओं द्वारा और (त.प्र.) टीका की अपेक्षा बारह गाथाओं द्वारा दूसरे में सामूहिक पातनिका है ।

चारित्राधिकार के द्वितीय अन्तराधिकार का स्थल विभाजन
स्थल क्रम प्रतिपादित विषय कहाँ से कहाँ पर्यंत गाथाएँ कुल गाथाएँ
प्रथम निर्ग्रंथ मोक्षमार्ग की स्थापना 236 से 240 5
द्वितीय अपवाद व्याख्यान 241 से 243 3
तृतीय स्त्री मुक्ति निराकरण 244 से 254 11
चतुर्थ अपवाद विशेष व्याख्यान 255 से 265 11
कुल 4 स्थल कुल 30 गाथाएँ

वह इसप्रकार -

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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