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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 239 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



परमाणुपमाणं वा मुच्छा देहादिएसु जस्स पुणो । (239)

विज्जदि जदि सो सिद्धिं ण लहदि सव्वागमधरो वि ॥273॥

अर्थ: 

[पुन:] और [यदि] यदि [यस्य] जिसके [देहादिकेषु] शरीरादि के प्रति [परमाणुप्रमाणं वा] परमाणुमात्र भी [मूर्च्छा] मूर्च्छा [विद्यते] वर्तती हो तो [सः] वह [सर्वागमधर: अपि] भले ही सर्वागम का धारी हो तथापि [सिद्धिं न लभते] सिद्धि को प्राप्त नहीं होता ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथात्मज्ञानशून्यस्य सर्वागमज्ञानतत्त्वार्थश्रद्धानसंयतत्वानां यौगपद्यमप्यकिंचित्करमित्यनुशास्ति -

यदि करतलामलकीकृतसकलागमसारतया भूतभवद्भावि च स्वोचितपर्यायविशिष्टम-शेषद्रव्यजातं जानन्तमात्मानं जानन्‌ श्रद्दधान: संयमयंश्चागमज्ञानतत्त्वार्थश्रद्धानसंयतत्वानां यौगपद्येऽपि मनाङ्‌मोहमलोपलिप्तत्वात्‌ यदा शरीरादिमूर्च्छोपरक्ततया निरुपरागोपयोगपरिणतं कृत्वा ज्ञानात्मानमात्मानं नानुभवति तदा तावन्मात्रमोहमलकलङ्ककीलिकाकीलितै: कर्मभि-रविमुच्यमानो न सिद्धय्यति ।

अत आत्मज्ञानशून्यमागमज्ञानतत्त्वार्थश्रद्धानसंयतत्वयौगपद्यमप्यकिंचित्करमेव ॥२३९॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

अब, ऐसा उपदेश करते हैं कि - आत्मज्ञानशून्य के सर्व आगमज्ञान, तत्त्वार्थश्रद्धान तथासंयतत्त्वका युगपत्पना भी अकिंचित्कर है, (अर्थात् कुछ भी नहीं कर सकता) :-

सकल आगम के सार को हस्तामलकवत् करने से (हथेली में रक्खे हुए आंवले के समान स्पष्ट ज्ञान होने से) जो पुरुष भूत-वर्तमान-भावी स्वोचित (अपने-अपने योग्य) पर्यायों के साथ अशेष द्रव्य-समूह को जानने-वाले आत्मा को जानता है, श्रद्धान करता है और संयमित रखता है, उस पुरुष के आगमज्ञान-तत्त्वार्थश्रद्धान-संयतत्त्व का युगपत्पना होने पर भी, यदि वह किंचित्‌मात्र भी मोहमल से लिप्त होने से शरीरादि के प्रति (तत्संबंधी) मूर्च्छा से उपरक्त रहने से, निरुपराग उपयोग में परिणत करके ज्ञानात्मक आत्मा का अनुभव नहीं करता, तो वह पुरुष मात्र उतने (कुछ) मोह-मल-कलंक-रूप कीले के साथ बँधे हुए कर्मों से न छूटता हुआ सिद्ध नहीं होता ।

इसलिये आत्मज्ञानशून्य आगमज्ञान-तत्त्वार्थश्रद्धान-संयतत्त्व का युगपत्पना भी अकिंचित्कर ही है ॥२३९॥

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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