• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 224.11 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



जो रयणत्तयणासो सो भंगो जिणवरेहिं णिद्दिट्ठो ।

सेसं भंगेण पुणो ण होदि सल्लेहणा अरिहो ॥254॥

अर्थ: 

जो रत्नत्रय का नाश है, उसे जिनेन्द्र भगवान ने भंग कहा है; तथा शेष भंग द्वारा वह सल्लेखना के योग्य नहीं होता है ॥२५४॥

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथनिश्चयनयाभिप्रायं कथयति --

जो रयणत्तयणासो सो भंगो जिणवरेहिं णिद्दिट्ठो यो रत्नत्रयनाशः स भङ्गो जिनवरैर्निर्दिष्टः । विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभावनिजपरमात्मतत्त्वसम्यक्श्रद्धाज्ञानानुष्ठानरूपो योऽसौ निश्चयरत्नत्रयस्वभावस्तस्य विनाशः स एव निश्चयेन नाशो भङ्गो जिनवरैर्निर्दिष्टः । सेसं भंगेण पुणो शेषभङ्गेन पुनःशेषखण्डमुण्डवातवृषणादिभङ्गेन ण होदि सल्लेहणाअरिहो न भवति सल्लेखनार्हः । लोकदुगुञ्छाभयेननिर्ग्रन्थरूपयोग्यो न भवति । कौपीनग्रहणेन तु भावनायोग्यो भवतीत्यभिप्रायः॥२५४॥

एवंस्त्रीनिर्वाणनिराकरणव्याख्यानमुख्यत्वेनैकादशगाथाभिस्तृतीयं स्थलं गतम् ।

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

अब, निश्चयनय का अभिप्राय कहते हैं -

[जो रयणत्तयणासो सो भंगो जिणवरेहिं णिद्दिट्ठो] जो रत्नत्रय का नाश है, वह जिनेन्द्र भगवान द्वारा भंग कहा गया है । विशुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वभावरूप अपने परमात्मतत्त्व की सम्यक् श्रद्धा उसका ही सम्यग्ज्ञान और उसमें ही सम्यक् अनुष्ठान (लीनता आचरण) रूप जो वह निश्चय रत्नत्रयरूप अपना भाव है, उसका नष्ट होना; वही निश्चय से नाश-भंग, जिनेन्द्र भगवान द्वारा कहा गया है । [सेसं भंगेण पुणो] तथा शेष भंग द्वारा- शेष शरीर के किसी अंग के टूट जाने पर, मुण्ड हो जाने पर, वायु रोग हो जाने पर, वृषण (अण्डकोष) आदि के भंग हो जाने पर, [ण होदि सल्लेहणा अरिहो] सल्लेखना के योग्य नहीं होता है- लोक निन्दा के भय से निर्ग्रन्थरूप धारण करने योग्य नहीं है । कौपीन ग्रहण द्वारा उसकी भावना करने योग्य है- ऐसा अभिप्राय है ॥२५४॥

इसप्रकार स्त्री-मुक्ति-निराकरण के व्याख्यान की मुख्यता से ग्यारह गाथाओं द्वारा तीसरा स्थल समाप्त हुआ ।

(अब अपवाद मार्ग के विशेष व्याख्यान परक ग्यारह गाथाओं में निबद्ध अन्तिम चौथा स्थल प्रारम्भ होता है ।)

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:प्रवचनसार_-_गाथा_224.11_-_तात्पर्य-वृत्ति&oldid=134593"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 23 April 2024, at 13:55.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki