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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 28 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



णाणी णाणसहावो अट्ठा णेयप्पगा हि णाणिस्स । (28)

रूवाणि व चक्खूणं णेवण्णोण्णेसु वट्टंति ॥29॥

अर्थ: 

[ज्ञानी] आत्मा [ज्ञानस्वभाव:] ज्ञान स्वभाव है [अर्था: हि] और पदार्थ [ज्ञानिनः] आत्मा के [ज्ञेयात्मका:] ज्ञेय स्वरूप हैं [रूपाणि इव चक्षुषो:] जैसे कि रूप (रूपी पदार्थ) नेत्रों का ज्ञेय है वैसे [अन्योन्येषु] वे एक-दूसरे में [न एव वर्तन्ते] नहीं वर्तते ॥२८॥

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ ज्ञानज्ञेययो: परस्परगमनं प्रतिहन्ति -

ज्ञानी चार्थाश्च स्वलक्षणभूतपृथक्त्वतो न मिथो वृत्तिमासादयन्ति, किंतु तेषां ज्ञानज्ञेयस्व-भावसम्बन्धसाधितमन्योन्यवृत्तिमात्रमस्ति चक्षुरूपवत्‌ । यथा हि चक्षूंषि तद्विषयभूतरूपि द्रव्याणि च परस्परप्रवेशमन्तरेणापि ज्ञेयाकारग्रहणसमर्पणप्रवणान्येवमात्माऽर्थाश्चान्योन्य वृत्तिमन्तरेणापि विश्वज्ञेयाकारग्रहणसमर्पणप्रवणा: ॥२८॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

अब, ज्ञान और ज्ञेय के परस्पर गमन का निषेध करते हैं (अर्थात् ज्ञान और ज्ञेय एक-दूसरे में प्रवेश नहीं करते ऐसा कहते हैं ।) :-

आत्मा और पदार्थ स्वलक्षण-भूत पृथक्त्व के कारण एक दूसरे में नहीं वर्तते परन्तु उनके मात्र नेत्र और रूपी पदार्थ की भाँति ज्ञान-ज्ञेय स्वभाव-सम्बन्ध से होने वाली एक दूसरे में प्रवृत्ति पाई जाती है । (प्रत्येक द्रव्य का लक्षण अन्य द्रव्यों से भिन्नत्व होने से आत्मा और पदार्थ एक दूसरे में नहीं वर्तते, किन्तु आत्मा का ज्ञान स्वभाव है और पदार्थों का ज्ञेय स्वभाव है, ऐसे ज्ञान-ज्ञेयभावरूप सम्बन्ध के कारण ही मात्र उनका एक दूसरे में होना नेत्र और रूपी पदार्थों की भाँति उपचार से कहा जा सकता है) । जैसे नेत्र और उनके विषय-भूत रूपी पदार्थ परस्पर प्रवेश किये बिना ही ज्ञेयाकारों को ग्रहण और समर्पण करने के स्वभाव-वाले हैं, उसी प्रकार आत्मा और पदार्थ एक दूसरे में प्रविष्ट हुए बिना ही समस्त ज्ञेयाकारों के ग्रहण और समर्पण करने के स्वभाव-वाले हैं । (जिस प्रकार आँख रूपी पदार्थों में प्रवेश नहीं करती और रूपी पदार्थ आँख में प्रवेश नहीं करते तो भी आँख रूपी पदार्थों के ज्ञेयाकारो के ग्रहण करने-जानने के स्वभाव-वाली है और रूपी पदार्थ स्वयं के ज्ञेयाकारों को समर्पित होने-जनाने के स्वभाववाले हैं, उसीप्रकार आत्मा पदार्थों में प्रवेश नहीं करता और पदार्थ आत्मा में प्रवेश नहीं करते तथापि आत्मा पदार्थों के समस्त ज्ञेयाकारों को ग्रहण कर लेने, जान लेने के स्वभाव-वाला है और पदार्थ स्वयं के समस्त ज्ञेयाकारों को समर्पित हो जाने-ज्ञात हो जाने के स्वभाव-वाले हैं ।)

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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