• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • ग्रन्थ
  • Discussion
  • View source
  • View history

ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 41 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



अपदेसं सपदेसं मुत्तममुत्तं च पज्जयमजादं । (41)

पलयं गदं च जाणदि तं णाणमदिंदियं भणियं ॥42॥

अर्थ: 

[अप्रदेशं] जो ज्ञान अप्रदेश को, [सप्रदेशं] सप्रदेश को, [मूर्तं] मूर्त को, [अमूर्त: च] और अमूर्त को तथा [अजातं] अनुत्पन्न [च] और [प्रलयंगतं] नष्ट [पर्यायं] पर्याय को [जानाति] जानता है, [तत् ज्ञानं] वह ज्ञान [अतीन्द्रियं] अतीन्द्रिय [भणितम्‌] कहा गया है ॥४१॥

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथातीन्द्रियज्ञानमतीतानागतसूक्ष्मादिपदार्थान् जानातीत्युपदिशति -

-अपदेसं अप्रदेशं कालाणुपरमाण्वादिसपदेसं शुद्धजीवास्तिकायादिपञ्चास्तिकायस्वरूपं मुत्तं मूर्तं पुद्गलद्रव्यं अमुत्तं च अमूर्तं चशुद्धजीवद्रव्यादि पज्जयमजादं पलयं गदं च पर्यायमजातं भाविनं प्रलयं गतं चातीतमेतत्सर्वं पूर्वोक्तं ज्ञेयंवस्तु जाणदि जानाति यद्ज्ञानं कर्तृ तं णाणमदिंदियं भणियं तद्ज्ञानमतीन्द्रियं भणितं, तेनैव सर्वज्ञोभवति । तत एव च पूर्वगाथोदितमिन्द्रियज्ञानं मानसज्ञानं च त्यक्त्वा ये निर्विकल्पसमाधि-रूपस्वसंवेदनज्ञाने समस्तविभावपरिणामत्यागेन रतिं कुर्वन्ति त एव परमाह्लादैकलक्षणसुखस्वभावं सर्वज्ञपदं लभन्ते इत्यभिप्रायः ॥४१॥

एवमतीतानागतपर्याया वर्तमानज्ञाने प्रत्यक्षा न भवन्तीति बौद्धमतनिराकरणमुख्यत्वेन गाथात्रयं, तदनन्तरमिन्द्रियज्ञानेन सर्वज्ञो न भवत्यतीन्द्रियज्ञानेन भवतीति नैयायिकमतानुसारिशिष्यसंबोधनार्थं च गाथाद्वयमिति समुदायेन पञ्चमस्थले गाथापञ्चकं गतम् ॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

[अपदेसं] अप्रदेशी--कालाणु, परमाणु आदि (एक प्रदेशी द्रव्य), [सपदेसं] शुद्ध जीवास्तिकाय आदि पाँच अस्तिकाय स्वरूप (बहुप्रदेशी द्रव्य), [मुत्तं] मूर्तिक पुद्गल द्रव्य, [अमुत्तं च] और शुद्ध जीव द्रव्यादि अमूर्तिक द्रव्य [पज्जयमजादं पलयं गयं च] अनुत्पन्न भावि तथा नष्ट हुई भूतकालीन पर्यायें -- पूर्वोक्त इन सभी ज्ञेय वस्तुओं को, [जाणदि] जो ज्ञानरूप कर्ता जानता है, [तं णाणमदिंदियं भणियं] उस ज्ञान को अतीन्द्रिय ज्ञान कहते हैं उससे ही सर्वज्ञ होते हैं ।

इसलिये पहले (४१ वी) गाथा में कहे गये इन्द्रिय-ज्ञान और मानस-ज्ञान को छोड़कर जो समस्त विभाव परिणामों के त्याग पूर्वक निर्विकल्प समाधिरूप स्वसंवेदन-ज्ञान में प्रीति करते हैं, वे ही परमाह्लाद एक लक्षण स्वभाव वाले सर्वज्ञ पद को प्राप्त करते हैं - यह अभिप्राय है ।

इसप्रकार भूत-भावि पर्यायें वर्तमान ज्ञान में प्रत्यक्ष नहीं होती है - इस मान्यता वाले बौद्धमत के निराकरण की मुख्यता से तीन गाथायें, और उसके बाद नैयायिक मतानुसारि शिष्य के सम्बोधन के लिए इन्द्रिय-ज्ञान से सर्वज्ञ नहीं होते अतीन्द्रिय-ज्ञान से सर्वज्ञ होते हैं - इसप्रकार दो गाथायें -- इसप्रकार समूहरूप से पाँचवें स्थल में पाँच गाथायें पूर्ण हुईं ।

पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=ग्रन्थ:प्रवचनसार_-_गाथा_41_-_तात्पर्य-वृत्ति&oldid=134750"
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 23 April 2024, at 13:55.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki