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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 275 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



बुज्झदि सासणमेयं सागारणगारचरियया जुत्तो । (275)

जो सो पवयणसारं लहुणा कालेण पप्पोदि ॥311॥

अर्थ: 

[यः] जो [साकारानाकारचर्यया युक्त:] साकार-अनाकार चर्या से युक्त वर्तता हुआ (एतत् शासनं) इस उपदेश को [बुध्यते] जानता है, [सः] वह [लघुना कालेन] अल्प काल में ही [प्रवचनसारं] प्रवचन के सार को (भगवान आत्मा को) [प्राप्‍नोति] पाता है ।

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ शिष्यजनं शास्त्रफलेन योजयन् शास्त्रं समापयति -

यो हि नाम सुविशुद्धज्ञानदर्शनमात्रस्वरूपव्यवस्थितवृत्तिसमाहितत्वात् साकारा-नाकारचर्यया युक्तः सन् शिष्यवर्गः स्वयं समस्तशास्त्रार्थविस्तरसंक्षेपात्मकश्रुतज्ञानोपयोग-पूर्वकानुभावेन केवलमात्मानमनुभवन्शासनमेतद् बुध्यते स खलु निरवधित्रिसमय-प्रवाहावस्थायित्वेन सकलार्थसार्थात्मकस्य प्रवचनस्य सारभूतं भूतार्थस्वसंवेद्यदिव्यज्ञानानन्द-स्वभावमननुभूतपूर्वं भगवन्तमात्मानमवाप्नोति ॥२७५॥

इति तत्त्वदीपिकायां श्रीमदमृतचन्द्रसूरिविरचितायां प्रवचनसारवृत्तौ चरणानुयोगसूचिकाचूलिका नाम तृतीयः श्रुतस्कन्धः समाप्तः ॥३॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

अब (भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेव) शिष्यजन को शास्त्र के फल के साथ जोड़ते हुए शास्त्र समाप्त करते हैं :-

सुविशुद्धज्ञानदर्शनमात्र स्वरूप में अवस्थित परिणति में लगा होने से साकार-अनाकार चर्या से युक्त वर्तता हुआ, जो शिष्यवर्ग स्वयं समस्त शास्त्रों के अर्थों के विस्तारसंक्षेपात्मक श्रुतज्ञानोपयोगपूर्वक प्रभाव द्वारा केवल आत्मा को अनुभवता हुआ, इस उपदेश को जानता है, वह वास्तवमें, भूतार्थस्वसंवेद्य-दिव्य ज्ञानानन्द जिसका स्वभाव है, पूर्वकाल में कभी जिसका अनुभव नहीं किया, ऐसे भगवान आत्मा को प्राप्त करता है-जो कि (जो आत्मा) तीनों काल के निरवधि प्रवाह में स्थायी होने से सकल पदार्थों के समूहात्मक प्रवचन का सारभूत है ॥२७५॥

इस प्रकार (श्रीमद् भगवत्कृन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत) श्री प्रवचनसार शास्त्र की श्रीमद्अमृतचन्द्राचार्यदेव विरचित तत्त्वदीपिका नामक टीका में चरणानुयोगसूचक चूलि‍का नाम का तृतीय श्रुतस्कंध समाप्त हुआ ।

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

तत्त्व-प्रदीपिका अनुक्रमणिका

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