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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 73 - तात्पर्य-वृत्ति

From जैनकोष



कुलिसाउहचक्कधरा सुहोवओगप्पगेहिं भोगेहिं । (73)

देहादीणं विद्धिं करेंति सुहिदा इवाभिरदा ॥77॥

अर्थ: 

[कुलिशायुधचक्रधरा:] वज्रधर और चक्रधर (इन्द्र और चक्रवर्ती) [शुभोपयोगात्मकै: भोगै:] शुभोपयोग-मूलक (पुण्यों के फलरूप) भोगों के द्वारा [देहादीनां] देहादि की [वृद्धिं कुर्वन्ति] पुष्टि करते हैं और [अभिरता:] (इस प्रकार) भोगों में रत वर्तते हुए [सुखिता: इव] सुखी जैसे भासित होते हैं । (इसलिये पुण्य विद्यमान अवश्य है) ॥७३॥

तात्पर्य-वृत्ति: 

अथपुण्यानि देवेन्द्रचक्रवर्त्यादिपदं प्रयच्छन्ति इति पूर्वं प्रशंसां करोति । किमर्थम् । तत्फलाधारेणाग्रेतृष्णोत्पत्तिरूपदुःखदर्शनार्थं । कुलिसाउहचक्कधरा देवेन्द्राश्चक्रवर्तिनश्च कर्तारः । सुहोवओगप्पगेहिं भोगेहिं शुभोपयोगजन्यभोगैः कृत्वा देहादीणं विद्धिं करेंति विकुर्वणारूपेण देहपरिवारादीनां वृद्धिं कुर्वन्ति । कथंभूताः सन्तः । सुहिदा इवाभिरदा सुखिता इवाभिरता आसक्ता इति । अयमत्रार्थः --

यत्परमातिशय-तृप्तिसमुत्पादकं विषयतृष्णाविच्छित्तिकारकं च स्वाभाविकसुखं तदलभमाना दुष्टशोणिते जलयूका इवासक्ताः सुखाभासेन देहादीनां वृद्धिं कुर्वन्ति । ततो ज्ञायते तेषां स्वाभाविकं सुखं नास्तीति ॥७७॥

तात्पर्य-वृत्ति हिंदी : 

(अब तृष्णोत्पादक पुण्य प्रतिपादक चार गाथाओं में निबद्ध दूसरा स्थल प्रारम्भ होता है ।)

अब पुण्य देवेन्द्र, चक्रवर्ती आदि पद देता है - इस प्रकार पहले प्रशंसा करते है । पुण्य की प्रशंसा किसलिये करते हैं? उसके फल के आधार से आगे तृष्णा की उत्पत्तिरूप दुःख दिखाने के लिये पहले उसकी प्रशंसा करते हैं -

[कुलिसाउहचक्कधरा] - देवेन्द्र और चक्रवर्ती रूप कर्ता - इस वाक्य में कर्ता कारक में प्रयुक्त देवेन्द्र और चक्रवर्ती । [सुहोवओगप्पगेहिं भोगेहिं] - शुभोपयोग के फल से उत्पन्न भोगों द्वारा [देहादीणं वृद्धिं करेंति] - विशेष क्रियाओं के माध्यम से शरीर-परिवार आदि की वृद्धि करते हैं । वे कैसे होते हुये इनकी वृद्धि करते हैं? [सुहिदा इवाभिरदा] - वे सुखी के समान आसक्त होते हुये शरीरादि की वृद्धि करते हैं।

यहाँ अर्थ यह है - जो परम अतिशय संतुष्टि को उत्पन्न करने वाला और विषय-तृष्णा को नष्ट करने वाला स्वाभाविक सुख है, उसे प्राप्त नहीं करने वाले दूषित रक्त में आसक्त जलयूका (जोंक) के समान आसक्त होते हुये सुखाभास से देहादि की वृद्धि करते हैं । इससे ज्ञात होता है कि उन्हें स्वाभाविक सुख नहीं है।

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इसी गाथा की तत्त्व-प्रदीपिका टीका

तात्पर्य-वृत्ति अनुक्रमणिका

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