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ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 29 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



ण पविट्ठो णाविट्ठो णाणी णेयेसु रूवमिव चक्खू । (29)

जाणदि पस्सदि णियदं अक्खातीदो जगमसेसं ॥30॥

अर्थ: 

[चक्षु: रूपं इव] जैसे चक्षु रूप को (ज्ञेयों में अप्रविष्ट रहकर तथा अप्रविष्ट न रहकर जानती-देखती है) उसी प्रकार [ज्ञानी] आत्मा [अक्षातीतः] इन्द्रियातीत होता हुआ [अशेषं जगत्] अशेष जगत को (समस्त लोकालोक को) [ज्ञेयेषु] ज्ञेयों में [न प्रविष्ट:] अप्रविष्ट रहकर [न अविष्ट:] तथा अप्रविष्ट न रहकर [नियतं] निरन्तर [जानाति पश्यति] जानता-देखता है ॥२१॥

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ ज्ञानी ज्ञेयपदार्थेषु निश्चयनयेनाप्रविष्टोऽपि व्यवहारेणप्रविष्ट इव प्रतिभातीति शक्तिवैचित्र्यं दर्शयति ---

ण पविट्ठो निश्चयनयेन न प्रविष्टः, णाविट्ठो व्यवहारेणच नाप्रविष्टः किंतु प्रविष्ट एव । स कः कर्ता । णाणी ज्ञानी । केषु मध्ये । णेयेसु ज्ञेयपदार्थेषु । किमिव । रूवमिव चक्खू रूपविषये चक्षुरिव । एवंभूतस्सन् किं करोति । जाणदि पस्सदि जानाति पश्यति च । णियदं निश्चितं संशयरहितं । किंविशिष्टः सन् । अक्खातीदो अक्षातीतः । किं जानाति पश्यति । जगमसेसं जगदशेषमिति । तथा हि ---

यथा लोचनं कर्तृ रूपिद्रव्याणि यद्यपि निश्चयेन न स्पृशति तथापि व्यवहारेणस्पृशतीति प्रतिभाति लोके । तथायमात्मा मिथ्यात्वरागाद्यास्रवाणामात्मनश्च संबन्धि यत्केवलज्ञानात्पूर्वंविशिष्टभेदज्ञानं तेनोत्पन्नं यत्केवलज्ञानदर्शनद्वयं तेन जगत्त्रयकालत्रयवर्तिपदार्थान्निश्चयेनास्पृशन्नपि व्यवहारेण स्पृशति, तथा स्पृशन्निव ज्ञानेन जानाति दर्शनेन पश्यति च । कथंभूतस्सन् । अतीन्द्रियसुखास्वादपरिणतः सन्नक्षातीत इति । ततो ज्ञायते निश्चयेनाप्रवेश इव व्यवहारेण ज्ञेयपदार्थेषु प्रवेशोऽपि घटत इति ॥२९॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[ण पविट्ठो] - निश्चयनय से प्रविष्ट नहीं है । [णाविट्ठो] - व्यवहार से अप्रविष्ट नहीं, वरन् प्रविष्ट ही है । प्रविष्ट-अप्रविष्ट नहीं होने वाला कर्तारूप वह कौन है? [णाणी] - ज्ञानीरूप कर्ता प्रविष्ट और अप्रविष्ट नहीं है । ज्ञानी प्रविष्ट- अप्रविष्ट किनमें नहीं है? [णेयेसु] - वह ज्ञेय पदार्थो में प्रविष्ट-अप्रविष्ट नहीं है । ज्ञानी किसके समान उनमें प्रविष्ट-अप्रविष्ट नहीं है? [रूवमिवचक्खू] - रूप के सम्बन्ध में नेत्र के समान ज्ञानी उनमें प्रविष्ट-अप्रविष्ट नहीं है । ऐसा होता हुआ ज्ञानी क्या करता है? [जाणदि पस्सदि] - उन्हें जानता और देखता है । [णियदं] - वह उन्हें संशयरहित जानता-देखता है । वह जानने-देखने वाला ज्ञानी किस विशेषता वाला है? वह [अक्खातीदो] - अक्षातीत-इन्द्रिय रहित है । वह किसे जानता-देखता है? [जगमसेसं] - वह समूर्ण जगत् को जानता-देखता है ।

वह इसप्रकार - जैसे नेत्ररुपी कर्ता यद्यपि निश्चय से रूपी द्रव्यों को स्पर्श नहीं करता, तथापि व्यवहार से लोक में स्पर्श करते हुए के समान ज्ञात होता है; उसीप्रकार यह आत्मा केवलज्ञान से पूर्व मिथ्यात्व-रागादि आस्रव और आत्मा के बीच में होने वाले विशिष्ट भेदज्ञान से उत्पन्न होनेवाले केवलज्ञान और केवलदर्शन से तीनलोक और तीनकालवर्ती पदार्थों को निश्चय से स्पर्श नहीं करता हुआ भी व्यवहार से स्पर्श करता है; तथा स्पर्श करते हुए के समान ज्ञान से जानता और दर्शन से देखता है । वह आत्मा कैसा होता हुआ जानता और देखता है ? अतीन्द्रिय सुखरूप आस्वाद से परिणत (स्वाद का आस्वादी) होता हुआ अक्षातीत होता हुआ उन सबको जानता और देखता है ।

इससे ज्ञात होता है कि निश्चय से अप्रवेश के समान ज्ञेय पदार्थों में व्यवहार से प्रवेश भी घटित होता है ।

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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