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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 81 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



जीवो ववगदमोहो उवलद्धो तच्चमप्पणो सम्मं । (81)

जहदि जदि रागदोसे सो अप्पाणं लहदि सुद्धं ॥87॥

अर्थ: 

[व्यपगतमोह:] जिसने मोह को दूर किया है और [सम्यक् आत्मन: तत्त्वं] आत्मा के सम्यक् तत्त्व को (सच्चे स्वरूप को) [उपलब्धवान्] प्राप्त किया है ऐसा [जीव:] जीव [यदि] यदि [रागद्वेषौ] रागद्वेष को [जहाति] छोड़ता है, [सः] तो वह [शुद्धं आत्मानं] शुद्ध आत्मा को [लभते] प्राप्त करता है ॥८१॥

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथैवं प्राप्तचिन्तामणेरपि मे प्रमादो दस्युरिति जागर्ति -

एवमुपवर्णितस्वरूपेणोपायेन मोहमपसार्यापि सम्यगात्मतत्त्वमुपलभ्यापि यदि नाम रागद्वेषौ निर्मूलयति तदा शुद्धमात्मानमनुभवति । यदि पुन: पुनरपि तावनुवर्तते तदा प्रमादतन्त्रतया लुण्ठितशुद्धात्मतत्त्वोपलम्भचिन्तारत्नोऽन्तस्ताम्यति । अतो मया रागद्वेषनिषेधायात्यन्तं जागरितव्यम्‌ ॥८१॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

इस प्रकार जिस उपाय का स्वरूप वर्णन किया है, उस उपाय के द्वारा मोह को दूर करके भी सम्यक् आत्म-तत्त्व को (यथार्थ स्वरूप को) प्राप्त करके भी यदि जीव राग-द्वेष को निर्मूल करता है, तो शुद्ध आत्मा का अनुभव करता है । (किन्तु) यदि पुन:-पुन: उनका अनुसरण करता है, -रागद्वेषरूप परिणमन करता है, तो प्रमाद के अधीन होने से शुद्धात्म-तत्त्व के अनुभव रूप चिंतामणि-रत्न के चुराये जाने से अन्तरंग में खेद को प्राप्त होता है । इसलिये मुझे रागद्वेष को दूर करने के लिये अत्यन्त जाग्रत रहना चाहिये ॥८१॥

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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