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ग्रन्थ:प्रवचनसार - गाथा 83 - तत्त्व-प्रदीपिका

From जैनकोष



दव्वादिएसु मूढो भावो जीवस्स हवदि मोहो त्ति । (83)

खुब्भदि तेणुच्छण्णो पप्पा रागं व दोसं वा ॥90॥

अर्थ: 

[जीवस्य] जीवके [द्रव्यादिकेषु मूढ: भाव:] द्रव्यादि सम्बन्धी मूढ़ भाव (द्रव्य-गुण-पर्याय सम्बन्धी जो मूढ़तारूप परिणाम) [मोह: इति भवति] वह मोह है [तेन अवच्छन्न:] उससे आच्छादित वर्तता हुआ जीव [रागं वा द्वेषं वा प्राप्य] राग अथवा द्वेष को प्राप्त कर के [क्षुभ्यति] क्षुब्ध होता है ॥८३॥

तत्त्व-प्रदीपिका: 

अथ शुद्धात्मलाभपरिपन्थिनो मोहस्य स्वभावं भूमिकाश्च विभावयति -

यो हि द्रव्यगुणपर्यायेषु पूर्वमुपवर्णितेषु पीतोन्मत्तकस्येव जीवस्य तत्त्वाप्रतिपत्तिलक्षणो मूढो भाव: स खलु मोह: । तेनावच्छन्नात्मरूप: सन्नयमात्मा परद्रव्यमात्मद्रव्यत्वेन परगुणमात्मगुणतया परपर्यायानात्मपर्यायभावेन प्रतिपद्यमान: प्ररूढदृढतरसंस्कारतया परद्रव्यमेवाहरहरुपाददानो, दग्धेन्द्रियाणां रुचिवशेनाद्वैतेऽपि प्रवर्तितद्वैतो रुचितारुचितेषु विषयेषु रागद्वेषावुपश्लिष्य, प्रचुरतराम्भोभारयाहत: सेतुबन्ध इव द्वेधा विदार्यमाणो नितरां क्षोभमुपैति । अतो मोहरागद्वेषभेदात्त्रिभूमिको मोह: ॥८३॥

तत्त्व-प्रदीपिका हिंदी : 

धतूरा खाये हुए मनुष्यकी भांति, जीवके जो पूर्व वर्णित द्रव्य-गुण-पर्याय हैं उनमें होनेवाला १तत्त्व -अप्रतिपत्तिलक्षण मूढ़ भाव वह वास्तव में मोह है । उस मोह से निजरूप आच्छादित होने से यह आत्मा पर-द्रव्य को स्व-द्रव्य रूप से, पर-गुण को स्व-गुण रूप से, और पर-पर्यायों को स्व-पर्याय रूप समझकर-अंगीकार करके, अति रूढ-दृढ़तर संस्कार के कारण पर-द्रव्य को ही सदा ग्रहण करता हुआ, 'दग्ध इन्द्रियों की रुचि के वश से' अद्वैत में भी द्वैत प्रवृत्ति करता हुआ, रुचिकर-अरुचिकर विषयों में राग-द्वेष करके अति प्रचुर जल-समूह के वेग से प्रहार को प्राप्त सेतु-बन्ध (पुल) की भाँति दो भागों में खंडित होता हुआ अत्यन्त क्षोभ को प्राप्त होता है । इससे मोह, राग और द्वेष -- इन भेदों के कारण मोह तीन प्रकार का है ॥८३॥

१तत्त्व अप्रतिपत्ति लक्षण = तत्त्व की अप्रतिपत्ति (अप्राप्ति, अज्ञान, अनिर्णय) जिसका लक्षण है ऐसा ।

२दग्ध = जली हुई; हलकी; शापित । (’दग्ध’ तिरस्कार-वाचक शब्द है)

३इन्द्रियविषयोंमे-पदार्थों में 'यह अच्छे हैं और यह बुरे' इस प्रकार का द्वैत नहीं है; तथापि वहाँ भी मोहाच्छादित जीव अच्छे-बुरे का द्वैत उत्पन्न कर लेते हैं

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इसी गाथा की तात्पर्य-वृत्ति टीका

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