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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 230 - तत्त्व-प्रदीपिका

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बालो वा वुड्‌ढो वा समभिहदो वा पुणो गिलाणो वा । (230)

चरियं चरदु सजोग्गं मूलच्छेदो जधा ण हवदि ॥264॥

अर्थ: 

[बाल: वा] बाल, [वृद्ध: वा] वृद्ध [श्रमाभिहत: वा] श्रांत [पुन: ग्लानः वा] या ग्लान श्रमण [मूलच्छेद:] मूल का छेद [यथा न भवति] जैसा न हो उस प्रकार से [स्वयोग्यां] अपने योग्य [चर्यां चरतु] आचरण आचरो ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथोत्सर्गापवादमैत्रीसौस्थित्यमाचरणस्योपदिशति -

संयतस्य स्वस्य योग्यमतिकर्कशमेवाचरणमाचरणीयमित्युत्सर्ग: । बालवृद्धश्रान्तग्लानेन शरीरस्य शुद्धात्मतत्त्वसाधनभूतसंयमसाधनत्वेन मूलभूतस्य छेदो न यथा स्यात्तथा बालवृद्धश्रान्तग्लान-स्य स्वस्य योग्यं मृद्वेवाचरणमाचरणीयमित्यपवाद: ।

बालवृद्धश्रान्तग्लानेन संयमस्य शुद्धात्मतत्त्वसाधनत्वेन मूलभूतस्य छेदो न यथा स्यात्तथा संयतस्य स्वस्य योग्यमतिकर्कशमाचरणमाचरता शरीरस्य शुद्धात्मतत्त्वसाधनभूतसंयमसाधनत्वेन मूलभूतस्य छेदो न यथा स्यात्‌ तथा बालवृद्धश्रान्तग्लानस्य स्वस्य योग्यं मृद्वप्याचरणमाचरणीय-मित्यपवादसापेक्ष उत्सर्ग: ।

बालवृद्धश्रान्तग्लानेन शरीरस्य शुद्धात्मतत्त्वसाधनभूतसंयमसाधनत्वेन मूलभूतस्य छेदो न यथा स्यात्तथा बालवृद्धश्रान्तग्लानस्य स्वस्य योग्यं मृदाचरणमाचरता संयमस्य शुद्धात्म-तत्त्वसाधनत्वेन मूलभूतस्य छेदो न यथा स्यात्तथा संयतस्य स्वस्य योग्यमतिकर्कशमप्याचरण-माचरणीयमित्युत्सर्गसापेक्षोऽपवाद: ।

अत: सर्वथोत्सर्गापवादमैत्र्या सौस्थित्यमाचरणस्य विधेयम्‌ ॥२३०॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

अब उत्सर्ग और अपवाद की मैत्री द्वारा आचरण के सुस्थितपने का उपदेश करते है :-

बाल, वृद्ध श्रमित या ग्‍लान (श्रमण) को भी संयम का जो कि शुद्धात्मतत्त्व का साधन होने से मूलभूत है उसका—छेद जैसे न हो उस प्रकार, संयत ऐसे अपने योग्य अति कर्कश (कठोर) आचरण ही आचरना; इस प्रकार उत्सर्ग है ।

बाल, वृद्ध, श्रमित या ग्‍लान (श्रमण) को भी शरीर का—जो कि शुद्धात्मतत्त्व के साधनभूत संयम का साधन होने से मूलभूत है उसका—छेद जैसे न हो उस प्रकार, बाल-वृद्ध-श्रांत-ग्लान को अपने योग्य मृदु आचरण ही आचरना; इस प्रकार अपवाद है ।

बाल-वृद्ध-श्रांत-ग्लान के, संयम का—जो कि शुद्धात्मतत्त्व का साधन होने से मूलभूत है उसका—छेद जैसे न हो उस प्रकार का संयत ऐसा अपने योग्य अति कठोर आचरण आचरते हुए, (उसके) शरीर का—जो कि शुद्धात्मतत्त्व के साधनभूत संयम का साधन होने से मूलभूत है उसका (भी) छेद जैसे न हो उस प्रकार बाल-वृद्ध-श्रांत-ग्लान ऐसे अपने योग्य मृदु आचरण भी आचरना । इस प्रकार अपवादसापेक्ष उत्सर्ग है ।

बाल-वृद्ध-श्रांत-ग्लान को शरीर का—जो कि शुद्धात्मतत्त्व के साधनभूत संयम का साधन होने से मूलभूत है उसका—छेद जैसे न हो उस प्रकार से बाल-वृद्ध-श्रांत-ग्लान ऐसे अपने योग्य मृदु आचरण आचरते हुए, (उसके) संयम का—जो कि शुद्धात्मतत्व का साधन होने से मूलभूत है उसका (भी)—छेद जैसे न हो उस प्रकार से संयत ऐसा अपने योग्य अतिकर्कश आचरण भी आचरना; इस प्रकार उत्सर्गसापेक्ष अपवाद है ।

इससे (यह कहा है कि) सर्वथा उत्सर्ग और अपवाद की मैत्री द्वारा आचरण का सुस्थितपना करना चाहिये ॥२३०॥

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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