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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 42 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



परिणमदि णेयमट्ठं णादा जदि णेव खाइगं तस्स । (42)

णाणं ति तं जिणिंदा खवयंतं कम्ममेवुत्ता ॥43॥

अर्थ: 

[ज्ञाता] ज्ञाता [यदि] यदि [ज्ञेयं अर्थं] ज्ञेय पदार्थ-रूप [परिणमति] परिणमित होता हो तो [तस्य] उसके [क्षायिकं ज्ञानं] क्षायिक ज्ञान [न एव इति] होता ही नहीं । [जिनेन्द्रा:] जिनेन्द्र देवों ने [तं] उसे [कर्म एव] कर्म को ही [क्षपयन्तं] अनुभव करने वाला [उक्तवन्तः] कहा है ॥४२॥

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ ज्ञेयार्थपरिणमनलक्षणा क्रिया ज्ञानान्न भवतीति श्रद्दधाति -

परिच्छेत्त हि यत्परिच्छेद्यमर्थं परिणमति तन्न तस्य सकलकर्मकक्षक्षयप्रवृत्तस्वाभाविकपरिच्छेदनिदानमथवा ज्ञानमेव नास्ति तस्य; यत: प्रत्यर्थपरिणतिद्वारेण मृगतृष्णाम्भोभारसंभावनाकरणमानस: सुदु:सहं कर्मभारमेवोपभुञ्जान: स जिनेन्द्रैरुद्‌गीत: ॥४२॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

अब, ऐसी श्रद्धा व्यक्त करते हैं कि ज्ञेय पदार्थरूप परिणमन जिसका लक्षण है ऐसी (ज्ञेयार्थ-परिणमन-स्वरूप) क्रिया ज्ञान में से उत्पन्न नहीं होती :-

यदि ज्ञाता ज्ञेय पदार्थरूप परिणमित होता हो, तो उसे सकल कर्म-वन के क्षय से प्रवर्तमान स्वाभाविक जानपने का कारण (क्षायिक ज्ञान) नहीं है; अथवा उसे ज्ञान ही नहीं है; क्योंकि प्रत्येक पदार्थरूप से परिणति के द्वारा मृगतृष्णा में जलसमूह की कल्पना करने की भावना वाला वह (आत्मा) अत्यन्त दुःसह कर्म-भार को ही भोगता है ऐसा जिनेन्द्रों ने कहा है ॥४२॥

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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