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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 233 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



आगमहीणो समणो णेवप्पाणं परं वियाणादि । (233)

अविजाणंतो अत्थे खवेदि कम्माणि किध भिक्खू ॥267॥

अर्थ: 

[आगमहीन:] आगमहीन [श्रमण:] श्रमण [आत्मानं] आत्मा को (निज को) और [परं] पर को [न एव विजानाति] नहीं जानता; [अर्थात् अविजानन्] पदार्थों को नहीं जानता हुआ [भिक्षु:] भिक्षु [कर्माणि] कर्मों को [कथं] किस प्रकार [क्षपयति] क्षय करे?

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथागमपरिज्ञानहीनस्य कर्मक्षपणं न भवतीति प्ररूपयति --

आगमहीणो समणो णेवप्पाणं परं वियाणादि आगमहीनः श्रमणो नैवात्मानं परं वा विजानाति; अविजाणंतो अत्थे अविजानन्नर्थान्परमात्मादिपदार्थान् खवेदि कम्माणि किध भिक्खू क्षपयति कर्माणि कथं भिक्षुः, न कथमपिइति । इतो विस्तरः -- ((गुणजीवा पज्जत्ती पाणा सण्णा य मग्गणाओ य ।

उवओगोवि य कमसो वीसंतु परूवणा भणिदा ॥))

इति गाथाकथिताद्यागममजानन्, तथैव ((भिण्णउ जेण ण जाणियउ णियदेहहंपरमत्थु ।

सो अंधउ अवरहं अंधयहं कि म दरिसावइ पंथु ॥))

इति दोहकसूत्रकथिताद्यागमपदसारभूतम-ध्यात्मशास्त्रं चाजानन् पुरुषो रागादिदोषरहिताव्याबाधसुखादिगुणस्वरूपनिजात्मद्रव्यस्य भावकर्म-शब्दाभिधेयै रागादिनानाविकल्पजालैर्निश्चयेन कर्मभिः सह भेदं न जानाति, तथैव कर्मारिविध्वंसक-स्वकीयपरमात्मतत्त्वस्य ज्ञानावरणादिद्रव्यकर्मभिरपि सह पृथक्त्वं न वेत्ति, तथाचाशरीरलक्षणशुद्धात्म-पदार्थस्य शरीरादिनोकर्मभिः सहान्यत्वं न जानाति । इत्थंभूतभेदज्ञानाभावाद्देहस्थमपि निजशुद्धात्मानं नरोचते, समस्तरागादिपरिहारेण न च भावयति । ततश्च कथं कर्मक्षयो भवति, न कथमपीति । ततःकारणान्मोक्षार्थिना परमागमाभ्यास एव कर्तव्य इति तात्पर्यार्थः ॥२६७॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

अब आगम के परिज्ञान से हीन के कर्मों का क्षय नहीं होता है, ऐसा प्ररूपित करते हैं --

[आगमहीणो समणो णेवप्पाणं परं वियाणादि] आगमहीन श्रमण स्वयं को तथा पर को ही नहीं जानता है, [अविजाणंतो अट्ठे] अर्थों--परमात्मा आदि पदार्थों को नहीं जानता हुआ [खवेदि कम्माणि किध भिक्खु] भिक्षु कर्मों का क्षय कैसे कर सकता है? किसी भी प्रकार नहीं कर सकता है ।

यहाँ इसका विस्तार करते हैं -- 'गुणस्थान, जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा, चौदह मार्गणायें और उपयोग, ये क्रम से बीस प्ररूपणायें कही गई हैं ।'

इसप्रकार गाथा में कहे गये -- इत्यादि आगम को नहीं जानता हुआ और उसीप्रकार --

'जिसके द्वारा अपने शरीर से भिन्न अपना परमार्थ-परम-पदार्थ--भगवान आत्मा नहीं जाना गया है, वह अंधा दूसरे अंधों को क्या मार्ग दिखायेगा ।'

इस प्रकार दोहक गाथा में कहे गये, आगमपद के सारभूत अध्यात्म-शास्त्र को नहीं जानता हुआ पुरुष रागादि दोष रहित अव्याबाध सुखादि गुणस्वरूप अपने आत्मद्रव्य का, 'भावकर्म' शब्द द्वारा कहे जानेवाले रागादि अनेक विकल्प-जाल-रूप कर्मों के साथ, निश्चय से भेद नहीं जानता है; उसीप्रकार कर्म-शत्रु को नष्ट करने वाले अपने परमात्म-तत्त्व का ज्ञानावरणादि द्रव्य-कर्मों के साथ भी पृथक्त्व नहीं जानता है और उसी प्रकार शरीर रहित लक्षण शुद्धात्म-पदार्थ का, शरीर आदि नोकर्मों के साथ अन्यत्व नहीं जानता है । इस प्रकार भेद-ज्ञान का अभाव होने से शरीर में ही स्थित अपने शुद्धात्मा की रुचि-श्रद्धा नहीं करता है और सम्पूर्ण रागादि के त्याग-रूप से, उसकी भावना नहीं करता है; इसलिये उसके कर्मों का क्षय कैसे हो सकता है? किसी भी प्रकार नहीं हो सकता है । इस कारण मोक्षार्थियों को, परमागम का अभ्यास करना चाहिये -- ऐसा तात्पर्यार्थ है ॥२६७॥

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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