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ग्रन्थ

ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 54 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



जं पेच्छदो अमुत्तं मुत्तेसु अदिंदियं च पच्छण्णं । (54)

सयलं सगं च इदरं तं णाणं हवदि पच्चक्खं ॥56॥

अर्थ: 

[प्रेक्षमाणस्य यत्] देखने-वाले का जो ज्ञान [अमूर्तं] अमूर्त को, [मूर्तेषु] मूर्त पदार्थों में भी [अतीन्द्रियं] अतीन्द्रिय को, [च प्रच्छन्न] और प्रच्छन्न को, [सकलं] इन सबको- [स्वकं च इतरत] स्व तथा पर को - देखता है, [तद् ज्ञानं] वह ज्ञान [प्रत्यक्ष भवति] प्रत्यक्ष है ॥५४॥

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथ पूर्वोक्तमुपादेयभूतमतीन्द्रियज्ञानं विशेषेणव्यक्तीकरोति --

जं यदतीन्द्रियं ज्ञानं कर्तृ । पेच्छदो प्रेक्षमाणपुरुषस्य जानाति । किम् । अमुत्तं अमूर्तमतीन्द्रियनिरुपरागसदानन्दैकसुखस्वभावं यत्परमात्मद्रव्यं तत्प्रभृति समस्तामूर्तद्रव्यसमूहं मुत्तेसु अदिंदियं च मूर्तेषु पुद्गलद्रव्येषु यदतीन्द्रियं परमाण्वादि । पच्छण्णं कालाणुप्रभृतिद्रव्यरूपेण प्रच्छन्नं व्यवहित-मन्तरितं, अलोकाकाशप्रदेशप्रभृति क्षेत्रप्रच्छन्नं, निर्विकारपरमानन्दैकसुखास्वादपरिणतिरूपपरमात्मनो वर्तमानसमयगतपरिणामास्तत्प्रभृतयो ये समस्तद्रव्याणां वर्तमानसमयगतपरिणामास्ते कालप्रच्छन्नाः, तस्यैव परमात्मनः सिद्धरूपशुद्धव्यञ्जनपर्यायः शेषद्रव्याणां च ये यथासंभवं व्यञ्जनपर्यायास्तेष्वन्तर्भूताः प्रतिसमयप्रवर्तमानषट्प्रकारप्रवृद्धिहानिरूपा अर्थपर्याया भावप्रच्छन्ना भण्यन्ते । सयलं तत्पूर्वोक्तंसमस्तं ज्ञेयं द्विधा भवति । कथमिति चेत् । सगं च इदरं किमपि यथासंभवं स्वद्रव्यगतं इतरत्परद्रव्यगतंच । तदुभयं यतः कारणाज्जानाति तेन कारणेन तं णाणं तत्पूर्वोक्तज्ञानं हवदि भवति । कथंभूतम् । पच्चक्खं प्रत्यक्षमिति । अत्राहं शिष्यः --

ज्ञानप्रपञ्चाधिकारः पूर्वमेव गतः, अस्मिन् सुखप्रपञ्चाधिकारे सुखमेवकथनीयमिति । परिहारमाह — यदतीन्द्रियं ज्ञानं पूर्वं भणितं तदेवाभेदनयेन सुखं भवतीति ज्ञापनार्थं,अथवा ज्ञानस्य मुख्यवृत्त्या तत्र हेयोपादेयचिन्ता नास्तीति ज्ञापनार्थं वा । एवमतीन्द्रियज्ञानमुपादेयमिति कथनमुख्यत्वेनैकगाथया द्वितीयस्थलं गतम् ॥५४॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

(अब यहाँ अतीन्द्रिय ज्ञान की प्रधानता परक दूसरा स्थल प्रारम्भ होता है ।)

अब पूर्वोक्त उपादेयभूत अतीन्द्रिय ज्ञान को विशेषरूप से व्यक्त करते हैं -

[जं] - जो अतीन्द्रिय ज्ञान रूप कर्ता है, अर्थात् इस वाक्य का कर्ता जो ज्ञान है । [पेच्छदो] - देखनेवाले पुरुष का वह ज्ञान जानता है । उसका वह ज्ञान क्या-क्या जानता है? [अमुत्तं] - अमूर्त अतीन्द्रिय, निरुपराग, सदानन्द एक सुख स्वभाववाले परमात्मद्रव्य प्रभृति सर्व अमूर्त द्रव्य-समूह को, [मुत्तेसु अर्दिदियं च] - मूर्त पुद्गल द्रव्यों में जो अतीन्द्रिय पुद्गल परमाणु आदि हैं उन्हें जानता है ।

  • [पच्छण्णं] - कालाणु आदि द्रव्यरूप से प्रच्छन्न व्यवहित - अन्तरित-सूक्ष्म;
  • अलोकाकाश के प्रदेशों से लेकर (अन्य द्रव्यों के प्रदेश) क्षेत्रप्रच्छन्न;
  • निर्विकार परमानन्द एक सुखस्वाद रूप से परिणत परमात्मा के वर्तमान समयवर्ती परिणामों से लेकर जो सम्पूर्ण द्रव्यों के वर्तमान समयवर्ती परिणाम, वे कालरूप से प्रच्छन्न; तथा
  • उन्हीं परमात्मा की सिद्ध-रूप शुद्ध व्यजंन-पर्याय और शेष द्रव्यों की जो यथासंभव व्यंजन पर्यायें, उनमें गर्भित प्रति समय होने वाली षटप्रकार हानि-वृद्धि रूप अर्थ पर्यायें भाव-प्रच्छन्न कही गई हैं ।
[सयलं] - वे पूर्वोक्त सर्व ज्ञेय दो प्रकार के हैं । वे ज्ञेय दो प्रकार के कैसे हैं? [सगं च इदरं] - यथासंभव कोई ज्ञेय स्वद्रव्यगत है और अन्य पर द्रव्यगत हैं । उन दोनों को जिस कारण जानता है, उस कारण [तं णाणं] - वह पूर्वोक्त ज्ञान [हवदि] - है । वह ज्ञान कैसा है? वह ज्ञान [पच्चक्ख्म] - प्रत्यक्ष है ।

यहाँ शिष्य कहता है-ज्ञानप्रपंचाधिकार पहले ही पूर्ण हो गया है, इस सुख-प्रपंचाधिकार में सुख ही कहना चाहिये । आचार्य उसका निराकरण करते है- जो अतीन्द्रिय-ज्ञान पहले कहा गया है, वही अभेदनय से सुख है- ऐसा बताने के लिये अथवा वहाँ ज्ञान की मुख्यता होने से हेयोपादेय विचार नहीं किया है -यह बताने के लिये सुखप्रपंचाधिकार में भी ज्ञान का स्वरूप स्पष्ट करते हैं ।

इस प्रकार अतीन्द्रिय-ज्ञान उपादेय है - इस कथन की मुख्यता से एक गाथा द्वारा दूसरा स्थल पूर्ण हुआ ।

(अब हेयभूत इन्द्रिय-ज्ञान की मुख्यता से चार गाथाओं में निबद्ध तीसरा स्थल प्रारम्भ होता है ।)

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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