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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 238 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



जं अण्णाणी कम्मं खवेदि भवसयसहस्सकोडीहिं । (238)

तं णाणी तिहिं गुत्तो खवेदि उस्सासमेत्तेण ॥272॥

अर्थ: 

[यत् कर्म] जो कर्म [अज्ञानी] अज्ञानी [भवशतसहस्रकोटिभि:] लक्षकोटि भवों में [क्षपयति] खपाता है, [तत्] वह कर्म [ज्ञानी] ज्ञानी [त्रिभि: गुप्त:] तीन प्रकार (मन-वचन-काय) से गुप्त होने से [उच्छ्‌वासमात्रेण] उच्छ्‌वासमात्र में [क्षपयति] खपा देता है ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथपरमागमज्ञानतत्त्वार्थश्रद्धानसंयतत्वानां भेदरत्नत्रयरूपाणां मेलापकेऽपि, यदभेदरत्नत्रयात्मकं निर्विकल्प-समाधिलक्षणमात्मज्ञानं, निश्चयेन तदेव मुक्तिकारणमिति प्रतिपादयति --

जं अण्णाणी कम्मं खवेदि निर्विकल्पसमाधिरूपनिश्चयरत्नत्रयात्मकविशिष्टभेदज्ञानाभावादज्ञानी जीवो यत्कर्म क्षपयति । काभिः करणभूताभिः । भवसयसहस्सकोडीहिं भवशतसहस्रकोटिभिः । तं णाणी तिहिं गुत्तो तत्कर्म ज्ञानी जीवस्त्रि-गुप्तिगुप्तः सन् खवेदि उस्सासमेत्तेण क्षपयत्युच्छ्वासमात्रेणेति । तद्यथा --

बहिर्विषये परमागमाभ्यासबलेनयत्सम्यक्परिज्ञानं तथैव श्रद्धानं व्रताद्यनुष्ठानं चेति त्रयं, तत्त्रयाधारेणोत्पन्नं सिद्धजीवविषये सम्यक्-परिज्ञानं श्रद्धानं तद्गुणस्मरणानुकूलमनुष्ठानं चेति त्रयं, तत्त्रयाधारेणोत्पन्नं विशदाखण्डैकज्ञानाकारे स्वशुद्धात्मनि परिच्छित्तिरूपं सविकल्पज्ञानं स्वशुद्धात्मोपादेयभूतरुचिविकल्परूपं सम्यग्दर्शनं तत्रैवात्मनि रागादिविकल्पनिवृत्तिरूपं सविकल्पचारित्रमिति त्रयम् । तत्त्रयप्रसादेनोत्पन्नं यन्निर्विकल्पसमाधिरूपंनिश्चयरत्नत्रयलक्षणं विशिष्टस्वसंवेदनज्ञानं तदभावादज्ञानी जीवो बहुभवकोटिभिर्यत्कर्म क्षपयति, तत्कर्म ज्ञानी जीवः पूर्वोक्तज्ञानगुणसद्भावात् त्रिगुप्तिगुप्तः सन्नुच्छ्वासमात्रेण लीलयैव क्षपयतीति ।ततो ज्ञायते परमागमज्ञानतत्त्वार्थश्रद्धानसंयतत्वानां भेदरत्नत्रयरूपाणां सद्भावेऽप्यभेदरत्नत्रयरूपस्य स्व-संवेदनज्ञानस्यैव प्रधानत्वमिति ॥२७२॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

अब परमागमज्ञान-तत्त्वार्थश्रद्धान-संयतस्वरूप भेद-रत्नत्रय का युगपतपना होने पर भी, जो अभेद-रत्नत्रय स्वरूप विकल्प-रहित समाधि--स्वरूप-लीनता लक्षण आत्मज्ञान वही निश्चय से मुक्ति का कारण है; ऐसा प्रतिपादन करते हैं --

[जं अण्णाणी कम्मं खवेदि] विकल्प रहित समाधि रूप निश्चय रत्नत्रय स्वरूप विशिष्ट भेद-ज्ञान का अभाव होने से, अज्ञानी जीव जो कर्म नष्ट करता है । किन साधनों द्वारा वह कर्म नष्ट करता है? [भवसयसहस्सकोडीहिं] लाख करोड़ भवों द्वारा, वह जो कर्म नष्ट करता है । [तं णाणी तिहिं गुत्तो] वे कर्म ज्ञानी-जीव, तीन गुप्तियों से गुप्त होता हुआ [खवेदि उस्सासमेत्तेण] उच्छवास मात्र से नष्ट कर देता है ।

वह इसप्रकार- बाह्य विषय में परमागम के अभ्यास के बल से

  • सम्यक् परिज्ञान,
  • उसीप्रकार श्रद्धान और
  • व्रतादि अनुष्ठान
- इसप्रकार तीन; उन तीन के आधार से उत्पन्न सिद्धजीव के विषय में सम्यक् परिज्ञान श्रद्धान और उनके गुणों के स्मरण के अनुकूल अनुष्ठान--इसप्रकार तीन; उन तीन के आधार से उत्पन्न स्पष्ट, निर्मल, अखण्ड, एक, ज्ञानाकार-रूप
  • अपने शुद्धात्मा में जानकारी-रूप, सविकल्प ज्ञान,
  • अपने शुद्धात्मा की उपादेयभूत रुचि के विकल्परूप सम्यग्दर्शन,
  • उसी आत्मा में रागादि विकल्पों की निवृत्तिरूप सविकल्प चारित्र--
इसप्रकार तीन । उन तीन के प्रसाद से उत्पन्न, जो विकल्प रहित समाधिरूप निश्चय रत्नत्रय लक्षण विशिष्ट स्व-संवेदन ज्ञान है, उसका अभाव होने से अज्ञानी जीव अनेक करोड़ भवों में, जो कर्म क्षय करता है; वे कर्म ज्ञानी जीव पहले (ऊपर) कहे गये ज्ञान-गुण के सद्भाव में तीन गुप्ति-रूप से गुप्त होता हुआ उच्छ्वास मात्र में -- लीला से ही -- अत्यन्त सहज-रूप में ही नष्ट कर देता है । इससे ज्ञात होता है कि परमागम-ज्ञान, तत्त्वार्थ-श्रद्धान, संयतत्वरूप भेद रत्नत्रय का सद्भाव होने पर भी, अभेद रत्नत्रयरूप स्वसंवेदनज्ञान की ही प्रधानता है ॥२७२॥

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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