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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 222 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



छेदो येन न विद्यते ग्रहणविसर्गेषु सेवमानस्य । (222)

समणो तेणिह वट्टदु कालं खेत्तं वियाणित्ता ॥241॥

अर्थ: 

[ग्रहणविसर्गेषु] जिस उपधि के (आहार-नीहारादि के) ग्रहण-विसर्जन में सेवन करने में [येन] जिससे [सेवमानस्य] सेवन करने वाले के [छेद:] छेद [न विद्यते] नहीं होता, [तेन] उस उपधियुक्त, [काल क्षेत्रं विज्ञाय] काल क्षेत्र को जानकर, [इह] इस लोक में [श्रमण:] श्रमण [वर्तताम्] भले वर्ते ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ कस्यचित्क्वचित्कदाचित्‌कथंचित्कश्चिदुपधिरप्रतिषिद्धोऽप्यस्तीत्यपवादमुपदिशति -

आत्मद्रव्यस्य द्वितीयपुद्‌गलद्रव्याभावात्सर्व एवोपधि: प्रतिषिद्ध इत्युत्सर्ग: । अयं तु विशिष्टकालक्षेत्रवशात्कश्चिदप्रतिषिद्ध इत्यपवाद: ।

यदा हि श्रमण: सर्वोपधिप्रतिषेधमास्थाय परममुपेक्षासंयमं प्रतिपत्तुकामोऽपि विशिष्ट- कालक्षेत्रवशावसन्नशक्तिर्न प्रतिपत्तुं क्षमते, तदापकृष्य संयमं प्रतिपद्यमानस्तद्‌बहिरङ्गसाधन-मात्रमुपधिमातिष्ठते । स तु तथा स्थीयमानो न खलूपधित्वाच्छेद:, प्रत्युत छेदप्रतिषेध एव ।

य: किलाशुद्धोपयोगाविनाभावी स छेद: । अयं तु श्रामण्यपर्यायसहकारिकारणशरीर-वृत्तिहेतुभूताहारनिर्हारादिग्रहणविसर्जनविषयच्छेदप्रतिषेधार्थमुपादीयमान: सर्वथा शुद्धोपयोगाविनाभूतत्वाच्छेदप्रतिषेध एव स्यात्‌ ॥२२२॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

अब, 'किसी के कहीं, कभी, किसी-प्रकार कोई उपधि अनिषिद्ध भी है' ऐसे अपवाद का उपदेश करते हैं :-

आत्मद्रव्य के द्वितीय पुद्‌गलद्रव्य का अभाव होने से समस्त ही उपधि निषिद्ध है - ऐसा उत्सर्ग (सामान्य नियम) है; और विशिष्ट काल, क्षेत्र के वश कोई उपधि अनिषिद्ध है - ऐसा अपवाद है । जब श्रमण सर्व उपधि के निषेध का आश्रय लेकर परमोपेक्षासंयम को प्राप्त करने का इच्छुक होने पर भी विशिष्ट कालक्षेत्र के वश हीन शक्तिवाला होने से उसे प्राप्त करने में असमर्थ होता है, तब उसमें अपकर्षण करके (अनुत्कृष्ट) संयम प्राप्त करता हुआ उसकी बहिरंग साधनमात्र उपधि का आश्रय करता है । इस प्रकार जिसका आश्रय किया जाता है ऐसी वह उपधि उपधिपने के कारण वास्तव में छेदरूप नहीं है, प्रत्युत छेद की निषेधरूप (त्यागरूप) ही है । जो उपधि अशुद्धोपयोग के बिना नहीं होती वह छेद है । किन्तु यह ( संयम की बाह्यसाधनमात्रभूत उपधि) तो श्रामण्यपर्याय की सहकारी कारणभूत शरीर की वृत्ति के हेतुभूत आहार-नीहारादि के ग्रहण-विसर्जन (ग्रहण-त्याग) संबंधी छेद के निषेधार्थ ग्रहण की जाने से सर्वथा शुद्धोपयोग सहित है, इसलिये छेद के निषेधरूप ही है ॥२२२॥

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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