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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 250 - तात्पर्य-वृत्ति

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जदि कुणदि कायखेदं वेज्जावच्चत्थमुज्जदो समणो । (250) ।

ण हवदि हवदि अगारी धम्मो सो सावयाणं से ॥289॥

अर्थ: 

[यदि] यदि (श्रमण) [वैयावृत्यर्थम् उद्यत:] वैयावृत्ति के लिये उद्यमी वर्तता हुआ [कायखेदं] छह काय को पीड़ित [करोति] करता है तो वह [श्रमण: न भवति] श्रमण नहीं है, [अगारी भवति] गृहस्थ है; (क्योंकि) [सः] वह (छह काय की विराधना सहित वैयावृत्ति) [श्रावकाणां धर्म: स्यात्] श्रावकों का धर्म है ।

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ वैयावृत्त्यकालेऽपि स्वकीयसंयमविराधना न कर्तव्येत्युपदिशति --

जदि कुणदि कायखेदं वेज्जावच्चत्थमुज्जदो यदि चेत् करोति कायखेदं षटकायविराधनाम् । कथंभूतः सन् । वैयावृत्त्यार्थमुद्यतः । समणो ण हवदि तदा श्रमणस्तपोधनो न भवति । तर्हि किं भवति । हवदि अगारी अगारी गृहस्थो भवति । कस्मात् । धम्मो सो सावयाणं से षटकायविराधनां कृत्वा योऽसौ धर्मः सश्रावकाणां स्यात्, न च तपोधनानामिति । इदमत्र तात्पर्यम् – योऽसौ स्वशरीरपोषणार्थं शिष्यादिमोहेनवा सावद्यं नेच्छति तस्येदं व्याख्यानं शोभते, यदि पुनरन्यत्र सावद्यमिच्छति वैयावृत्त्यादिस्वकीयाव-स्थायोग्ये धर्मकार्ये नेच्छति तदा तस्य सम्यक्त्वमेव नास्तीति ॥२८९॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[जदि कुणदि कायखेदं वेज्जावच्चत्थमुज्जदो] यदि कायखेद अर्थात्‌ छह काय जीवों की विराधना करता है । कैसा होता हुआ ऐसा करता है? वैयावृत्ति के लिये प्रयत्नशील होता हुआ ऐसा करता है । [समणो ण हवदि] तब वह मुनि नहीं है । मुनि नहीं तो क्या है ? [हवदि अगारी] वह अगारी अर्थात् ( गहस्थ) है । वह गृहस्थ क्यों है? [धम्मो सो सावयाणं से] छहकाय जीवों की विराधना कर वैयावृत्ति करने वाला जो वह धर्म है, वह श्रावकों का है, मुनियों का नहीं, अत: वह गृहस्थ है, मुनि नहीं है ।

यहाँ तात्पर्य यह है- जो वह अपने शरीर के पोषण के लिये अथवा शिष्य आदि के मोह से सावद्य (पाप) नहीं चाहता है, उसके लिये वह (काय विराधना कर वैयावृत्ति न करने सम्बन्धी) व्याख्यान शोभा देता है- उचित है, परन्तु यदि दूसरे कार्यों मे सावद्य करता है और वैयावृत्ति आदि अपनी अवस्था के योग्य धर्मकार्य में सावद्य नहीं चाहता है, तो उसके सम्यक्त्व ही नही है ॥२८९॥

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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