• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 224.4 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



संति धुवं पमदाणं मोहपदोसा भयं दुगुंछा य ।

चित्ते चित्ता माया तम्हा तासिं ण णिव्वाणं ॥247॥

अर्थ: 

स्त्रियों के मन में मोह, प्रद्वेष, भय, ग्लानि और विचित्र प्रकार की माया निश्चित होती है; इसलिए उन्हें मोक्ष नहीं है ॥२४७॥

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ तासां मोहादि-बाहुल्यं दर्शयति --

संति धुवं पमदाणं सन्ति विद्यन्ते ध्रुवं निश्चितं प्रमदानां स्त्रीणाम् । के ते । मोहपदोसा भयं दुगुंछाय मोहादिरहितानन्तसुखादिगुणस्वरूपमोक्षकारणप्रतिबन्धकाः मोहप्रद्वेषभयदुगुंछापरिणामाः, चित्ते चित्ता माया कौटिल्यादिरहितपरमबोधादिपरिणतेः प्रतिपक्षभूता चित्ते मनसि चित्रा विचित्रा माया, तम्हा तासिं ण णिव्वाणं तत एव तासामव्याबाधसुखाद्यनन्तगुणाधारभूतं निर्वाणं नास्तीत्यभिप्रायः ॥२४७॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

अब उनके मोहादि की बहुलता को दिखाते हैं -

[संति धुवं पमदाणं] प्रमदाओं-स्त्रियों के ध्रुव-निश्चित हैं । स्त्रियों के वे क्या निश्चित हैं ? [मोह पदोसा भयं दुगुंछा य] मोह आदि से रहित अनन्त सुख आदि गुण स्वरूप मोक्ष के कारणों को रोकनेवाले मोह, प्रद्वेष, भय दुगुंछा-ग्लानिरूप परिणाम स्त्रियों के निश्चित हैं । [चित्ते चित्ता माया] कुटिलता-वक्रता आदि से रहित परमज्ञान-केवलज्ञान आदि रूप परिणति से विपरीत चित्त में- मन में चित्र- अनेक प्रकार की माया होती है, [तम्हा तासिं ण णिव्वाणं] इसलिये उनके, बाधाओं से रहित सुख आदि अनन्त गुणों का आधारभूत मोक्ष नहीं है- ऐसा अभिप्राय है ॥२४७॥

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:प्रवचनसार_-_गाथा_224.4_-_तात्पर्य-वृत्ति&oldid=134596"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 23 April 2024, at 13:55.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki